कोलकाता: इस शहर की पीली टैक्सियां सिर्फ सवारी ढोने का काम नहीं करतीं, बल्कि अपने अंदर कई अनकही कहानियां भी समेटे रहती हैं। ऐसी ही एक कहानी है रवींद्रनाथ सरकार की। उम्र के उस पड़ाव पर, जब लोग आराम से घर बैठना चाहते हैं, 80 साल के रवींद्रनाथ हर सुबह अपनी पीली टैक्सी का स्टीयरिंग संभाल लेते हैं। उनका दिन सुबह 6 बजे शुरू होता है और अक्सर रात के 11 बजे तक चलता है, यानी करीब 16 घंटे की grueling ड्राइव।
क्या लगता है, ये सब वो किसी शौक के लिए करते हैं? नहीं, बिल्कुल नहीं। ये उनकी मजबूरी है, उनकी 67 साल की बीमार पत्नी का इलाज और घर का गुजारा।
उनके कंधों पर सिर्फ किराए की टैक्सी का बोझ नहीं, बल्कि एक जिंदगी को संभालने की जिम्मेदारी है।
इस उम्र में भी क्यों नहीं रुकते रवींद्रनाथ?
बता दें कि रवींद्रनाथ और उनकी पत्नी की कोई संतान नहीं है। यानी इस उम्र में उनका कोई सहारा नहीं।
जो कुछ भी रवींद्रनाथ टैक्सी चलाकर कमाते हैं, उसी से घर चलता है और दवाइयों का इंतजाम होता है। लेकिन दिक्कत ये है कि उनकी कमाई अक्सर दवाइयों के बढ़ते खर्च के आगे कम पड़ जाती है।
रवींद्रनाथ पिछले करीब 52 सालों से गाड़ी चला रहे हैं, एक लंबा समय। उन्होंने कोलकाता की सड़कों के न जाने कितने रूप देखे होंगे, लेकिन आज जो चुनौती उनके सामने है, वो शायद पहले कभी नहीं आई।
सोचिए, 80 साल की उम्र में जब शरीर साथ छोड़ना चाहता है, तो हर सुबह उठकर 16 घंटे तक टैक्सी चलाना कितना मुश्किल होगा। लेकिन उनके चेहरे पर शिकन नहीं दिखती, क्योंकि उन्हें पता है कि अगर वो रुके, तो उनकी पत्नी का क्या होगा।
यही जज्बा उनकी रग-रग में दौड़ रहा है।
सोशल मीडिया पर चैताली बोस नाम की एक यूजर ने जब इस बुजुर्ग जोड़े की कहानी और संघर्ष का वीडियो शेयर किया, तो लोगों का दिल पसीज गया। वीडियो में दम दम के रेलवे ट्रैक के पास रहने वाले इस कपल की हालत देखकर हजारों आंखें नम हो गईं।
चैताली ने लोगों से अपील की है कि वे रवींद्रनाथ और उनकी पत्नी की मदद के लिए आगे आएं।
कौन सी बीमारियां हैं इस बुजुर्ग जोड़े को?
ये कहानी सिर्फ आर्थिक तंगी की नहीं, बल्कि सेहत से जुड़ी चुनौतियों की भी है। चैताली बोस ने बताया कि रवींद्रनाथ खुद लंबे समय से अस्थमा से जूझ रहे हैं।
सांस लेने में तकलीफ के बावजूद, वो गाड़ी चलाना नहीं छोड़ते। वहीं, उनकी पत्नी दिल की बीमारी से परेशान हैं, जिसके लिए लगातार दवाइयां और इलाज जरूरी है।
इन दवाइयों का खर्च ही उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा खा जाता है।
ऐसे में, टैक्सी चलाने से जो कुछ भी आता है, वो बस दवाइयों और दो वक्त की रोटी के लिए ही काफी होता है। और सबसे बड़ी बात, रवींद्रनाथ अपनी सवारी से कभी ज्यादा किराया नहीं मांगते।
वो उतना ही लेते हैं, जितना उन्हें सही लगता है, अपनी ईमानदारी और स्वाभिमान को बनाए रखते हुए।
कैसा है इनका आशियाना, जहां बरसता है पानी?
जिस घर में ये जोड़ा रहता है, उसकी हालत भी इनकी जिंदगी की तरह ही मुश्किलों से भरी है। दम दम में रेलवे ट्रैक के पास एक टीन का छोटा सा घर है इनका।
ये कोई पक्का मकान नहीं है। मॉनसून के दिनों में तो छत टपकती है, और बारिश का पानी सीधे घर के अंदर आ जाता है।
सोचिए, इस उम्र में, जब शरीर बीमारियों का घर बन चुका हो, ऐसी टपकती छत के नीचे रहना कितना कष्टदायक होगा।
छत की मरम्मत कराना उनके लिए एक बड़ा चैलेंज है, क्योंकि इसके लिए पैसे चाहिए, और उनके पास इतने पैसे नहीं हैं। हर बारिश के साथ उनकी परेशानी और बढ़ जाती है।
ये सिर्फ एक छत नहीं है, ये एक उम्मीद है जो हर मॉनसून में कमजोर पड़ती जाती है।
सोशल मीडिया पर क्या कह रही है पब्लिक?
चैताली बोस का वीडियो जैसे ही ऑनलाइन आया, इसने लोगों के दिलों को छू लिया। हजारों लोगों ने इसे देखा, शेयर किया और इस पर अपनी राय दी।
एक यूजर ने लिखा, "जिन लोगों ने अपनी जिंदगी सम्मान के साथ काम करते हुए बिताई है, उन्हें कभी भी अपने बुढ़ापे के दिन गुजारा करने के लिए संघर्ष करते हुए नहीं बिताना चाहिए। अगर हम थोड़ी सी भी मदद कर सकते हैं, तो हमें करनी चाहिए।
दया कोई दान नहीं है, बल्कि एक-दूसरे के प्रति हमारा फर्ज है।"
क्या ये बात सोचने वाली नहीं है? वाकई, हमारे समाज में ऐसे बुजुर्गों की मदद करना हमारा नैतिक कर्तव्य है, जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी दूसरों की सेवा में या मेहनत करके बिताई है। ऐसे लोग कभी किसी से भीख नहीं मांगते, बल्कि चुपचाप अपनी नियति से लड़ते रहते हैं।
एक और यूजर ने अपनी भावनाएं व्यक्त करते हुए कहा, "ऐसे हालात में लोगों को भीख तक मांगनी पड़ती है और वे इस उम्र में..
." उन्होंने आगे शायद यही कहा होगा कि लोग इस उम्र में भीख मांगने को मजबूर हैं, लेकिन रवींद्रनाथ अपनी मेहनत पर भरोसा कर रहे हैं।
ये बात हर किसी को भावुक कर गई। रवींद्रनाथ और उनकी पत्नी की कहानी सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि समाज का एक आइना है।
ये हमें सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर ऐसे हालात क्यों बनते हैं और हम एक समाज के तौर पर उनकी मदद के लिए क्या कर सकते हैं। चैताली बोस ने सही कहा, जिस तरह से भी हो सके, हमें उनकी मदद के लिए आगे आना चाहिए।





































