लखनऊ: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से एक ऐसी खबर आई है, जिसने मेडिकल साइंस की दुनिया में उम्मीद की एक नई किरण जगा दी है। यहां के प्रतिष्ठित डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान (RMLIMS) के डॉक्टरों ने एक ऐसा कमाल कर दिखाया है, जिसकी चर्चा दूर-दूर तक हो रही है। सोचिए, एक 51 साल की महिला जो पिछले दो साल से भयंकर दर्द और लगातार टूटती हड्डियों से जूझ रही थी, उसे डॉक्टरों की एक टीम ने 'की-होल' सर्जरी जैसी आधुनिक तकनीक से नई ज़िंदगी बख्श दी। ये कोई छोटी-मोटी सर्जरी नहीं थी, बल्कि एक बेहद दुर्लभ और जटिल ट्यूमर का ऑपरेशन था, जिसे संस्थान में पहली बार इस तरीके से सफलतापूर्वक अंजाम दिया गया।
कहानी शुरू होती है एक 51 साल की महिला से, जिनके लिए पिछले दो साल किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं थे। उन्हें बार-बार कुल्हे की हड्डी में फ्रैक्चर हो रहा था, यानी हड्डियां इतनी कमजोर हो गई थीं कि जरा सी चोट पर भी टूट जाती थीं।
इस लगातार के दर्द और परेशानी ने उनका जीना मुहाल कर दिया था। कोई समझ नहीं पा रहा था कि आखिर उनकी हड्डियों को क्या हो गया है।
डॉक्टरों ने जब जांच की तो जो बीमारी सामने आई, वो भी अपने आप में बेहद खास और दुर्लभ थी - 'प्राइमरी हाइपरपैराथायरॉयडिज्म'। ये एक ऐसी स्थिति है जिसमें शरीर में पैराथायरॉयड हार्मोन का स्तर बढ़ जाता है, जिससे कैल्शियम का संतुलन बिगड़ जाता है और हड्डियां कमजोर होने लगते हैं।
बीमारी का अनोखा और खतरनाक रूप
जांचों का सिलसिला यहीं नहीं थमा। जब महिला के शरीर की और गहरी पड़ताल की गई, तो एक हैरान कर देने वाली बात सामने आई।
इमेजिंग रिपोर्ट्स में डॉक्टरों ने पाया कि महिला के सीने के भीतर, ठीक हृदय और शरीर की मुख्य रक्त वाहिनियों के पास, करीब 5.5 सेंटीमीटर का एक पैराथायरॉयड एडेनोमा मौजूद था।
ये कोई आम ट्यूमर नहीं था। मेडिकल भाषा में इसे 'मीडियास्टाइनल पैराथायरॉयड एडेनोमा' कहते हैं।
इसकी खासियत ये है कि प्राइमरी हाइपरपैराथायरॉयडिज्म के कुल मरीजों में से केवल 5 से 10 प्रतिशत लोगों में ही यह इतने दुर्लभ स्थान पर पाया जाता है। कल्पना कीजिए, शरीर के सबसे नाजुक हिस्सों में से एक में, इतनी बड़ी गांठ का होना कितना खतरनाक हो सकता है!
इस ट्यूमर की वजह से महिला के शरीर में पैराथायरॉयड हार्मोन का उत्पादन अत्यधिक हो रहा था, जिसका सीधा असर उनकी हड्डियों पर पड़ रहा था। उनकी हड्डियां धीरे-धीरे घुल रही थीं, कमजोर हो रही थीं, और इसी वजह से बार-बार फ्रैक्चर हो रहे थे।
डॉक्टरों के सामने अब एक बड़ी चुनौती थी। इस ट्यूमर को निकालना बेहद जरूरी था, लेकिन इसकी लोकेशन इतनी संवेदनशील थी कि किसी भी तरह की गलती जानलेवा साबित हो सकती थी।
हृदय और बड़ी रक्त वाहिनियों के इतने करीब ट्यूमर होने का मतलब था कि ऑपरेशन में जरा सी भी चूक बड़ा खतरा पैदा कर सकती थी।
'की-होल' सर्जरी की बारीकी और चुनौती
डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान के डॉक्टरों ने इस चुनौती को स्वीकार किया।
उन्होंने फैसला किया कि वे इस दुर्लभ ट्यूमर को 'की-होल' सर्जरी तकनीक से निकालेंगे। इसे 'वीडियो-असिस्टेड थोराकोस्कोपिक' सर्जरी भी कहते हैं।
इस तकनीक में ओपन सर्जरी की तरह बड़ा चीरा लगाने की बजाय, शरीर में छोटे-छोटे छेद करके एक कैमरा और सर्जिकल उपकरण डाले जाते हैं। कैमरा अंदर के हिस्से की तस्वीर को बड़ी स्क्रीन पर दिखाता है, जिससे डॉक्टर सटीक तरीके से ऑपरेशन कर पाते हैं।
यह तकनीक मरीज के लिए कम दर्दनाक होती है, रिकवरी भी जल्दी होती है, लेकिन इसमें डॉक्टरों को बहुत ज्यादा विशेषज्ञता और अनुभव की जरूरत होती है, खासकर जब मामला इतना जटिल हो।
सर्जरी टीम का नेतृत्व कर रहे थे डॉ. अश्विनी राहलकर, डॉ.
