दिल्ली: आजकल हर तरफ एक ही शब्द गूंज रहा है – AI! Artificial Intelligence. कंपनियां, ऑफिस, बड़े-बड़े बॉस, सब चाहते हैं कि उनका काम AI से हो जाए, मिनटों में हो जाए. सुबह की मीटिंग से लेकर रात के डिनर तक, AI ही AI है. ऐसा लगता है मानो कोई जादू की छड़ी मिल गई हो जो सारे मसले हल कर देगी. लेकिन क्या वाकई ऐसा है? क्या सिर्फ AI को अपने सिस्टम में फिट कर देने भर से सारे अटके काम चल पड़ते हैं, सारी दिक्कतें दूर हो जाती हैं? ये सवाल सिर्फ हम नहीं पूछ रहे, बल्कि दुनिया भर के एक्सपर्ट भी इस पर माथापच्ची कर रहे हैं.
आप ही सोचिए, किसी भी ऑफिस में टाइम क्यों बर्बाद होता है? क्या इसलिए कि आपके पास AI टूल्स नहीं हैं? या इसलिए कि कोई बहुत बड़ा 'चैलेंज' है? अरे नहीं यार! असल में टाइम बर्बाद होता है क्योंकि काम करने के पुराने तरीके ही गड़बड़ हैं. जैसे, कोई कॉन्ट्रैक्ट बनाना है या उसे अप्रूव कराना है.
आज भी वो काम अलग-अलग सिस्टम में, अलग-अलग ईमेल इनबॉक्स में, डॉक्यूमेंट के अलग-अलग वर्जन में घूमता रहता है. एक फाइल इधर से उधर, फिर उधर से इधर.
..
बस इसी में लग जाती है पूरी जिंदगी! फिर चाहे आपके पास दुनिया का सबसे धांसू AI टूल क्यों न हो, अगर बेसिक 'वर्कफ्लो' ही खराब है, तो AI भी बेचारा क्या कर लेगा?
तो आखिर AI का सही इस्तेमाल क्या है?
एक्सपर्ट्स का मोटा-मोटी कहना यही है कि AI तब ही काम का है, जब उसे उस जगह लगाया जाए जहां असल में काम होता है. मतलब, AI को सिर्फ एक 'लेयर' की तरह ऊपर से नहीं थोपना चाहिए.
उसे तो पूरे सिस्टम के अंदरूनी हिस्से में ऐसे बैठाना चाहिए, कि वो छोटे-मोटे, बार-बार दोहराए जाने वाले कामों को खुद-ब-खुद निपटा दे. पॉलिसी चेक कर ले, टीम्स को फटाफट आगे बढ़ने में मदद करे.
इससे क्या होगा? इससे जो हमारे टैलेंटेड लोग हैं, वो रोज-रोज के छोटे-मोटे 'एडमिन' कामों में नहीं उलझेंगे. उन्हें वो काम करने का मौका मिलेगा, जहां उनका दिमाग, उनकी सूझबूझ, उनकी बातचीत की स्किल्स चाहिए होती हैं.
यही तो असली 'ग्रोथ' है, यही तो असली 'इंट्रेस्ट' है.
आपकी कंपनी भी शायद AI के फायदे गलत जगह ढूंढ रही है. अक्सर कंपनियां सोचती हैं कि AI टूल्स की कमी है, लेकिन असली दिक्कत तो उन 'वर्कफ्लो' में है जो खराब तरीके से डिजाइन किए गए हैं और जिनकी तरफ किसी का ध्यान ही नहीं जाता.
जैसे, जब कॉन्ट्रैक्ट अप्रूवल की बात आती है, तो खराब सिस्टम की वजह से क्या-क्या नुकसान होते हैं? रेवेन्यू धीरे आता है, क्योंकि कॉन्ट्रैक्ट अटक जाते हैं. मैन्युअल तरीके से एक-एक चीज को चेक करने में माथापच्ची होती है, बोरिंग काम बढ़ता है.
कौन से बदलाव हुए, कहां रिस्क है, इसकी सही जानकारी नहीं मिलती. और तो और, लीगल, प्रोक्योरमेंट और एचआर जैसी टीम्स पर बेवजह का प्रेशर पड़ता है.
क्या ये सब फायदे हैं AI के?
क्या AI सिर्फ एक 'लेयर' है या 'रीडिजाइन' का मौका?
