नई दिल्ली: आजकल डेटा चोरी की खबरें आम हो गई हैं, कभी किसी कंपनी का डेटा लीक होता है, तो कभी किसी बैंक का. लेकिन, क्या आपने कभी सोचा है कि आपकी जो पर्सनल जानकारी, आपका बैंक अकाउंट नंबर या क्रेडिट कार्ड डीटेल्स आज एन्क्रिप्टेड (सुरक्षित कोड) हैं, वो कुछ सालों बाद किसी के हाथ लग सकती हैं? वो भी तब, जब आपको लगे कि भैया, वो वाला मामला तो कब का ठंडा हो चुका है. जी हां, बात हो रही है क्वांटम कंप्यूटिंग की, जो चुपचाप आपके डेटा को खतरे में डाल रही है, और आपको इसका अंदाज़ा भी नहीं है.
अक्सर हम सोचते हैं कि जो डेटा आज चोरी हुआ है, उसे आज ही डिक्रिप्ट किया जाएगा. अगर आज हैकर उसे तोड़ नहीं पाया, तो कहानी खत्म! लेकिन, साइबर सिक्योरिटी के एक्सपर्ट्स की मानें तो ये सोच अब पुरानी हो चुकी है.
क्वांटम कंप्यूटिंग ने साइबर दुनिया का पूरा गेम ही पलट दिया है. अब चोरों को डेटा चुराकर तुरंत खोलने की ज़रूरत नहीं पड़ती.
वे डेटा को ‘हार्वेस्ट नाउ, डिक्रिप्ट लेटर’ (HNDL) के कॉन्सेप्ट पर काम कर रहे हैं.
यानी, आज डेटा चुराओ, स्टोर करो और जब क्वांटम कंप्यूटर इतने पावरफुल हो जाएं कि वो दुनिया की कोई भी एन्क्रिप्शन तोड़ सकें, तब इसे खोलो और इस्तेमाल करो. मतलब, आपका डेटा बैंक में पड़ा पैसा नहीं है कि समय के साथ उसकी वैल्यू कम हो जाएगी.
ये तो एक ऐसी तिजोरी है जिसकी चाबी आज नहीं मिली, तो कल मिल जाएगी.
तो आखिर ये क्वांटम कंप्यूटिंग है क्या बला और कैसे बन रहा खतरा?
क्वांटम कंप्यूटिंग एक नई तरह की तकनीक है, जो आज के सुपर कंप्यूटर से भी कई गुना ज़्यादा ताकतवर मानी जाती है. अभी ये पूरी तरह से विकसित नहीं हुई है, लेकिन इस पर तेज़ी से काम चल रहा है.
एक्सपर्ट्स का मानना है कि आने वाले सालों में ये इतनी ताकतवर हो जाएगी कि मौजूदा एन्क्रिप्शन सिस्टम को पलक झपकते ही तोड़ देगी. आपकी सारी ऑनलाइन ट्रांजेक्शन, ईमेल, चैट्स और दूसरी संवेदनशील जानकारी जिस एन्क्रिप्शन से सुरक्षित हैं, वो सब इसके सामने ढीली पड़ जाएंगी.
क्रिस हैरिस, जो कि थेल्स (Thales) में डेटा सिक्योरिटी प्रोडक्ट्स के EMEA टेक्निकल एसोसिएट वाइस प्रेसिडेंट हैं, उनका कहना है कि लोग क्वांटम के खतरों को अभी भी भविष्य की एक काल्पनिक चीज़ मानते हैं. लेकिन, ये सोच अब पुरानी हो चुकी है.
उनके मुताबिक, असली खतरा किसी दूर के ब्रेकथ्रू से नहीं जुड़ा है, बल्कि आज डेटा को कैसे एक्सपोज और हैंडल किया जा रहा है, उसी में छिपा है.
उन्होंने बताया कि क्वांटम सिर्फ अपनी ताकत से नहीं, बल्कि जिस तरह से ये डेटा ब्रीच के पूरे लाइफसाइकिल को बदल देता है, उससे ये पिछले साइबर सिक्योरिटी खतरों से अलग है. पहले क्या होता था? अगर डेटा चोरी हुआ, तो आज ही उसे डिक्रिप्ट करने की कोशिश होती थी.
