मोहाली: भैया, जब कोई फ़िल्म बड़ी मशक्कत और लंबी लड़ाई के बाद परदे पर आती है, तो दर्शकों की उम्मीदें भी बढ़ जाती हैं। लेकिन सोचिए, अगर वो फ़िल्म दो दिन बाद ही ग़ायब हो जाए? ऐसा ही कुछ हुआ है दिलजीत दोसांझ की उस फ़िल्म के साथ, जो पंजाब के बड़े मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा की ज़िंदगी पर बनी है। जी, सही सुना आपने। 'पंजाब 95' से नाम बदलकर 'सतलुज' हुई ये फ़िल्म, जो हाल ही में ZEE5 पर रिलीज़ हुई थी, अब उस प्लेटफ़ॉर्म से अचानक हटा दी गई है। और इस पूरे माजरे पर दिलजीत दोसांझ का दर्द छलका है, उन्होंने सीधे-सीधे कह दिया कि "एक इंसानियत होती है, वह इंसानियत मर गई है।"
ये कोई मामूली बात नहीं है। ये फ़िल्म पिछले तीन साल से सेंसर बोर्ड और कानूनी दांव-पेंच में उलझी थी। बड़ी मुश्किल से इसका नाम बदलकर 'सतलुज' किया गया और फिर दर्शकों के लिए इसे ऑनलाइन लाया गया। लेकिन रिलीज़ के महज़ 48 घंटे बाद ही इसे हटा दिया गया। दिलजीत दोसांझ ने इस घटना पर गहरी नाराज़गी जताई है। उनका कहना है, "मुझे इस बात का दुख नहीं है कि फ़िल्म इंटरनेट से हटा दी गई, क्योंकि फ़िल्म लोगों तक पहुंच चुकी है। एक बार जो चीज़ इंटरनेट पर आ गई, उसे हटाना आसान नहीं है। इनके सलाहकार ठीक नहीं हैं। इस फ़िल्म के साथ वही हुआ, जो खालड़ा जी के साथ हुआ था।" इस बयान से साफ़ है कि दिलजीत इस फ़ैसले को खालड़ा साहब के साथ हुई त्रासदी से जोड़कर देख रहे हैं। इस फ़िल्म को हटाने के बाद सिर्फ़ दिलजीत ही नहीं, बल्कि पंजाब के कई दूसरे कलाकारों ने भी सोशल मीडिया पर अपना ग़ुस्सा ज़ाहिर किया है।
ZEE5 ने क्या कहा और क्यों है ये फ़िल्म इतनी ख़ास?
फ़िल्म को क्यों हटाया गया, किसने हटवाया, इस पर कोई भी साफ़-साफ़ जानकारी नहीं मिली है। OTT प्लेटफ़ॉर्म ZEE5 ने भी एक गोलमोल बयान जारी किया है। उन्होंने कहा है कि "मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए अगले आदेश तक 'सतलुज' प्लेटफ़ॉर्म पर उपलब्ध नहीं रहेगी।" कंपनी ने ये भी जोड़ा कि वो कानूनी प्रक्रिया के तहत सभी उचित विकल्प तलाश रही है, ताकि फ़िल्म को जल्द से जल्द फिर से दर्शकों के लिए उपलब्ध कराया जा सके। लेकिन ये 'मौजूदा परिस्थितियां' क्या हैं, इस पर ख़ामोशी है। ये फ़िल्म क्यों इतनी ख़ास है और क्यों इस पर इतना विवाद हो रहा है, इसे समझने के लिए हमें उस शख़्स की कहानी जाननी होगी, जिस पर ये फ़िल्म बनी है – मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा की।
जसवंत सिंह खालड़ा की वो कहानी, जिसने पंजाब को झकझोर दिया
बात 1980 के दशक के आख़िर और 1990 के दशक की शुरुआत की है। पंजाब उस वक़्त आतंकवाद और उग्रवाद की आग में जल रहा था।
चारों तरफ़ अफ़रा-तफ़री का माहौल था। इस दौर में आतंकवाद विरोधी अभियान भी ज़ोरों पर थे, लेकिन इसी दौरान पुलिस पर भी गंभीर आरोप लगने शुरू हो गए थे।
आरोप थे फ़र्ज़ी मुठभेड़ों के, हिरासत में हुई हत्याओं के और लोगों के अचानक लापता हो जाने के। अमृतसर के एक सहकारी बैंक में काम करने वाले जसवंत सिंह खालड़ा इन सब को चुपचाप देख रहे थे।
उन्हें लगा कि कुछ तो गड़बड़ है। और फिर एक दिन उन्होंने इन आरोपों की सच्चाई जानने का बीड़ा उठाया।
ये उनका महज़ नौकरीपेशा वाला काम नहीं था, ये एक इंसानी जज़्बा था, जो उन्हें इस डगर पर ले आया।
खालड़ा ने कोई बड़ी सरकारी टीम नहीं बनाई, न ही उनके पास कोई ख़ास पावर थी। उनके पास था तो सिर्फ़ सच जानने का जुनून।
