भोजपुर: बिहार की धरती एक बार फिर जातीय राजनीति के अखाड़े में तब्दील होती दिख रही है। भोजपुर में एक एनकाउंटर के बाद शुरू हुए बवाल ने अब महापंचायतों का रूप ले लिया है। एक तरफ वो लोग हैं जो पुलिस की कार्रवाई को फर्जी बताकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और प्रशासन पर सवाल उठा रहे हैं, तो दूसरी तरफ 'बहुजन समाज' सरकार के समर्थन में मैदान में उतर आया है। इस पूरे खेल में केंद्र में हैं सूबे के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, जिनकी साख और सियासी भविष्य दोनों दांव पर लगे हैं। क्या बिहार 20 साल बाद फिर उसी जातीय संघर्ष के दौर में लौटने वाला है, जिसका ज़हर उसने लालू-राबड़ी राज में चखा था? ये सवाल अब हर किसी की जुबान पर है।
कहानी की शुरुआत होती है शाहपुर के बिलौटी गांव से, जहां पुलिस ने भरत भूषण तिवारी नाम के एक शख्स को एनकाउंटर में मार गिराया। पुलिस के मुताबिक भरत तिवारी पर रंगदारी, धोखाधड़ी और कई गंभीर मामले दर्ज थे।
लेकिन इस एनकाउंटर के बाद समाज का एक तबका, खासकर सवर्ण समाज, गुस्से से भर उठा। उनका आरोप था कि ये एनकाउंटर फर्जी है और प्रशासन ने जानबूझकर ऐसा किया है।
इसी गुस्से का नतीजा था कि 24 जून को बिलौटी गांव में एक बड़ी महापंचायत हुई, जिसमें कई विपक्षी नेताओं ने भी शिरकत की और खुलेआम मुख्यमंत्री व प्रशासन के खिलाफ अपना आक्रोश जताया।
एक एनकाउंटर; दो महापंचायतें और बिहार की सियासत
24 जून की उस महापंचायत के जवाब में अब 'बहुजन आर्मी' नाम के एक संगठन ने 5 जुलाई को जगदीशपुर के लाल बिहारी सिंह टोला हाई स्कूल मैदान में 'बहुजन महापंचायत' बुलाई है। इस महापंचायत का मकसद साफ है—सरकार और मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का समर्थन करना।
बहुजन आर्मी के राष्ट्रीय अध्यक्ष गोल्डन दास ने एक यूट्यूब चैनल से बातचीत में साफ-साफ कहा, "यह महापंचायत मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को समर्थन देने के लिए है। भरत तिवारी के एनकाउंटर के विरोध में सवर्ण समाज ने बिलौटी गांव में महापंचायत की थी।
उसी के जवाब में अब बहुजन समाज एकजुट होकर सरकार के पक्ष में खड़ा हो रहा है।"
यानी, साफ है कि अब बात सिर्फ एनकाउंटर की नहीं रही, बल्कि सियासी बिसात बिछ चुकी है और मोहरे अपनी चालें चल रहे हैं। ये केवल एक घटना का विरोध या समर्थन नहीं, बल्कि बिहार की उस पुरानी जातीय गोलबंदी को फिर से जिंदा करने की कोशिश है, जो सालों से दबी पड़ी थी।
क्या सरकारी सपोर्ट से हो रही है 'बहुजन महापंचायत'?
