सीवान: जून का महीना... सरकारी दफ्तरों में अक्सर इसे 'ट्रांसफर-पोस्टिंग' का महीना माना जाता है। सरकार का सीधा-सा फंडा है कि बाबू लोग या अधिकारी एक जगह ज़्यादा न जम पाएं, ताकि काम में पारदर्शिता बनी रहे और 'स्थानीय-कनेक्शन' वाले गड़बड़झाले पर रोक लग सके। नियम कहता है, जो तीन साल से एक ही कुर्सी पर बैठा है, उसे उठाकर दूसरी जगह भेजा जाए। लेकिन बिहार के सीवान में समाज कल्याण विभाग के तहत चलने वाले आईसीडीएस (Integrated Child Development Services) ने इस पूरे सिस्टम का ऐसा बैंड बजाया है कि सुनकर आप भी कहेंगे, "भाई! ये ट्रांसफर है या म्यूजिकल चेयर का खेल?"
ताज़ा मामला सीवान के आईसीडीएस विभाग से जुड़ा है, जहाँ ट्रांसफर के नाम पर कुछ ऐसा हुआ है जिसे 'घर वापसी' या 'पुरानी बोतल में नई शराब' कहा जाए तो ग़लत नहीं होगा। ज़िलाधिकारी विवेक रंजन मैत्रेय के दस्तखत से दो आदेश, संख्या 797 और 799, दिनांक 27 जून 2026 को जारी हुए हैं।
इन आदेशों में कई कर्मियों को फिर से उसी दफ्तर, उसी प्रखंड या उसी कुर्सी का 'अतिरिक्त प्रभार' थमा दिया गया है, जहाँ वो बरसों से जमे हुए थे। अब सवाल उठ रहा है कि क्या ये सिर्फ कागजी खानापूर्ति है या फिर वाकई में ट्रांसफर के पीछे की भावना को ताक पर रख दिया गया है?
सरकार का नियम क्या कहता है और सीवान में क्या हुआ?
भारत सरकार और बिहार सरकार का स्पष्ट निर्देश है कि प्रशासनिक पारदर्शिता बनाए रखने और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए तीन साल या उससे अधिक समय से एक ही कार्यालय या क्षेत्र में पदस्थापित अधिकारियों और कर्मियों का स्थानांतरण अनिवार्य रूप से किया जाए। इसका मकसद साफ है – एक ही जगह पर लंबे समय तक जमे रहने से कई बार स्थानीय स्तर पर कुछ लोग अपना एक नेटवर्क बना लेते हैं, जिससे काम में निष्पक्षता नहीं रह पाती।
लेकिन सीवान में जो ट्रांसफर लिस्ट आई है, उसने इस नियम की धज्जियां उड़ा दी हैं।
प्रिय रंजन से शिवपुकार यादव तक: 'घर वापसी' का किस्सा
इस लिस्ट में कई ऐसे नाम हैं जिनकी 'वफ़ादारी' अपने पुराने ठिकानों से शायद कभी ख़त्म ही नहीं होती। सबसे पहले बात करते हैं क्लर्क प्रिय रंजन गिरी की।
भैया, ये पिछले लगभग पांच साल से जिला प्रोग्राम कार्यालय सीवान में जमे हुए थे, कभी मूल पदस्थापन पर तो कभी अतिरिक्त प्रभार पर। अब नए आदेश में इन्हें फिर से जिला प्रोग्राम कार्यालय का ही अतिरिक्त प्रभार सौंप दिया गया है।
मतलब, जहाँ से चले थे, घूम फिर कर वहीं वापस! यह तो वही बात हुई कि गंगा नहाकर घर लौट आए।
अगला नाम है सांख्यिकी सहायक जय प्रकाश प्रसाद का। इन्होंने भी 'क्षेत्रवाद' का पूरा नमूना पेश किया है।
ये जनाब पिछले करीब सात साल से लकड़ी नबीगंज और गोरेयाकोठी में पदस्थापित थे और इन दोनों प्रखंडों का अतिरिक्त प्रभार भी इनके पास था। नए आदेश में उन्हें फिर से लकड़ी नबीगंज में पदस्थापित करते हुए गोरेयाकोठी का अतिरिक्त प्रभार थमा दिया गया है।
ऐसा लगता है, जैसे विभाग ने इनसे पूछकर ही ट्रांसफर किया हो – "आपको कौन सी जगह पसंद है सर?"