उन्होंने अमृतसर, तरनतारन और आसपास के इलाक़ों में स्थित श्मशान घाटों के रिकॉर्ड खंगालने शुरू किए। नगर निगम के दस्तावेज़ों और अंतिम संस्कार रजिस्टरों को पलटा।
वो एक-एक पन्ने को, एक-एक एंट्री को बहुत ध्यान से देखते थे। उनकी जांच में जो सामने आया, वो किसी के भी रोंगटे खड़े कर देने वाला था।
उन्होंने पाया कि बड़ी संख्या में शवों को 'लावारिस' बताकर जलाया जा रहा था। इन शवों का कोई दावेदार नहीं था, लेकिन ये इतने ज़्यादा थे कि शक पैदा होना लाज़मी था।
खालड़ा की जांच ने ये भी उजागर किया कि इनमें से कई शव उन लोगों के थे, जो पुलिस हिरासत में लिए जाने के बाद अचानक ग़ायब हो गए थे। उन्होंने दावा किया कि पूरे पंजाब में क़रीब 25,000 लोगों की अवैध हत्याएं की गईं और उनके गुप्त तरीक़े से अंतिम संस्कार कर दिए गए।
ये संख्या इतनी बड़ी थी कि ये किसी भी समाज को हिला देने के लिए काफ़ी थी।
इंटरनेशनल लेवल तक गूंजा मुद्दा और CBI की जांच
जसवंत सिंह खालड़ा ने अपनी जांच के सारे दस्तावेज़ सार्वजनिक कर दिए। उन्होंने इस मामले को देश के भीतर ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उठाया।
वो विदेशों में गए, मानवाधिकार संगठनों के सामने अपनी बात रखी, और पंजाब की उस खौफ़नाक सच्चाई को दुनिया के सामने लाने की कोशिश की। उनके खुलासे के बाद ये मामला राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC), केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) और आख़िरकार देश की अदालतों तक पहुंचा।
एक साधारण बैंक कर्मचारी की ये हिम्मत, ये जज़्बा, वाकई बेमिसाल था।
जब मामला तूल पकड़ा, तो CBI ने भी इस मामले की जांच की। हालांकि, CBI ने खालड़ा के पूरे दावे की पुष्टि नहीं की।
जांच एजेंसी ने अपनी रिपोर्ट में केवल तरनतारन ज़िले में 2,097 अवैध अंतिम संस्कारों की पुष्टि की। बाद में, सर्वोच्च न्यायालय ने भी अपने फ़ैसलों में CBI के इन्हीं जांच के आंकड़ों का हवाला दिया।
ये आंकड़े भी अपने आप में हज़ारों ज़िंदगी के ख़ात्मे की कहानी बयां कर रहे थे।
खालड़ा का अपहरण और फ़िल्म हटाने का दर्द
जसवंत सिंह खालड़ा ने इस पूरे मामले को इंटरनेशनल लेवल पर उठाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। लेकिन दुखद बात ये है कि जिस सच को वो सामने लाने की कोशिश कर रहे थे, उसी सच ने उनकी ज़िंदगी पर भी ख़तरा पैदा कर दिया।
6 सितंबर 1995 की सुबह थी। जसवंत सिंह खालड़ा अपने अमृतसर स्थित घर के बाहर थे।
उनके परिवार ने दावा किया कि उन्हें वहीं से अगवा कर लिया गया। उसके बाद खालड़ा कभी वापस नहीं लौटे।
उनकी मौत आज भी एक अनसुलझा रहस्य बनी हुई है।
अब जब उनकी कहानी पर बनी फ़िल्म 'सतलुज' को इस तरह से अचानक हटा दिया गया है, तो दिलजीत दोसांझ और दूसरे कलाकार यही महसूस कर रहे हैं कि इतिहास ख़ुद को दोहरा रहा है। जिस तरह से खालड़ा की आवाज़ दबाने की कोशिश की गई थी, उसी तरह आज उनकी कहानी पर बनी फ़िल्म को भी रोकने की कोशिश हो रही है।
ये एक ऐसी घटना है, जो सिर्फ़ एक फ़िल्म के हटने का मामला नहीं है, बल्कि उस वक़्त के पंजाब के दर्द और सच को सामने लाने की जद्दोजहद का प्रतीक है। ये दिखाता है कि कुछ कहानियाँ इतनी पावरफुल होती हैं कि उन्हें दबाना आसान नहीं होता, भले ही परदे से हटा दिया जाए, लेकिन ज़ेहनों से नहीं।




































