दिल्ली: राजधानी दिल्ली की सूरत बदलने वाली है, और ये कोई छोटी-मोटी बात नहीं! दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) ने एक ऐसा बड़ा प्लान शुरू कर दिया है, जिससे शहर के एक बड़े हिस्से में जबरदस्त बदलाव आने वाला है. अब आप सोच रहे होंगे कि आखिर ये माजरा क्या है? तो बता दें, DDA ने अपनी एक खास 'ट्रांजिट ओरिएंटेड डेवलपमेंट' यानी TOD नीति को ज़मीन पर उतारना शुरू कर दिया है. इसका सीधा मतलब ये है कि अब दिल्ली में मेट्रो और रैपिड रेल के आसपास की ज़मीनों पर नए सिरे से विकास की बयार बहेगी. बड़े-बड़े टावर्स, किफायती घर, दफ्तर और शानदार इन्फ्रास्ट्रक्चर... सबकुछ तैयार करने का रास्ता खुल गया है.
खबरों के मुताबिक, DDA ने इस बड़े काम के लिए डेवलपर संस्थाओं को इनवाइट करना भी शुरू कर दिया है. यानी, जो बिल्डर्स और कंपनियां दिल्ली को नए सिरे से संवारना चाहती हैं, उनके लिए अब रास्ता साफ है.
ये पूरा प्लान दिल्ली के उपराज्यपाल तरनजीत सिंह संधू की गाइडेंस में तैयार किया गया है. बताया जा रहा है कि उनकी देखरेख में इस TOD पॉलिसी को पूरी तरह से संशोधित किया गया था, ताकि इसे प्रभावी तरीके से लागू किया जा सके.
अब इस नीति को ज़मीन पर उतारने के लिए DDA ने ऑनलाइन बिल्डिंग परमिट सिस्टम (OBPS) के ज़रिए आवेदन की प्रक्रिया भी शुरू कर दी है. ये एक तरह से ऑनलाइन खिड़की है, जहां से सब काम होंगे.
इस नीति के ज़रिए दिल्ली का कायाकल्प होना तय है, जहां एक तरफ किफायती घर बनेंगे तो दूसरी तरफ बिल्कुल आधुनिक इन्फ्रास्ट्रक्चर भी तैयार होगा.
तो कितने बड़े इलाके की किस्मत बदलने वाली है?
DDA के आंकड़ों पर गौर करें, तो इस नई नीति के लागू होने से दिल्ली का करीब 207 वर्ग किलोमीटर का एक बहुत बड़ा इलाका विकास के लिए खुल जाएगा. आप समझ सकते हैं कि ये कितना विशाल क्षेत्र है, जहां अब तक शायद उतनी सुविधाएं नहीं थीं या वो क्षेत्र उस तरह से डेवलप नहीं था.
ये दिल्ली का एक बड़ा चंक है, जिसका चेहरा बदलने वाला है.
अब इस दायरे में मिक्स्ड लैंड यूज एरिया तैयार किए जाएंगे, जहां एक साथ कई तरह की गतिविधियां हो सकेंगी. इसके अलावा, मॉडर्न ऑफिस स्पेस, गेस्ट हाउस और स्टूडियो अपार्टमेंट्स जैसे शानदार इन्फ्रास्ट्रक्चर खड़े किए जा सकेंगे.
कुल मिलाकर, इन इलाकों में रहने और काम करने का पूरा एक्सपीरियंस ही बदल जाएगा, क्योंकि सब कुछ एक ही जगह पर मिलेगा.
मेट्रो और रैपिड रेल के आसपास क्या खास होने वाला है?
जैसा कि नाम से ही ज़ाहिर है, TOD नीति का पूरा फोकस दिल्ली में ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर के आसपास के इलाकों पर है. इन इलाकों को ही खास तौर पर प्लान्ड डेवलपमेंट और रीडेवलपमेंट के लिए चुना गया है.
अगर हम मेट्रो कॉरिडोर की बात करें, तो मेट्रो लाइनों के दोनों तरफ 500 मीटर का पूरा दायरा इस नीति के तहत आएगा. यह वो दायरा है, जहां पर नए प्रोजेक्ट्स को तरजीह दी जाएगी.
