भारत: आजकल हर जुबान पर एक ही नाम है - AI! आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस. चारों तरफ इसकी चर्चा है, कंपनियां इसे अपनाने के लिए दौड़ रही हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिस AI के दम पर दुनिया आगे बढ़ रही है, उसे चलाने वाले बड़े-बड़े डेटा सेंटर कितनी प्यास बुझाते हैं? जी हां, ये टेक्नोलॉजी के गढ़, जो डिजिटल दुनिया का इंजन हैं, भयंकर मात्रा में पानी गटकते हैं. और ये मसला आजकल टेक सेक्टर में सिरदर्द बना हुआ है.
इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) ने जो आंकड़े दिए हैं, वो तो होश उड़ाने वाले हैं. उनके मुताबिक, इस वक्त पूरी दुनिया में डेटा सेंटर हर साल करीब 560 अरब लीटर पानी फूंक रहे हैं.
और ये तो कुछ भी नहीं! एक सरकारी रिपोर्ट का अनुमान है कि अगर यही रफ्तार रही, तो 2030 तक ये आंकड़ा बढ़कर 1.2 खरब लीटर प्रति वर्ष तक पहुंच सकता है. सोचिए, कितना सारा पानी!
कुल मिलाकर, इतनी भारी-भरकम खपत का ज्यादातर हिस्सा डेटा सेंटर्स में होने वाली कूलिंग में जाता है. सर्वर गर्म होते हैं, और उन्हें ठंडा रखने के लिए पानी का इस्तेमाल किया जाता है.
ये एक ऐसा चैलेंज है, जिससे निपटने के लिए अभी से कमर कसना बेहद जरूरी है.
तो आखिर डेटा सेंटर्स को इतने पानी की जरूरत क्यों पड़ती है?
दरअसल, डेटा सेंटर्स के अंदर लाखों सर्वर होते हैं, जो लगातार डेटा को प्रोसेस करते रहते हैं. इस प्रोसेस में बहुत गर्मी पैदा होती है.
अगर इस गर्मी को कंट्रोल न किया जाए, तो सर्वर ओवरहीट होकर खराब हो सकते हैं और पूरे सिस्टम को ठप कर सकते हैं. इसलिए, उन्हें ठंडा रखना बेहद जरूरी है.
और कूलिंग के लिए पानी सबसे सस्ता और आसान जरिया माना जाता रहा है.
लेकिन अच्छी खबर ये है कि इस "पानी पानी" वाले प्रॉब्लम का सलूशन भी मौजूद है. Lenovo में HPC/AI की EMEA डायरेक्टर केट स्टील का तो साफ-साफ कहना है कि डेटा सेंटर अपने यहां पानी की खपत को आसानी से कम कर सकते हैं.
सबसे अच्छी बात ये है कि इससे लोकल फ्रेशवॉटर रिसोर्सेज पर पड़ने वाला बोझ भी घटेगा, साथ ही ऊर्जा की बचत भी होगी, और परफॉरमेंस पर भी रत्ती भर असर नहीं पड़ेगा. है ना कमाल की बात?
केट स्टील बताती हैं कि आज की तारीख में डेटा सेंटर्स में पानी की खपत के पीछे कुछ खास वजहें हैं, और उनसे निपटने के लिए कारगर कदम उठाए जा सकते हैं. चलिए, उनमें से एक बड़े मसले और उसके सलूशन को समझते हैं.
पानी की बर्बादी का सबसे बड़ा खिलाड़ी कौन है?
आजकल कई डेटा सेंटर अभी भी पुराने 'ओपन-लूप इवेपोरेटिव कूलिंग' सिस्टम पर भरोसा करते हैं. ये सिस्टम कैसे काम करता है? इसमें गर्म पानी को बड़े-बड़े पैड्स पर स्प्रे किया जाता है.
जब हवा इन पैड्स से गुजरती है, तो पानी का एक हिस्सा भाप बनकर उड़ जाता है, और बाकी बचा पानी ठंडा हो जाता है. फिर इस ठंडे पानी को सर्वर कूलिंग के लिए इस्तेमाल किया जाता है.