नहीं हुआ तो ठीक है, मामला खत्म. लेकिन अब ऐसा नहीं है.
'अभी चुराओ, बाद में खोलो' – ये नई चाल क्या है?
क्रिस हैरिस के मुताबिक, अब हमलावर डेटा चुराते हैं, उसे जमा करके रखते हैं और सालों बाद जब क्वांटम कंप्यूटिंग अपनी पूरी ताकत पर होगी, तब उसे खोलते हैं. उनका सीधा-सा फंडा है – ‘हार्वेस्ट नाउ, डिक्रिप्ट लेटर’ (HNDL).
इसका मतलब है कि हमलावरों को आज एन्क्रिप्शन तोड़ने की ज़रूरत नहीं है. उन्हें बस ऐसे डेटा तक पहुंच चाहिए, जो भविष्य में भी उनके लिए काम का हो, यानी उसकी वैल्यू बनी रहे.
सोचिए, आज से 5 साल पहले किसी कंपनी का डेटा ब्रीच हुआ. उस वक्त कंपनी ने सोचा होगा कि हमने सब कंट्रोल कर लिया, डेटा सुरक्षित है.
लेकिन, अगर वो डेटा एन्क्रिप्टेड फॉर्म में किसी हैकर के हाथ लगा है, तो आज से कुछ सालों बाद, जब क्वांटम कंप्यूटर आएंगे, वही पुराना डेटा उनके लिए सोने की खान बन सकता है. जो घटना उस वक्त छोटी और खत्म मान ली गई थी, वो भविष्य में कहीं ज़्यादा बड़े और नुकसानदेह एक्सपोजर में बदल सकती है.
पारंपरिक सुरक्षा सोच क्या कहती है? वो कहती है कि अगर कोई ब्रीच पता चल जाए और उसे रोक लिया जाए, तो समय के साथ उसका रिस्क कम होता जाता है. लेकिन, क्वांटम इस लॉजिक को ही उल्टा कर देता है.
कुछ मामलों में, एक ब्रीच का असली असर घटना के सालों बाद सामने आ सकता है. ये एक ऐसा टाइम बम है जो टिक-टिक कर रहा है, और हमें पता भी नहीं.
तो क्या हमारी सारी प्राइवेसी खतरे में है?
ये एक बड़ा सवाल है. अगर पुरानी से पुरानी एन्क्रिप्टेड जानकारी भी क्वांटम कंप्यूटर की वजह से खुल सकती है, तो फिर प्राइवेसी का क्या होगा? आज जो डेटा हम सुरक्षित मानकर शेयर कर रहे हैं, या जो हमारा सालों पुराना रिकॉर्ड है, वो सब खतरे में आ सकता है.
ये सिर्फ कंपनियों की बात नहीं है, हम आम लोगों की निजी जानकारी भी उतनी ही रिस्क पर है.
साइबर सिक्योरिटी के जानकारों का कहना है कि अब कंपनियों और सरकारों को अपनी सुरक्षा नीतियों पर नए सिरे से सोचना होगा. उन्हें 'क्वांटम-सेफ' एन्क्रिप्शन तकनीकों को अपनाना होगा, जो क्वांटम कंप्यूटर के हमलों का भी सामना कर सकें.
क्योंकि, आपकी सबसे बड़ी डेटा चोरी शायद पहले ही हो चुकी है, बस आपको अभी उसका असर दिखना बाकी है.
ये मामला सिर्फ तकनीकी डेवलपमेंट का नहीं, बल्कि हमारी डिजिटल प्राइवेसी और सुरक्षा के भविष्य का है. आने वाला समय बताएगा कि हम इस क्वांटम चैलेंज से कैसे निपटते हैं.
लेकिन एक बात तय है, अब हमें "अभी की सुरक्षा" के साथ-साथ "भविष्य की सुरक्षा" के बारे में भी सोचना होगा.




































