अहमदाबाद: साल 2008 की 26 जुलाई। ये तारीख आज भी गुजरात और पूरे देश के ज़हन में एक दर्दनाक याद की तरह बैठी है। वो दिन जब अहमदाबाद में सिर्फ़ 70 मिनट के भीतर, शहर के अलग-अलग कोनों में एक के बाद एक 21 बम धमाकों ने पूरे माहौल को दहशत में डुबो दिया था। शाम का वक्त था, लोग अपने कामों में मशगूल थे, और तभी अचानक हर तरफ चीख-पुकार मच गई। इन भयानक हमलों में कुल 56 बेगुनाह लोगों की जान चली गई थी, और 200 से ज़्यादा लोग बुरी तरह ज़ख्मी हुए थे। सोचिए, एक घंटे के अंदर इतनी तबाही! हद तो तब हो गई जब घायलों का इलाज कर रहे अस्पतालों को भी निशाना बनाया गया।
अब, करीब 18 साल बाद, इस खौफनाक वारदात से जुड़े एक बड़े मामले में गुजरात हाई कोर्ट ने अपना अहम फैसला सुनाया है। मंगलवार को आए इस फैसले ने 38 गुनहगारों की फांसी की सज़ा और 11 अपराधियों की उम्रकैद की सज़ा को बरकरार रखा है।
ये वो लोग हैं, जिनकी काली करतूतों ने अहमदाबाद को खून से रंग दिया था।
आखिर हुआ क्या था उस मनहूस शाम को?
26 जुलाई 2008 की वो शाम, बेंगलुरु में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों के ठीक एक दिन बाद आई थी। शाम करीब 6 बजकर 45 मिनट हुए होंगे, और फिर शुरू हुआ मौत का तांडव।
लगभग एक घंटे के भीतर, अहमदाबाद के 14 अलग-अलग इलाकों में कम तीव्रता वाले 21 बम फटे। क्या मणिनगर, क्या रायपुर, बापू नगर, हटकेश्वर सर्कल, सरखेज, ठक्करबापा नगर, खाडिया, सारंगपुर, जवाहर चौक, इसानपुर, गोविंदवाड़ी और नरोल – हर जगह बम धमाकों की गूँज सुनाई दी।
और जैसा हमने बताया, हमलावरों ने अपनी क्रूरता की हद पार करते हुए अहमदाबाद सिविल हॉस्पिटल जैसे उन ठिकानों को भी नहीं बख्शा, जहाँ घायलों को बचाने की कोशिशें चल रही थीं। दो अस्पतालों को निशाना बनाना, ये बताता है कि मंशा सिर्फ दहशत फैलाना नहीं, बल्कि मानवता को शर्मसार करना भी था।
जांच करने वाले अधिकारियों ने बाद में खुलासा किया था कि इन बम धमाकों की पूरी प्लानिंग दिसंबर 2007 में केरल के एर्नाकुलम जिले में की गई थी। इस साज़िश को अंजाम दिया था प्रतिबंधित आतंकी संगठन 'स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया' (SIMI) ने एक सीक्रेट मीटिंग के दौरान।
इंडियन मुजाहिदीन का कनेक्शन और स्पेशल कोर्ट का फैसला क्या था?
इन धमाकों के पीछे आतंकी संगठन इंडियन मुजाहिदीन (IM) के आतंकी शामिल थे। लंबी जांच और कानूनी प्रक्रिया के बाद, फरवरी 2022 में एक स्पेशल कोर्ट ने इस मामले को 'रेयरेस्ट ऑफ रेयर' यानी सबसे दुर्लभ और गंभीर मामलों की कैटेगरी में रखा था।
कोर्ट ने कहा था कि ऐसे जघन्य अपराध के लिए साधारण सज़ा काफी नहीं होगी। उसी फैसले में, 38 दोषियों को फांसी की सज़ा सुनाई गई थी, जबकि 11 अन्य दोषियों को ताउम्र जेल में रहने यानी उम्रकैद की सज़ा दी गई थी।
जाहिर सी बात है, दोषियों ने इस फैसले को मानने से इनकार कर दिया और स्पेशल कोर्ट के इस सज़ा के खिलाफ गुजरात हाई कोर्ट में अपील दायर की। उन्हें उम्मीद थी कि शायद ऊपरी अदालत से उन्हें कोई राहत मिल जाए।
लेकिन, पीड़ितों और उनके परिवारों की नज़रें न्याय पर टिकी थीं।
हाई कोर्ट ने क्या कहा और इसका क्या मतलब है?
मंगलवार को गुजरात हाई कोर्ट के जस्टिस ए.वाई.
कोगजे और समीर दवे की डिवीजन बेंच ने इस मामले पर सुनवाई की। बेंच ने 2022 के स्पेशल कोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर सभी अपीलों को एक झटके में खारिज कर दिया।
मतलब साफ था, हाई कोर्ट ने स्पेशल कोर्ट के उस फैसले को पूरी तरह सही ठहराया, जिसमें इंडियन मुजाहिदीन (IM) से जुड़े इन आतंकियों को दोषी ठहराया गया था और उन्हें मौत या उम्रकैद की सज़ा दी गई थी।
इस फैसले के साथ, देश को दहला देने वाले अहमदाबाद सीरियल ब्लास्ट मामले में करीब 18 साल से चल रही कानूनी लड़ाई में एक बेहद अहम मोड़ आ गया है। ये फैसला सिर्फ एक कानूनी कार्यवाही का अंत नहीं, बल्कि उन परिवारों के लिए एक बड़ी राहत है जिन्होंने अपने प्रियजनों को खोया था।
इतने लंबे इंतजार के बाद, जब न्याय की जीत होती है, तो उसका संतोष कुछ और ही होता है। अब ये कहा जा सकता है कि कानून की प्रक्रिया भले ही धीमी हो, लेकिन अंत में दोषियों को उनके किए की सज़ा मिलती ही है।
कुल मिलाकर, न्याय की डगर पर चला ये लंबा सफर, एक निर्णायक मोड़ पर आकर रुका है, जहाँ अपराध की जीत नहीं, बल्कि कानून और इंसाफ की जीत हुई है।





