Stéphane Barberet, जो Docusign में EMEA के जनरल मैनेजर हैं, उनका कहना साफ है: "AI प्रोजेक्ट्स तब खराब परफ़ॉर्म करते हैं जब उन्हें खराब प्रोसेसेस पर बस चिपका दिया जाता है." वे कहते हैं कि AI को सीधे-सीधे किसी टूटे-फूटे प्रोसेस पर फिट करने के बजाय, हमें अपने मौजूदा प्रोसेसेस को फिर से डिजाइन करना चाहिए, या फिर उन्हें पूरी तरह नए सिरे से सोचना चाहिए.
उनका मानना है कि कई यूजर AI को सिर्फ एक परत की तरह देखते हैं, लेकिन गहरे और असली नतीजे तब मिलते हैं, जब आप ये सोचते हैं कि टीम्स के बीच काम कैसे बंटता है, कैसे टास्क एक जगह से दूसरी जगह जाते हैं, और लोग एक-दूसरे से कैसे इंटरैक्ट करते हैं. यानी, AI सिर्फ एक नया टूल नहीं, बल्कि काम करने के तरीके को ही बदलने का एक मौका है.
आप ही बताइए, अगर कोई कार खराब है, तो क्या उसमें नया म्यूजिक सिस्टम लगाने से वो ठीक हो जाएगी? नहीं न! पहले इंजन ठीक करना होगा, पहिये देखने होंगे, फिर बाकी सब. AI का भी कुछ ऐसा ही हाल है.
पहले अपने काम करने के तरीकों को ठीक करो, फिर AI को उसमें शामिल करो. तब जाकर असली कमाल होगा.
अगर हम 'कॉन्ट्रैक्ट मैनेजमेंट' की बात करें, जिसे अब 'एग्रीमेंट वर्क' कहना ज्यादा सही होगा, तो यह एक शानदार उदाहरण है. यह चीज रेवेन्यू, सप्लायर मैनेजमेंट, हायरिंग और कंप्लायंस – हर जगह काम आती है.
लेकिन आज भी इसे अक्सर टुकड़ों में, मैनुअल रिव्यूज के साथ चलाया जाता है. मतलब, एक काम एक डिपार्टमेंट करेगा, फिर दूसरे को फॉरवर्ड करेगा, फिर वो तीसरे को.
..
और इस पूरी प्रक्रिया में पता नहीं कितनी बार 'हैंडऑफ़' होते हैं, कितनी बार लोग अपनी राय देते हैं, कितनी बार डॉक्यूमेंट्स में बदलाव होते हैं.
Deloitte की एक रिसर्च है, जो इस समस्या को 'एग्रीमेंट ट्रैप' कहती है. उनका अनुमान है कि खराब एग्रीमेंट मैनेजमेंट की वजह से कंपनियों को भारी नुकसान होता है.
सिर्फ टाइम और 'वैल्यू' ही नहीं गंवाई जाती, बल्कि इसका ग्लोबल इकोनॉमी पर भी बुरा असर पड़ता है. रिसर्च कहती है कि दुनिया भर में करीब 2 ट्रिलियन डॉलर का नुकसान सिर्फ इसी 'एग्रीमेंट ट्रैप' की वजह से होता है.
अब सोचिए, कितना बड़ा आंकड़ा है यह! यह पैसे सिर्फ इसलिए बर्बाद हो रहे हैं क्योंकि हम अपने वर्कफ्लो को ढंग से डिजाइन नहीं कर रहे, और AI को सिर्फ एक फैशन की तरह इस्तेमाल करने की सोच रहे हैं.
तो बात सीधी है, AI से फायदा तभी होगा जब वो आपके काम को आसान बनाए, उन दिक्कतों को दूर करे, जो सालों से चली आ रही हैं. सिर्फ AI को 'जोड़' देने भर से कुछ नहीं होगा, उसे 'जोड़कर' काम के तरीके को 'बदलना' होगा.
तभी असली 'वैल्यू' मिलेगी, और तभी हम भविष्य के लिए तैयार हो पाएंगे. नहीं तो ये 'AI का जादू' सिर्फ एक जुमला बनकर रह जाएगा, और हम पुरानी गलतियां दोहराते रहेंगे.






































