कानपुर नगर: सोचिए, एक केस जो 37 साल तक चलता रहा। जिसमें निचली अदालत ने सजा सुना दी थी, लेकिन फिर अचानक हाईकोर्ट ने एक झटके में तीन आरोपियों को बरी कर दिया। उत्तर प्रदेश के कानपुर नगर से आया ये मामला सिर्फ पुराना नहीं, बल्कि कई गंभीर सवालों को भी खड़ा कर रहा है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस दहेज हत्या के मामले में न सिर्फ जांच पर सवाल उठाए, बल्कि सबूतों की विश्वसनीयता को लेकर भी तगड़ी टिप्पणी कर दी। ये कहानी है एक शादीशुदा महिला की मौत की, जिसने न्याय के लिए तीन दशकों से ज्यादा का इंतजार किया और अब जाकर एक नया मोड़ आया है।
मामला शुरू होता है 1984 में, जब विजय लक्ष्मी की शादी राकेश कुमार मिश्रा, जिन्हें लोग डॉक्टर के नाम से भी जानते थे, से हुई थी। लेकिन शादी के बाद खुशी नहीं, बल्कि ससुराल वालों की तरफ से दहेज की मांग का सिलसिला शुरू हो गया।
रुपयों और व्यापार में साझेदारी को लेकर विजय लक्ष्मी को लगातार परेशान किया जा रहा था। ये सब बातें उसके घरवालों को भी पता थीं, लेकिन शायद किसी ने सोचा नहीं था कि ये मामला इतना गंभीर मोड़ ले लेगा।
फिर वो मनहूस दिन आया – 13 जनवरी, 1986। विजय लक्ष्मी के भाई ने FIR दर्ज कराई।
आरोप लगाया गया कि ससुराल वालों ने उसकी बहन को जबरन कोई जहरीला पदार्थ खिला दिया। हालत बिगड़ी तो उसे कानपुर ले जाया जा रहा था, लेकिन रास्ते में ही उसने दम तोड़ दिया।
पोस्टमार्टम हुआ और शुरुआती जांच में विसरा में जिंक फॉस्फाइड नाम का जहर होने की बात सामने आई। इस रिपोर्ट के आधार पर और बाकी सबूतों को देखते हुए, ट्रायल कोर्ट ने 1989 में विजय लक्ष्मी के पति, ससुर, जेठ और सास को दोषी मानकर सजा सुना दी।
हाईकोर्ट में खुली परतें: एक-एक सबूत की हुई पड़ताल
निचली अदालत के इस फैसले को चुनौती दी गई और मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा। जस्टिस सिद्धार्थ वर्मा और जस्टिस जय कृष्ण उपाध्याय की खंडपीठ ने इस लंबी अपील पर सुनवाई की।
लेकिन यहां जो हुआ, वो पूरे मामले की दिशा बदलने वाला था। कोर्ट ने एक-एक सबूत, एक-एक गवाह के बयान को खंगाला।
और यहीं से अभियोजन पक्ष की कहानी में छेद दिखने शुरू हो गए।
सबसे पहले बात गवाहों के बयानों की। विजय लक्ष्मी के भाई ने कोर्ट में बताया कि उसे 'कुछ खाने के लिए दिया गया था'।
लेकिन वहीं उसके भांजे ने कुछ और ही कहा। भांजे के मुताबिक, 'पानी में कोई पदार्थ मिलाकर जबरन पिलाया गया था'।
हाईकोर्ट ने इस विरोधाभास को हल्के में नहीं लिया। कोर्ट ने साफ कहा कि ऐसे महत्वपूर्ण तथ्यों में अगर गवाहों के बयान आपस में मेल नहीं खाते, तो ये अभियोजन की पूरी कहानी को कमजोर करता है।
जहर की कड़वी सच्चाई और संघर्ष के निशान
कोर्ट सिर्फ बयानों पर ही नहीं रुका, बल्कि उस जहर पर भी गौर किया, जिसे विजय लक्ष्मी की मौत का कारण बताया गया था – जिंक फॉस्फाइड। खंडपीठ ने टिप्पणी की कि जिंक फॉस्फाइड ऐसा जहर नहीं है जिसे किसी को भी आसानी से पिलाया जा सके और वो विरोध न करे।
इसका स्वाद इतना कड़वा और गंध इतनी तेज होती है कि अगर किसी स्वस्थ व्यक्ति को जबरन ये पिलाया जाता, तो वो जरूर संघर्ष करता। उसके शरीर पर विरोध के निशान दिखते।
लेकिन इस मामले में, रिकॉर्ड में ऐसे कोई विश्वसनीय सबूत नहीं थे, जो बताते कि विजय लक्ष्मी ने जान बचाने के लिए कोई संघर्ष किया।
