रामगढ़: झारखंड के रामगढ़ जिले में एक बार फिर मौत ने अपने पंजे फैलाए हैं, वो भी ऐसी जगह जहां जिंदगी की तलाश में लोग अपनी जान हथेली पर रखकर काम करते हैं। उरीमारी ओपी इलाके के लुरूंगा जंगल में अवैध कोयला खदान के भीतर से आवाज आई, 'चाल धंस गई!' और इस आवाज के साथ ही दो जिंदगियां हमेशा के लिए खामोश हो गईं। ये सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि एक दर्दनाक कहानी है उस मजबूरी और सिस्टम की लापरवाही की, जो यहां के लोगों को हर दिन मौत के कुएं में धकेलता रहता है।
हादसा गुरुवार को हुआ, जब सुखदेव गंझू (35) और शिबू उर्फ शिवनाथ बेदिया (45) नाम के दो ग्रामीण उस अंधेरी और खतरनाक खदान में कोयला निकालने घुसे थे। शायद उन्हें उम्मीद थी कि आज कुछ कमाई होगी, घर का चूल्हा जलेगा।
लेकिन ऊपर से मौत आ गिरी। खदान की कच्ची दीवारें भरभराकर गिरीं और दोनों शख्स मलबे के नीचे दब गए।
मौत की खदान और अधूरे बचाव के प्रयास
जो लोग उस वक्त खदान के पास थे, उनकी आंखों के सामने सब कुछ हुआ। उन्होंने देखा कि कैसे उनके साथी पलक झपकते ही मिट्टी और पत्थरों के ढेर में समा गए।
अफरातफरी मची, चीख-पुकार हुई। मौके पर मौजूद दूसरे मजदूरों ने तुरंत मिट्टी हटाना शुरू किया।
हर कोई चाहता था कि उनके साथियों को जल्द से जल्द बाहर निकाला जाए, शायद एक उम्मीद थी कि सांसें बाकी हों। लेकिन समय ने उनका साथ नहीं दिया।
जब तक मलबे को हटाया गया और सुखदेव और शिबू को बाहर निकाला गया, तब तक देर हो चुकी थी। दोनों ने मौके पर ही दम तोड़ दिया था।
यह देखकर वहां मौजूद सभी लोग सदमे में आ गए।
इस भयानक मंजर के बाद, खदान में काम कर रहे बाकी मजदूर भी सकते में आ गए। उन्हें पता था कि अगर पुलिस आ गई तो उन पर भी कार्रवाई हो सकती है, इसलिए वे फौरन वहां से भाग निकले।
कुछ देर बाद, उरीमारी पुलिस और संबंधित अधिकारी घटनास्थल पर पहुंचे। उन्होंने देखा कि कैसे मौत ने वहां अपना निशान छोड़ा था।
पुलिस ने दोनों शवों को कब्जे में लिया और आगे की कार्रवाई शुरू की।
लुरूंगा जंगल: अवैध खनन का गढ़
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि लुरूंगा जंगल कोई नया अड्डा नहीं है अवैध कोयला खनन का। यहां तो यह गोरखधंधा सालों से चल रहा है, बेधड़क।
ग्रामीणों की मानें तो इस जंगल में करीब एक दर्जन ऐसी अवैध खदानें हैं, जहां हर दिन सैकड़ों लोग अपनी जान जोखिम में डालकर कोयला निकालते हैं। ये खदानें न तो सुरक्षित होती हैं और न ही इनमें काम करने वालों के लिए कोई सुरक्षा इंतजाम।
यहां काम करने वाले जानते हैं कि हर पल मौत का साया उनके सिर पर मंडरा रहा है, फिर भी पेट पालने की मजबूरी उन्हें खींच लाती है।
यह पहला मौका नहीं है जब लुरूंगा जंगल की इन मौत की खदानों ने किसी की जान ली हो। ग्रामीणों के मुताबिक, पहले भी कई बार यहां चाल धंसने की घटनाएं हो चुकी हैं।
हर बार कोई न कोई बेकसूर मजदूर इस अवैध कारोबार की भेंट चढ़ जाता है। हर हादसे के बाद कुछ दिन के लिए माहौल गरमाता है, पुलिस-प्रशासन थोड़ी-बहुत कागजी कार्रवाई करते हैं, कुछ गिरफ्तारियां भी होती हैं, लेकिन फिर वही ढाक के तीन पात।
कुछ ही दिनों में सब कुछ शांत हो जाता है और अवैध खनन का धंधा पहले की तरह ही धड़ल्ले से चलने लगता है। ऐसा लगता है जैसे इन मौतों से किसी को फर्क ही नहीं पड़ता।
प्रशासन पर सवाल और ग्रामीणों का आक्रोश
इस ताजा घटना ने एक बार फिर ग्रामीणों के सब्र का बांध तोड़ दिया है। उनमें प्रशासन के खिलाफ जबरदस्त गुस्सा है।
ग्रामीणों का साफ-साफ कहना है कि पुलिस और स्थानीय प्रशासन को इस अवैध खनन के बारे में सब कुछ पता है। उन्हें पता है कि कौन लोग इस धंधे के सरगना हैं, कौन इसमें शामिल हैं और कहां-कहां यह काम चल रहा है।
लेकिन, आरोप है कि जानबूझकर कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया जाता। अगर ठोस कार्रवाई होती तो आज सुखदेव और शिबू जिंदा होते।
ग्रामीणों ने अब मांग की है कि इस पूरे अवैध कारोबार में शामिल बड़े सरगनाओं को पहचाना जाए और उनके खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई हो। उनका कहना है कि सिर्फ छोटे मजदूरों को पकड़ने से कुछ नहीं होगा, असली गुनहगार तो वे हैं जो इस मौत के खेल के पीछे बैठे हैं और अपनी जेबें भर रहे हैं।
उधर, पुलिस ने मामले में कार्रवाई का आश्वासन दिया है। उनका कहना है कि अवैध खनन में शामिल सभी लोगों को चिन्हित किया जाएगा और उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
साथ ही, पुलिस ने यह भी कहा है कि इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए लगातार अभियान चलाया जाएगा। लेकिन सवाल यह है कि ऐसे आश्वासन कितनी बार दिए गए और उनका नतीजा क्या रहा? क्या इस बार वाकई कुछ बदलेगा या फिर कुछ दिन बाद लुरूंगा जंगल की इन खदानों में मौत का खेल फिर शुरू हो जाएगा? यह देखना अभी बाकी है।




