इसी तरह, रैपिड रेल स्टेशनों के चारों तरफ भी 500 मीटर के रेडियस को प्लान्ड डेवलपमेंट के लिए मार्क किया गया है. ज़रा सोचिए, मेट्रो या रैपिड रेल स्टेशन से उतरते ही आपको आलीशान अपार्टमेंट्स, शानदार ऑफिस और ज़िंदगी की सारी मॉडर्न सुविधाएं मिलेंगी, तो आपकी डेली लाइफ कितनी आसान हो जाएगी.
टाइम बचेगा, एनर्जी बचेगी और ट्रैफिक जाम की टेंशन भी नहीं होगी.
इस नीति का मक़सद सीधा और साफ है: इन चिंहित क्षेत्रों में योजनाबद्ध तरीके से किफायती घर और उनसे जुड़े बुनियादी ढांचे तैयार करना. अधिकारियों का मानना है कि इससे न केवल लोगों के रहने की स्थिति पहले से कहीं बेहतर होगी, बल्कि मेट्रो में सफर करने वालों की तादाद भी बढ़ेगी.
लोग अपने घरों से सीधे मेट्रो तक पहुंच पाएंगे, जिससे सड़कों पर ट्रैफिक का बोझ भी कम होगा और पॉल्यूशन में भी थोड़ी राहत मिलेगी. ये दिल्ली के लिए एक विन-विन सिचुएशन है.
डेवलपर्स के लिए कितनी आसान हुई है ये प्रक्रिया?
DDA ने साफ़ किया है कि ये पूरी नीति 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' को बढ़ावा देने के लिए बनाई गई है. इसका मतलब ये है कि अब परियोजनाओं की मंजूरी के लिए एक बेहद सरल और 'सिंगल-विंडो क्लीयरेंस' व्यवस्था बनाई गई है.
पहले क्या होता था? कोई भी डेवलपर अगर कोई प्रोजेक्ट शुरू करता था, तो उसे दिल्ली नगर निगम (MCD), दिल्ली जल बोर्ड (DJB), दिल्ली फायर सर्विस और ऐसी ही कई अलग-अलग सरकारी एजेंसियों के पास अलग-अलग चक्कर लगाने पड़ते थे. इसमें बहुत टाइम और पैसा बर्बाद होता था, जो अक्सर प्रोजेक्ट्स को डिले करता था.
अब इस सिरदर्दी से छुटकारा मिल गया है. अब ज़मीन विकसित करने के इच्छुक किसी भी व्यक्ति या डेवलपर इकाई को सिर्फ एक पॉइंट पर, यानी DDA के ऑनलाइन बिल्डिंग परमिट सिस्टम (OBPS) के ज़रिए आवेदन करना होगा.
यहीं पर ज़रूरी फीस जमा करनी होगी और यहीं से सारी मंजूरी की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी. ये एक तरह से वन-स्टॉप शॉप है, जहां से सारे काम निबट जाएंगे.
इससे प्रोजेक्ट्स को मंज़ूरी मिलने में तेज़ी आएगी और डेवलपमेंट का काम भी स्पीड पकड़ेगा, जो दिल्ली के ओवरऑल ग्रोथ के लिए बहुत ज़रूरी है.
तो ऐसे होगा काम: सबसे पहले डेवलपर्स को DDA के ऑनलाइन बिल्डिंग परमिट सिस्टम (OBPS) के ज़रिए आवेदन करना होगा. इन आवेदनों पर DDA के उपाध्यक्ष की अध्यक्षता वाली एक खास 'TOD कमेटी' फैसला लेगी.
यही कमेटी TOD प्लॉटों को अपनी मंजूरी देगी. एक बार जब TOD कमेटी किसी प्रोजेक्ट को अपनी हरी झंडी दिखा देती है, तो उस बिल्डिंग प्लान को अंतिम मंजूरी के लिए फिर से OBPS के माध्यम से आगे बढ़ाया जाएगा.
कुल मिलाकर, ये एक लंबी लेकिन सुव्यवस्थित प्रक्रिया है, जो राजधानी दिल्ली को एक नया रूप देने की तैयारी में है.





































