प्रयागराज: संगम नगरी प्रयागराज में एक ऐसा वार्ड है, जहाँ शहर की सबसे बड़ी दवा मंडी मौजूद है, लेकिन कमाल की बात ये है कि यहीं के लोग सबसे ज़्यादा बीमारियों का शिकार हो रहे हैं। जी हाँ, बात कर रहे हैं प्रयागराज के वार्ड-90 यानी शाहगंज की। जहाँ एक तरफ़ करोड़ों का व्यापार होता है, मंडल की सबसे बड़ी इलेक्ट्रॉनिक मार्केट भी यहीं है, पान की दुकानें भी सजती हैं, लेकिन दूसरी तरफ़ यहाँ के बाशिंदे बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। सड़कें टूटी हैं, नालियाँ बजबजा रही हैं और तो और, घरों में पीने के लिए गंदा और पीला पानी आ रहा है। सोचिए ज़रा, जिस वार्ड में दवाओं का कारोबार परवान चढ़ता हो, वहाँ के लोग खुद ही बीमार पड़ रहे हों! ये हाल किसी कहानी का नहीं, बल्कि प्रयागराज के दिल में बसे एक सच का है, जिसे दैनिक भास्कर की टीम ने 'वार्ड परिक्रमा' अभियान के तहत करीब से देखा और समझा।
दैनिक भास्कर की टीम जब शाहगंज वार्ड पहुंची, तो लोगों का गुस्सा और दर्द दोनों आँखों में साफ दिख रहा था। किसी ने अपने पेट और लीवर की बीमारियों का सारा इल्ज़ाम दूषित पानी पर मढ़ा, तो किसी ने अपनी गली की टूटी सड़क और महीनों से न हुई सफाई की शिकायत की।
यहां के बाशिंदों की मानें, तो शिकायतें तो ढेर सारी की जाती हैं, लेकिन सुनवाई कहीं नहीं होती। ये वही शाहगंज है, जहाँ करोड़ों का कारोबार हर दिन होता है, लेकिन यहाँ रहने वालों की किस्मत में सिर्फ़ बदहालियाँ और सरकारी उपेक्षा ही लिखी है।
गंदे पानी से बीमारियाँ और मजबूरी
शाहगंज वार्ड की सबसे बड़ी और जानलेवा समस्या दूषित पेयजल है। यहां के लोगों को पिछले कई महीनों से अपने घरों में पीले रंग का बदबूदार पानी मिल रहा है।
पानी ऐसा कि उसमें बालू तक दिखाई देती है। आप कल्पना कर सकते हैं कि इस पानी को पीने वाले लोगों का क्या हाल होता होगा? वार्ड के लोगों का सीधा आरोप है कि इस गंदे पानी की वजह से पेट और लीवर संबंधी बीमारियां तेज़ी से बढ़ रही हैं।
डॉक्टर के चक्कर काटते-काटते और दवाइयाँ खाते-खाते लोग परेशान हो चुके हैं। मजबूरी ऐसी है कि हर परिवार या तो आरओ का पानी खरीद रहा है या फिर कैंपर मंगवाकर काम चला रहा है।
यानी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में बीमारी के साथ-साथ आर्थिक बोझ भी बढ़ गया है। जिस वार्ड में शहर की सबसे बड़ी दवा मंडी हो, वहाँ के लोगों को गंदा पानी पीने को मिले और वे बीमारियों का शिकार हों, ये अपने आप में एक कड़वी हकीकत है, जो प्रशासन की अनदेखी को चीख़-चीख़कर बयाँ कर रही है।
बाजार का जाम और जान का खतरा
अब बात करते हैं वार्ड की दूसरी बड़ी समस्या, जाम की। शाहगंज सिर्फ़ दवा मंडी ही नहीं, मंडल की सबसे बड़ी इलेक्ट्रॉनिक मार्केट भी यहीं है।
इसके अलावा पान मार्केट भी है, जहाँ हर दिन हज़ारों ग्राहक पहुंचते हैं। लेकिन अफ़सोस! यहाँ एक भी सार्वजनिक पार्किंग की व्यवस्था नहीं है।
अब जब पार्किंग नहीं होगी, तो लोग गाड़ी कहाँ खड़ी करेंगे? ज़ाहिर सी बात है, सड़कों और गलियों में ही। नतीजा क्या होता है? पूरे दिन जाम की स्थिति बनी रहती है।
गलियाँ पहले से ही संकरी हैं, उस पर सड़कों के बीच में बना पुलिस सहायता केंद्र (पुलिस बूथ) रास्ते को और भी तंग कर देता है। व्यापारियों का कहना है कि ये जाम उनकी रोज़ी-रोटी पर तो असर डालता ही है, लेकिन सबसे बड़ा डर तो किसी आपात स्थिति का है।
अगर कभी आग लग जाए या किसी मरीज़ को अस्पताल ले जाने की नौबत आए, तो दमकल या एम्बुलेंस जैसी गाड़ियाँ इस भीड़भाड़ और जाम में अंदर तक पहुंच ही नहीं पाएंगी। यानी यहाँ के लोगों की जान भी हमेशा दांव पर लगी रहती है।
शहर के सबसे बड़े मार्केट में ये हालात, अपने आप में कई सवाल खड़े करते हैं।
बुनियादी ढाँचे की बदहाली और बिजली के तारों का मकड़जाल
वार्ड-90 में सिर्फ़ पानी और जाम की ही दिक्कत नहीं है, बल्कि बुनियादी ढाँचे की बदहाली भी साफ दिखती है। वार्ड की ज़्यादातर सड़कें उखड़ी हुई हैं, गड्ढों से भरी पड़ी हैं।
नालियों की बात करें, तो वे या तो टूट चुकी हैं या पूरी तरह से जाम पड़ी हैं। लोगों ने कई बार शिकायतें की हैं, लेकिन स्थिति सुधरने का नाम नहीं लेती।
बारिश के मौसम में तो हालात और भी बदतर हो जाते हैं। गलियों में पानी भर जाता है, टूटी सड़कों पर चलना दूभर हो जाता है।
इसके अलावा, बिजली के तारों का मकड़जाल भी यहाँ के लोगों के लिए एक बड़ी समस्या है। गलियों के ऊपर, घरों के बेहद करीब से गुज़रते ये तार हमेशा एक खतरे की तरह मंडराते रहते हैं।
एक छोटी सी चिंगारी भी बड़ी आग का रूप ले सकती है, खासकर तब जब संकरी गलियों में दमकल का पहुंचना भी मुश्किल हो। ये सारी तस्वीरें मिलकर एक ऐसे वार्ड की कहानी सुनाती हैं, जो आर्थिक रूप से तो संपन्न है, लेकिन नागरिक सुविधाओं के मामले में बुरी तरह पिछड़ा हुआ है।
जहाँ के निवासियों की ज़िंदगी बदहाली और बेफिक्री के भँवर में फँसी हुई है, जहाँ उनकी आवाज़ शायद कहीं खो गई है।