सवाल ये उठता है कि क्या इस 'बहुजन महापंचायत' को राज्य सरकार का सीधा समर्थन है? जवाब है — सीधे तौर पर नहीं, लेकिन महापंचायत में शामिल होने वाले और इसका प्रचार करने वाले नेताओं का संबंध सीधे सरकार से है, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता। केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने खुले तौर पर इस महापंचायत में शामिल होने का ऐलान किया है।
मांझी जैसे वरिष्ठ नेता का शामिल होना यह दर्शाता है कि सत्ताधारी गठबंधन के बड़े नेता भी इस लामबंदी को हवा दे रहे हैं।
इसके अलावा, भाजपा के कई अहम नेता भी इसमें शामिल हो रहे हैं। इनमें नागमणि कुशवाहा, सकलदेव बिंद और भाजपा महिला नेता प्रतिमा कुशवाहा जैसे नाम शामिल हैं।
सकलदेव बिंद को तो मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का बेहद करीबी माना जाता है। याद कीजिए, जब सम्राट चौधरी विधानसभा चुनाव में तारापुर से कैंडिडेट थे, तब सकलदेव बिंद ने उन्हीं के समर्थन में अपना नामांकन वापस ले लिया था और भाजपा में शामिल हो गए थे।
ऐसे में, इन नेताओं की मौजूदगी अपने आप में बहुत कुछ कहती है।
सूत्रों के हवाले से यह भी खबर है कि भले ही बड़े नेता आधिकारिक तौर पर मंच साझा न करें, लेकिन अंदरूनी तौर पर भाजपा और JDU के स्थानीय स्तर के पिछड़े, अति-पिछड़े और दलित नेता और कार्यकर्ता इस महापंचायत में न सिर्फ शामिल होंगे, बल्कि इसका जमकर प्रचार-प्रसार भी कर रहे हैं। यानी, सरकार भले ही इसे अपनी पहल न बताए, लेकिन पर्दे के पीछे से पूरा समर्थन मिल रहा है।
यह एक ऐसी रणनीति लगती है, जहां आधिकारिक दूरी बनाए रखते हुए भी जमीन पर जातीय समीकरणों को साधने की कोशिश हो रही है।
सम्राट चौधरी को क्या मिलेगा, क्या है खतरा?
इस पूरी 'बहुजन महापंचायत' से मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को क्या हासिल होगा और क्या खतरा है, यह समझना बेहद जरूरी है। सम्राट चौधरी कुशवाहा समाज (OBC) से आते हैं और उन्होंने गैर-यादव ओबीसी की राजनीति करके भाजपा की संगठनात्मक ताकत के दम पर मुख्यमंत्री की कुर्सी तक का सफर तय किया है।
20 साल बाद बिहार में यह पहली बार हो रहा है कि सरकार के समर्थन में कोई जातीय महापंचायत बुलाई जा रही है।
नीतीश कुमार जब तक सत्ता में थे, तब सरकार के समर्थन में ऐसी जातीय महापंचायतें नहीं होती थीं। हां, जातीय सम्मेलन जरूर होते थे, जिनमें अपनी-अपनी जाति के उत्थान और विकास की बातें होती थीं, लेकिन उनका मिजाज इतना तीखा और जवाबी नहीं होता था।
इससे पहले, लालू-राबड़ी के शासनकाल में खुलेआम सवर्णों के खिलाफ जातीय सम्मेलन होते रहे हैं। उस दौर में बिहार ने जातीय उन्माद, समाज में तनाव और हिंसा का एक बुरा दौर देखा था।
अब सम्राट चौधरी के शासन काल में सवर्णों के खिलाफ (या सवर्णों की महापंचायत के जवाब में) एक महापंचायत हो रही है। अगर इस बहुजन महापंचायत में पिछड़ा और दलित समाज एक होकर सरकार के समर्थन में खड़ा होता है, तो सम्राट चौधरी व्यक्तिगत रूप से मजबूत हो सकते हैं।
इससे उनका कद पार्टी और गठबंधन में और बढ़ेगा, और वह गैर-यादव ओबीसी और दलित वोट बैंक पर अपनी पकड़ को और मजबूत कर पाएंगे। यह भाजपा की रणनीति का भी हिस्सा हो सकता है, जहां वह इन समुदायों को अपने पाले में लाने की कोशिश कर रही है।
लेकिन, इसके दूसरे पहलू पर भी गौर करना जरूरी है। क्या यह बिहार को फिर से जातीय ध्रुवीकरण की ओर नहीं धकेलेगा? क्या यह समाज में एक नई दरार पैदा नहीं करेगा? जातीय संघर्ष का इतिहास बिहार के लिए कभी सुखद नहीं रहा है।
अगर यह राजनीति बेलगाम होती है, तो समाज में तनाव और टकराव बढ़ सकता है, जिसका खामियाजा पूरे राज्य को भुगतना पड़ सकता है। सम्राट चौधरी के लिए यह एक दोधारी तलवार है।
एक तरफ राजनीतिक मजबूती का मौका है, तो दूसरी तरफ जातीय विद्वेष के फिर से पनपने का खतरा भी मंडरा रहा है। इस महापंचायत के बाद बिहार की राजनीति किस करवट बैठेगी, यह देखना दिलचस्प होगा।

