पटना: सोचिए, आपके शरीर में कैंसर पल रहा हो, लेकिन आपको पता ही न चले! ये डर कई लोगों को सताता है। अक्सर ऐसा ही होता है, जब तक बीमारी का पता चलता है, तब तक काफी देर हो चुकी होती है। लेकिन अब वैज्ञानिकों ने एक ऐसी नई तकनीक खोज निकालने का दावा किया है, जिससे इस खतरे को शुरुआती दौर में ही पहचाना जा सकेगा। यानी, शरीर के अंदर छिपा कैंसर अब अंजान नहीं रहेगा।
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी, बदलती लाइफस्टाइल और ढेरों स्वास्थ्य जोखिमों के बीच कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से बचाव और समय पर उसकी पहचान करना सबसे बड़ा चैलेंज बन गया है। हम और आप अक्सर शरीर में पनप रहे खतरे को तब तक नहीं समझ पाते, जब तक वो बीमारी एक बड़े रूप में सामने नहीं आ जाती।
इसी चिंता को दूर करने के लिए विज्ञान ने एक नई उम्मीद जगाई है।
Strand Life Sciences नाम की कंपनी ने एक ऐसी कमाल की तकनीक डेवलप की है, जिसमें सिर्फ एक साधारण ब्लड टेस्ट के जरिए कैंसर के शुरुआती संकेतों का पता लगाने की कोशिश की जा रही है। अगर ये तकनीक सफल होती है, तो ये कैंसर से लड़ने की जंग में एक गेम चेंजर साबित हो सकती है।
आखिर ये नया ब्लड टेस्ट क्या है और कैसे काम करता है?
इस नई तकनीक का सबसे खास पहलू ये है कि ये जांच सिर्फ बीमारी की मौजूदगी ही नहीं बताएगी, बल्कि ये भी बता सकती है कि कैंसर शरीर के किस हिस्से में पनप रहा है। अगर समय रहते इसकी पहचान हो जाती है, तो इलाज फौरन शुरू किया जा सकेगा और लाखों जिंदगियां बचाई जा सकेंगी।
ये वाकई एक बड़ा कदम होगा मेडिकल साइंस की दुनिया में।
बता दें कि कनाडा के टोरंटो में मौजूद प्रिंसेस मार्गरेट कैंसर सेंटर के रिसर्चर्स इस खास ब्लड टेस्ट को बड़े लेवल पर टेस्ट कर रहे हैं। इस टेस्ट को 'लिक्विड बायोप्सी' नाम दिया गया है।
इसका मेन मकसद खून में मौजूद कैंसर डीएनए के उन छोटे-छोटे अंशों का पता लगाना है, जिन्हें सामान्य सीटी स्कैन भी पकड़ नहीं पाते। मतलब, ये टेस्ट बहुत बारीक से बारीक चीज को भी स्कैन कर लेगा।
वैज्ञानिकों का मानना है कि ये छोटी-छोटी डीएनए के अंश ही वो शुरुआती वार्निंग साइन होते हैं, जो कैंसर के पनपने की जानकारी देते हैं। अगर इन अंशों को समय रहते पकड़ लिया जाए, तो बीमारी को जड़ से खत्म करने का मौका मिल सकता है, इससे पहले कि वो विकराल रूप धारण करे।
7,000 मरीजों पर क्यों हो रहा है बड़ा अध्ययन?
इस बड़े रिसर्च के तहत लगभग 7,000 ऐसे मरीजों को शामिल किया जा रहा है, जिनका रेडिएशन, कीमोथेरेपी या अन्य कोई भी इलाज पूरा हो चुका है। रिसर्चर्स इन मरीजों के खून के नमूनों की कई सालों तक लगातार जांच करेंगे।
ऐसा करने का मकसद ये समझना है कि क्या ये 'लिक्विड बायोप्सी' टेस्ट कैंसर के दोबारा लौटने की कितनी सटीक भविष्यवाणी कर सकता है।
दरअसल, कैंसर के इलाज के बाद भी कई बार बीमारी दोबारा लौट आती है, जिसे रीकरेंस (recurrence) कहते हैं। ऐसे में मरीजों को फिर से ट्रीटमेंट की लंबी और दर्दनाक प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है।
अगर ये ब्लड टेस्ट पहले ही बता दे कि कैंसर वापस आने वाला है, तो डॉक्टर समय रहते जरूरी कदम उठा सकेंगे और मरीजों को दोबारा उस स्थिति में जाने से बचा पाएंगे।
इस अध्ययन से ये भी पता चलेगा कि क्या ये टेस्ट सिर्फ एक प्रकार के कैंसर के लिए ही प्रभावी है या फिर अलग-अलग तरह के कैंसर में भी इसकी सटीकता बनी रहती है। यह एक लंबा और धैर्यपूर्ण रिसर्च प्रोसेस है, लेकिन इसके नतीजे मेडिकल फील्ड में क्रांतिकारी बदलाव ला सकते हैं।
अगर रिपोर्ट पॉजिटिव आई तो मरीजों को क्या फायदा मिलेगा?
