लखनऊ: मंगलवार को उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में एक ऐसी गहमागहमी देखने को मिली, जो किसी चुनावी रैली से कम नहीं थी। बात बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर के अस्थि कलश की हो रही थी, जिसे विस्थापित करने की कथित कोशिशों के खिलाफ रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (RPI) ने सड़कों पर उतरकर बिगुल फूंक दिया। हजरतगंज चौराहे से विधान भवन के सामने स्थित बाबा साहब के अस्थि कलश स्थल तक एक विरोध मार्च निकालने की कोशिश की गई, लेकिन पुलिस ने चाक-चौबंद इंतजाम कर इसे बीच में ही रोक दिया। पूरा इलाका नीले झंडों और "बाबा साहब अमर रहें" के नारों से गूंज उठा, लेकिन पुलिस की भारी तैनाती ने प्रदर्शनकारियों को आगे बढ़ने से रोक दिया।
यह विरोध प्रदर्शन सिर्फ एक साधारण नारेबाजी नहीं थी, बल्कि संविधान निर्माता और सामाजिक न्याय के पुरोधा डॉ. भीमराव अंबेडकर के प्रति आस्था और सम्मान का प्रदर्शन था।
रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया के कार्यकर्ता हाथों में नीले झंडे और बाबा साहब के चित्र लेकर सरकार के खिलाफ जोरदार नारेबाजी कर रहे थे। उनका आरोप था कि अस्थि कलश को विस्थापित करने की कोशिशें उनकी आस्था के साथ सीधा खिलवाड़ है, जिसे किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
पुलिस बल ने अटल चौक से शुरू होने वाले इस मार्च को रोकने के लिए पुख्ता इंतजाम किए थे, जिससे कोई अप्रिय घटना न घटे।
अस्थि कलश पर गरमाया सियासी पारा: क्या है पूरा मामला?
रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया के प्रदेश अध्यक्ष पवन भाई गुप्ता ने मीडिया से बात करते हुए इस पूरे मामले पर अपनी पार्टी का रुख साफ किया। उन्होंने जोर देकर कहा कि, "डॉ.
भीमराव अंबेडकर केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि देश के संविधान निर्माता और सामाजिक न्याय, समानता तथा लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रतीक हैं।" गुप्ता ने कहा कि ऐसे में उनसे जुड़े किसी भी स्मारक या धरोहर के साथ किसी भी तरह की लापरवाही या छेड़छाड़ स्वीकार नहीं की जाएगी।
उनके मुताबिक, यह अस्थि कलश सिर्फ एक ढांचा नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है, और इससे खिलवाड़ करना सीधे तौर पर देश की एक बड़ी आबादी की भावनाओं को आहत करने जैसा है।
पवन भाई गुप्ता ने आगे बताया कि उनकी पार्टी अटल चौक पर स्थित बाबा साहब की प्रतिमा से अस्थि कलश स्थल तक एक शांतिपूर्ण पैदल यात्रा निकालने की तैयारी में थी, लेकिन भारी पुलिस बल लगाकर उन्हें रोक दिया गया। यह अस्थि कलश, जिसे 1991 में विधान भवन के बगल में स्थापित किया गया था, तब से दलित समाज और अंबेडकरवादी विचारधारा के लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण आस्था का केंद्र बना हुआ है।
उन्होंने याद दिलाया कि बाद में तत्कालीन मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह ने बाबा साहब की प्रतिमा का अनावरण भी इसी स्थल पर किया था, जिससे इसकी ऐतिहासिक और भावनात्मक महत्ता और बढ़ जाती है।
गुप्ता ने अपनी बात रखते हुए कहा कि, "आज अचानक इस अस्थि कलश को विस्थापित करने की बात कही जा रही है। पूरे भारत के लोगों की आस्था इसमें है और उसी आस्था से खिलवाड़ की कोशिश हो रही है।
" उन्होंने स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी कि रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया इसे बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं करेगी और इस लड़ाई को हर कीमत पर लड़ेगी। उनका दावा था कि पार्टी किसी भी स्थिति में अस्थि कलश को विस्थापित नहीं होने देगी।
महा आंदोलन की चेतावनी और देशव्यापी विरोध
विरोध प्रदर्शन के दौरान, RPI ने सरकार को कड़ी चेतावनी दी। पवन भाई गुप्ता ने घोषणा की कि अगर अस्थि कलश को विस्थापित करने की कोशिशें बंद नहीं की गईं, तो इसके गंभीर परिणाम होंगे।
उन्होंने बताया कि उनकी पार्टी के कार्यकर्ता पूरे उत्तर प्रदेश के 75 जनपदों में ज्ञापन देकर इस सरकारी कदम का विरोध करेंगे। यह विरोध सिर्फ लखनऊ तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि प्रदेश के कोने-कोने तक अंबेडकरवादियों की आवाज पहुंचेगी।
अगर इन ज्ञापन और छोटे विरोध प्रदर्शनों के बावजूद भी सरकार द्वारा अस्थि कलश से छेड़छाड़ का प्रयास किया जाता है, तो रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया ने 9 अगस्त को लखनऊ में एक "महा आंदोलन" करने की चेतावनी दी है। यह महा आंदोलन, जैसा कि पवन भाई गुप्ता ने बताया, व्यापक स्तर पर होगा और इसमें बड़ी संख्या में कार्यकर्ता और समर्थक शामिल होंगे।
उनका मानना है कि यह केवल एक राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के आत्मसम्मान और सांस्कृतिक विरासत का सवाल है, जिस पर कोई समझौता नहीं किया जा सकता। उन्होंने यह भी जोड़ा कि बाबा साहब के सम्मान के लिए वे किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं।
पुलिस ने जहां मंगलवार को प्रदर्शनकारियों को आगे बढ़ने से रोक दिया, वहीं RPI नेताओं ने साफ कर दिया कि यह केवल शुरुआत है। उनके तेवर बता रहे थे कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा और गरमा सकता है।
लखनऊ की सड़कों पर नीले झंडों और नारों का यह शोर, अंबेडकर के आदर्शों और विरासत को बचाने की लड़ाई का प्रतीक बन गया है। अब देखना होगा कि सरकार इस चेतावनी पर क्या रुख अपनाती है और क्या 9 अगस्त को लखनऊ फिर से एक बड़े आंदोलन का गवाह बनता है या नहीं।
RPI का कहना है कि वे अपनी मांग पूरी होने तक शांत नहीं बैठेंगे।