अब आप समझ गए होंगे कि इसमें दिक्कत कहां है. जैसे ही पानी भाप बनकर उड़ता है, वो हमेशा के लिए सिस्टम से बाहर हो जाता है.
मतलब, आपको इस नुकसान की भरपाई के लिए लगातार बाहर से ताजा पानी लाना पड़ता है. ये ऐसा ही है जैसे आप एक बाल्टी में पानी भरें और उस बाल्टी में नीचे की तरफ छेद हो.
पानी डालते जाओ और वो निकलता जाए!
इस तरह की पुरानी कूलिंग आर्किटेक्चर की वजह से डेटा सेंटर बेहिसाब पानी पीते हैं. उन्हें लगातार अपनी पानी की टंकी भरनी पड़ती है, जो कि पर्यावरण के लिए बिल्कुल भी अच्छा नहीं है, खासकर उन इलाकों में जहां पहले से ही पानी की किल्लत है.
ये वाकई एक बड़ी टेंशन वाली बात है.
तो फिर इसका मॉडर्न सलूशन क्या है?
इसका जवाब है 'सील्ड लिक्विड कूलिंग' सिस्टम! ये सिस्टम एक तरह से गेम चेंजर साबित हो रहा है. जैसे नाम से ही पता चल रहा है, इसमें पानी एक बंद सिस्टम के अंदर सर्कुलेट करता है, यानी 'सील्ड' रहता है.
इसमें पानी भाप बनकर उड़ता नहीं है. इसका मतलब ये हुआ कि पानी का एक ही बैच बार-बार इस्तेमाल होता रहता है, और आपको बाहर से नया पानी लगातार भरने की जरूरत नहीं पड़ती.
इस मॉडर्न सिस्टम का सबसे बड़ा प्लस पॉइंट ये है कि यह पानी की बर्बादी को लगभग खत्म कर देता है. पानी अंदर ही अंदर एफिशिएंटली रिसाइकिल होता रहता है.
इससे ना सिर्फ पानी की भारी बचत होती है, बल्कि डेटा सेंटर की परफॉरमेंस पर भी कोई आंच नहीं आती. यानी, सर्वर हमेशा ठंडे और दुरुस्त रहते हैं.
सोचिए, जहां एक तरफ 'ओपन-लूप' सिस्टम में पानी हवा में उड़ता रहता है, वहीं 'सील्ड लिक्विड' सिस्टम पानी की हर बूंद को बचाकर रखता है. ये सीधे-सीधे पर्यावरण के लिए एक बड़ी जीत है और डेटा सेंटर्स के लिए एक स्मार्ट और सस्टेनेबल तरीका है काम करने का.
क्या सिर्फ कूलिंग सिस्टम बदलना ही काफी है?
वैसे तो ये एक बहुत बड़ा कदम है, लेकिन सिर्फ इतना ही नहीं. डेटा सेंटर्स में पानी बचाने के लिए और भी कई तरीके हैं जिन पर गौर किया जा सकता है.
हालांकि, 'सील्ड लिक्विड कूलिंग' एक ऐसा महत्वपूर्ण बदलाव है जिससे पानी की खपत में तुरंत और बड़ा असर दिखता है.
आज जब AI और नई-नई टेक्नोलॉजी रोज नए आयाम छू रही है, तो हमें ये भी सोचना होगा कि ये तरक्की किस कीमत पर आ रही है. अगर हम अपनी डिजिटल भूख के लिए अपने प्राकृतिक संसाधनों को ऐसे ही खर्च करते रहे, तो आने वाले वक्त में बड़ी मुश्किल हो सकती है.
इसलिए, डेटा सेंटर्स को अब पानी बचाने वाले सिस्टम और डिज़ाइन को अपनाना होगा. ये ना सिर्फ उनकी अपनी जिम्मेदारी है, बल्कि हमारे ग्रह के प्रति भी एक फर्ज है.
कुल मिलाकर, टेक्नोलॉजी जितनी एडवांस हो रही है, उसे उतना ही सस्टेनेबल भी बनाना पड़ेगा. पानी बचाना अब सिर्फ एक विकल्प नहीं, बल्कि जरूरत बन चुका है.




