यह एक बहुत बड़ा सवाल था। अगर किसी को जबरदस्ती जहर पिलाया जाता है, तो उसके शरीर पर खरोंच, मारपीट या किसी तरह के संघर्ष के निशान मिलते हैं।
लेकिन जांच में ऐसा कुछ भी सामने नहीं आया। ये बात अभियोजन पक्ष के लिए एक और बड़ी चुनौती बन गई।
विसरा रिपोर्ट पर उठते गंभीर सवाल
अदालत ने जांच प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल उठाए, खासकर विसरा रिपोर्ट को लेकर। विसरा, यानी शरीर के अंदरूनी अंग के नमूने, जो जांच के लिए भेजे जाते हैं, उनकी कस्टडी को लेकर कोर्ट ने कई चीजें पूछीं।
पोस्टमार्टम के बाद विसरा किसकी अभिरक्षा में रहा? उसे किसने सुरक्षित रखा? फॉरेंसिक प्रयोगशाला तक उसे किसने पहुंचाया? और इस पूरी प्रक्रिया का रिकॉर्ड क्या था? इन सवालों का कोई भी संतोषजनक जवाब अभियोजन पक्ष नहीं दे पाया।
सिर्फ इतना ही नहीं, फॉरेंसिक प्रयोगशाला के किसी अधिकारी को भी गवाही के लिए पेश नहीं किया गया। इसका सीधा मतलब था कि विसरा की 'सुरक्षित अभिरक्षा की श्रृंखला' साबित नहीं हो सकी।
यानी, कोर्ट को यह विश्वास नहीं दिलाया जा सका कि जो विसरा जांच के लिए भेजा गया था, वह छेड़छाड़ रहित था और सही तरीके से हैंडल किया गया था। ये एक बड़ी चूक थी, जिसने पूरे मामले पर संदेह के बादल ला दिए।
CRPC की धारा 313: जहां चूक गया अभियोजन
हाईकोर्ट ने एक और बेहद अहम कानूनी बिंदु पर प्रकाश डाला – दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 313। कोर्ट ने कहा कि सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि विसरा रिपोर्ट और उससे संबंधित परिस्थितियों के बारे में आरोपियों से धारा 313 के तहत कोई सवाल ही नहीं पूछा गया।
सुप्रीम कोर्ट के कई पुराने फैसलों का हवाला देते हुए अदालत ने साफ कहा कि जिन परिस्थितियों पर अभियोजन पक्ष किसी को दोषी साबित करना चाहता है, उन्हें आरोपी के सामने रखना अनिवार्य होता है। अगर ऐसा नहीं किया जाता, तो उन परिस्थितियों को आरोपी के खिलाफ सबूत के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
इस मामले में, अभियोजन पक्ष इस अनिवार्य कानूनी प्रक्रिया में भी विफल रहा।
ये एक ऐसी कानूनी अड़चन थी, जिसने अभियोजन के लिए मुश्किलें और बढ़ा दीं। जब आरोपियों को पता ही नहीं था कि उन पर विसरा रिपोर्ट को लेकर क्या आरोप लगाए जा रहे हैं, तो वे अपना बचाव कैसे करते? कोर्ट ने इसे न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ माना।
आरोप से बरी: न्याय के तराजू का नया पलड़ा
इन सभी गंभीर तथ्यों और कानूनी चूकों को ध्यान में रखते हुए, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष हत्या के आरोप को 'संदेह से परे' सिद्ध करने में पूरी तरह विफल रहा है। यानी, जो भी संदेह थे, उन्हें दूर नहीं किया जा सका।
ऐसे में, ट्रायल कोर्ट द्वारा 7 दिसंबर, 1989 को दी गई दोषसिद्धि और सजा को रद्द कर दिया गया।
इस फैसले के बाद, विजय लक्ष्मी के पति, ससुर और जेठ को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया। बता दें कि अपील लंबित रहने के दौरान सास राजदेई का निधन हो गया था।
ये फैसला 37 साल पुराने एक मामले पर पर्दा डालता है, लेकिन साथ ही भारतीय न्याय प्रणाली में जांच की गुणवत्ता और कानूनी प्रक्रियाओं के सही पालन की जरूरत पर भी एक नई बहस छेड़ जाता है।




