इस लिक्विड बायोप्सी टेस्ट की सबसे बड़ी खूबी ये है कि अगर ब्लड टेस्ट में कैंसर के बचे हुए अंश मिलते हैं, तो मरीजों को तुरंत नई इम्यूनोथेरेपी या अन्य कोई आधुनिक ट्रीटमेंट दिया जा सकता है। कहने का मतलब है कि उन्हें वेट नहीं करना पड़ेगा कि लक्षण दिखें या बीमारी बढ़े।
पहले ही बचाव का रास्ता मिल जाएगा।
आजकल इम्यूनोथेरेपी कैंसर के इलाज में एक बड़ा नाम है। यह थेरेपी शरीर के इम्यून सिस्टम को मजबूत करती है, ताकि वह कैंसर सेल्स से खुद ही लड़ सके।
ऐसे में, अगर टेस्ट पॉजिटिव आता है और मरीज को इम्यूनोथेरेपी मिलती है, तो उसके ठीक होने के चांसेज कई गुना बढ़ जाएंगे। ये एक तरह से 'अर्ली इंटरवेंशन' का कमाल होगा।
वहीं, इसका दूसरा बड़ा फायदा ये है कि अगर रिपोर्ट नेगेटिव आती है, तो मरीजों को बेवजह की कीमोथेरेपी या रेडिएशन से बचाया जा सकता है। कीमोथेरेपी और रेडिएशन के अपने साइड इफेक्ट्स होते हैं, जो मरीज के शरीर और मन दोनों को प्रभावित करते हैं।
अगर पता चल जाए कि कैंसर नहीं लौटा है, तो मरीज को इस दर्दनाक प्रक्रिया से मुक्ति मिल सकेगी और वो शांति से अपना जीवन जी पाएगा।
क्या ये टेस्ट सभी तरह के कैंसर पर प्रभावी होगा?
SHERLOCK नाम का ये क्लिनिकल ट्रायल सिर्फ एक तरह के कैंसर तक सीमित नहीं है। रिसर्चर्स ये भी जानना चाहते हैं कि ये तकनीक अलग-अलग तरह के कैंसर में कितनी प्रभावी साबित होती है।
इस अध्ययन में शामिल सभी मरीजों की कम से कम पांच साल तक कड़ी निगरानी की जाएगी।
इस लंबे मॉनिटरिंग पीरियड का मकसद ये है कि टेस्ट की विश्वसनीयता और सटीकता को पूरी तरह से समझा जा सके। कैंसर एक जटिल बीमारी है और हर मरीज पर इसका असर अलग होता है।
ऐसे में, अलग-अलग तरह के कैंसर पर इसका प्रभाव देखना बहुत जरूरी है, ताकि इसकी एप्लीकेबिलिटी (उपयोगिता) को बढ़ाया जा सके। यह एक मल्टी-कैंसर डिटेक्शन टूल बनने की दिशा में एक अहम कदम हो सकता है।
एक्सपर्ट्स क्या कहते हैं इस नई खोज के बारे में?
इस रिसर्च से जुड़े शोधकर्ताओं का कहना है कि शुरुआती नतीजे तो बहुत शानदार और उम्मीद जगाने वाले हैं, लेकिन अभी फिलहाल इस टेस्ट को रेगुलर इलाज का हिस्सा नहीं बनाया गया है। इसे बड़े पैमाने पर अपनाए जाने से पहले बड़े क्लिनिकल ट्रायल पूरे होने और पर्याप्त साइंटिफिक प्रूफ मिलने बहुत जरूरी हैं।
उनका साफ-साफ कहना है कि हमें जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। मेडिकल साइंस में किसी भी नई तकनीक को अपनाने से पहले उसकी हर कसौटी पर खरा उतरना बहुत जरूरी होता है।
अभी और डेटा की जरूरत है, ताकि इसकी एफिशिएंसी और सेफ्टी पर कोई शक न रहे। हालांकि, वे इस बात को लेकर उत्साहित हैं कि ये टेस्ट भविष्य में कैंसर के खिलाफ हमारी लड़ाई को एक नई दिशा दे सकता है।
पॉल लोनेर्गन की कहानी: एक उम्मीद की किरण
टोरंटो के 68 वर्षीय पॉल लोनेर्गन, जिनका गले के कैंसर का इलाज हो चुका था, ऐसे ही एक अन्य क्लिनिकल ट्रायल में शामिल हुए। जब उनका ब्लड टेस्ट किया गया, तो उसमें कैंसर के कुछ बचे हुए अंश मिले।
इस रिपोर्ट के आधार पर उन्हें नई इम्यूनोथेरेपी दी गई।
अगर यह टेस्ट नहीं होता, तो शायद पॉल को फिर से कैंसर के लक्षणों के उभरने का इंतजार करना पड़ता, और तब तक शायद इलाज और भी मुश्किल हो जाता। पॉल की कहानी इस बात का जीता-जागता सबूत है कि ये ब्लड टेस्ट कितनी बड़ी उम्मीद जगा रहा है।
ऐसे और भी कई मरीज होंगे, जिनकी जिंदगी को ये तकनीक बचा सकती है, अगर ये सफल रही। कैंसर के मरीजों के लिए यह वाकई एक लाइफलाइन बन सकती है।




