श्याम सुंदर सिंह के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ है। ये जिला प्रोग्राम कार्यालय में पिछले लगभग तीन साल से अतिरिक्त प्रभार में थे और चार साल से मूल रूप से पदस्थापित थे।
नए आदेश ने इन्हें फिर उसी जिला प्रोग्राम कार्यालय का अतिरिक्त प्रभार सौंप दिया है। वहीं, सांख्यिकी सहायक उपेंद्र कुमार की कहानी भी जुदा नहीं है।
बीते चार साल से गुठनी के अतिरिक्त प्रभार में थे, और इस आदेश से उन्हें फिर गुठनी का ही अतिरिक्त प्रभार सौंप दिया गया है। विभाग को शायद लगता है कि गुठनी की बागडोर उपेंद्र जी से बेहतर कोई संभाल ही नहीं सकता!
'अमर' शिवपुकार यादव: 14 साल से हुसैनगंज से मोहभंग नहीं
लेकिन इस ट्रांसफर लिस्ट के 'स्टार' खिलाड़ी हैं सांख्यिकी सहायक शिवपुकार यादव। इनके नाम तो 'स्थिरता' का एक नया रिकॉर्ड ही बन गया है।
विभागीय रिकॉर्ड खंगालिए तो पता चलता है कि वर्ष 2012 में इनकी पदस्थापना हुसैनगंज में हुई थी। 2012 से आज तक, यानी पूरे 14 साल से, ये कभी नियमित पदस्थापन तो कभी अतिरिक्त प्रभार के बहाने उसी हुसैनगंज क्षेत्र में कुंडली मारे बैठे हैं।
सोचिए, 14 साल! सीवान जिले में 19 प्रखंड हैं, लेकिन शिवपुकार यादव जी के लिए हुसैनगंज ही मानो स्वर्ग है। बीच में एक बार, साल 2022 में, इनका ट्रांसफर आंदर कर दिया गया था।
लेकिन कमाल देखिए, आंदर जाने के बाद भी हुसैनगंज का अतिरिक्त प्रभार इनसे वापस नहीं लिया गया। और अब, नए आदेश में तो इन्हें फिर से हुसैनगंज में ही पदस्थापित कर दिया गया है और आंदर का अतिरिक्त प्रभार इनके पास बरकरार है।
अब कोई पूछे कि विभाग को हुसैनगंज से इतना प्रेम क्यों है? क्या जिले के बाकी 18 प्रखंडों में कोई दूसरा योग्य कर्मचारी नहीं है, या फिर हुसैनगंज की मिट्टी में ही कोई ख़ास चुंबकीय शक्ति है कि बाबू शिवपुकार यादव वहीं जमे हुए हैं?
क्या अंदरखाने चली 'मोलभाव' की दुकान?
अब जब ऐसी 'अद्भुत' ट्रांसफर लिस्ट सामने आई है, तो अंदरखाने से कई तरह की बातें भी सामने आ रही हैं। सूत्रों की मानें तो ट्रांसफर सूची जारी होने से कई दिन पहले तक विभाग के अंदर 'मनचाही पोस्टिंग' के लिए जमकर मोलभाव चलता रहा।
हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि करना मुश्किल है, लेकिन अगर इन बातों में रत्ती भर भी सच्चाई है, तो यह पूरे ट्रांसफर सिस्टम की निष्पक्षता और सरकार की 'पारदर्शिता' के दावे पर एक बहुत बड़ा सवाल खड़ा करता है। क्या ये ट्रांसफर सिर्फ इसलिए हुए ताकि नियमों के पन्नों पर 'हाँ' लिखा जा सके, जबकि असल में सब कुछ पुराने ढर्रे पर ही चलता रहे?
सरकार का नियम था कि एक जगह तीन साल से ज़्यादा रुकने पर ट्रांसफर हो, ताकि कोई 'स्थानीय सिंडिकेट' न बन पाए, कोई 'स्थानीय मिलीभगत' न हो। लेकिन सीवान में हुए इन ट्रांसफरों को देखकर तो यही लगता है कि या तो विभाग ने इन नियमों को ढंग से पढ़ा ही नहीं, या फिर पढ़कर भी अनदेखा कर दिया।
अब सवाल यह है कि क्या ज़िलाधिकारी इस पूरे मामले पर कोई कार्रवाई करेंगे या यह 'खेल' ऐसे ही चलता रहेगा?