साराह इदरीस और डॉ. मिथुन राम।
इन तीनों ने मिलकर प्रो. एस.
के. मिश्रा के कुशल मार्गदर्शन में इस जटिल ऑपरेशन को अंजाम दिया।
सबसे बड़ी चुनौती थी ट्यूमर को बिना फटे और हृदय व मुख्य रक्त वाहिनियों को बिना कोई नुकसान पहुंचाए सुरक्षित बाहर निकालना। सोचिए, एक 5.
5 सेंटीमीटर का ट्यूमर, जो शरीर के सबसे महत्वपूर्ण अंगों के पास हो, उसे छोटी-छोटी कटिंग करके बाहर निकालना कितना मुश्किल रहा होगा। डॉक्टरों की टीम ने अपनी पूरी विशेषज्ञता और सावधानी से एक-एक कदम आगे बढ़ाया।
एनेस्थीसिया टीम का अहम योगदान
किसी भी जटिल सर्जरी में सिर्फ सर्जन ही नहीं, बल्कि एनेस्थीसिया टीम का भी उतना ही महत्वपूर्ण योगदान होता है। इस मामले में भी एनेस्थीसिया टीम ने एक ऐसा कमाल किया, जिसकी वजह से सर्जरी संभव हो पाई।
प्रो. दास के निर्देशन में डॉ.
दुर्गा प्रसाद, डॉ. अंशिका और डॉ.
गोविंद की टीम ने एक अनूठी रणनीति अपनाई। उन्होंने सर्जरी के दौरान महिला के एक फेफड़े को अस्थायी रूप से निष्क्रिय कर दिया।
इसका मतलब यह था कि मरीज का केवल एक ही फेफड़ा काम कर रहा था, जबकि दूसरा फेफड़ा शांत पड़ा था ताकि सर्जिकल टीम को ट्यूमर तक पहुंचने और उसे निकालने के लिए पर्याप्त जगह मिल सके। दूसरे फेफड़े के सहारे मरीज को सुरक्षित वेंटिलेशन मिलता रहा, जिससे ऑक्सीजन की कमी न हो।
यह तकनीक बेहद संवेदनशील होती है और इसमें पल-पल मरीज की स्थिति पर नजर रखनी पड़ती है। एनेस्थीसिया टीम की इस बुद्धिमत्ता और कुशलता के बिना यह सर्जरी शायद उतनी सुरक्षित तरीके से नहीं हो पाती।
घंटों चली इस सर्जरी के बाद, डॉक्टरों की टीम ने आखिरकार उस 5.5 सेंटीमीटर के दुर्लभ पैराथायरॉयड एडेनोमा को सफलतापूर्वक बाहर निकाल लिया।
सर्जरी पूरी तरह सफल रही। महिला को अब इस गंभीर बीमारी से निजात मिल चुकी है, और उन्हें एक तरह से नई जिंदगी मिल गई है।
RMLIMS में इस तरह की 'की-होल' सर्जरी पहली बार की गई है, और इसकी सफलता ने संस्थान के डॉक्टरों की क्षमता और यहां उपलब्ध अत्याधुनिक सुविधाओं को एक बार फिर साबित कर दिया है। यह सिर्फ एक महिला की कहानी नहीं है, बल्कि यह उन हजारों मरीजों के लिए उम्मीद की कहानी है, जो दुर्लभ और जटिल बीमारियों से जूझ रहे हैं और बेहतर इलाज की तलाश में हैं।

