मधुबनी: बिहार का मधुबनी जिला। तारीख 3 जुलाई 2023। नरही गांव, अंधरामठ थाना क्षेत्र। एक मां अपने दो मासूम बच्चों, चार साल के प्रिंस और डेढ़ साल की सृष्टि, को लेकर घर से निकलती है। देर शाम तक वापस नहीं लौटती। परिवार तलाश शुरू करता है, लेकिन किसे पता था कि एक मां ने ही अपने जिगर के टुकड़ों की इतनी निर्मम हत्या कर दी है? यह कहानी सिर्फ एक अपराध की नहीं, बल्कि रिश्तों के ऐसे कत्ल की है जिसने पूरे समाज को झकझोर कर रख दिया। अब, इस जघन्य कांड के करीब तीन साल बाद, झंझारपुर सिविल कोर्ट ने एक ऐसा ऐतिहासिक फैसला सुनाया है, जो बिहार के न्यायिक इतिहास में दर्ज हो गया है।
झंझारपुर कोर्ट के इतिहास में यह पहला मौका है जब किसी दोषी को फांसी की सजा दी गई है। जिला जज-2 अभिषेक रंजन की अदालत ने अनीता कुमारी, जो उन्हीं मासूमों की मां है, और उसके प्रेमी जय प्रकाश मंडल को अपने ही बच्चों की हत्या के आरोप में मृत्युदंड का फरमान सुनाया है।
अदालत ने इसे 'रेयर ऑफ द रेयरेस्ट' यानी दुर्लभतम से दुर्लभतम श्रेणी का मामला माना है। इस फैसले ने न केवल अपराध की गंभीरता को रेखांकित किया है, बल्कि उन लोगों को भी कड़ा संदेश दिया है जो रिश्तों की मर्यादा को तार-तार करते हैं।
प्रेम संबंध में बाधा बने बच्चे; फिर क्या हुआ?
अभियोजन पक्ष की कहानी दिल दहला देने वाली है। अनीता कुमारी, प्रमोद कुमार साफी की पत्नी थी।
उसका गांव के ही जय प्रकाश मंडल से प्रेम संबंध चल रहा था। अनीता और जय प्रकाश के लिए अनीता के मासूम बच्चे, प्रिंस और सृष्टि, उनके प्रेम संबंधों में 'बाधा' बन रहे थे।
ये वही बच्चे थे जिन्हें मां की ममता की छांव में पलना था, लेकिन उनकी किस्मत में कुछ और ही लिखा था। प्रेम के इस कथित जुनून ने मां को इतना अंधा कर दिया कि उसने अपने ही बच्चों को रास्ते से हटाने का फैसला कर लिया।
3 जुलाई 2023 को अनीता दोनों बच्चों को लेकर घर से निकली। परिवार को लगा कि वह कहीं रिश्तेदारों के यहां गई होगी, लेकिन जैसे-जैसे दिन ढलते गए, चिंता बढ़ती गई।
देर शाम तक भी जब कोई खबर नहीं आई, तो परिजनों ने उनकी तलाश शुरू की। यह तलाश अगले सात दिनों तक चलती रही।
हर गुजरते दिन के साथ उम्मीदें टूटती जा रही थीं। आखिर में जो खुलासा हुआ, उसने सबको सकते में डाल दिया।
बलान नदी में फेंक दिए गए शव, एक मिला, दूसरा बह गया
सात दिन बाद पुलिस को जानकारी मिली कि दोनों बच्चों की बेरहमी से हत्या कर दी गई है। उनके छोटे-छोटे शवों को बलान नदी के खाप पुल से नदी में फेंक दिया गया था।
नदी में पानी का बहाव तेज था, लेकिन चार साल के प्रिंस का शव किसी तरह बरामद कर लिया गया। डेढ़ साल की सृष्टि का शव नदी की तेज धार में कहीं खो गया, जिसका आज तक कोई अता-पता नहीं है।
यह घटना सुनकर गांव वाले गुस्से से भर गए। ग्रामीणों ने इस निर्मम हत्या के लिए जिम्मेदार अनीता कुमारी और जय प्रकाश मंडल को पकड़ लिया और उन्हें पुलिस के हवाले कर दिया।
11 जुलाई 2023 से दोनों आरोपी न्यायिक हिरासत में थे, और अब तक जेल में ही बंद थे।
कोर्ट ने कहा- 'जघन्य और अमानवीय अपराध'
इस पूरे मामले की सुनवाई के दौरान, लोक अभियोजक देव शंकर झा ने अदालत के सामने सबूतों का पहाड़ खड़ा कर दिया। उन्होंने बार-बार यह बात दोहराई कि यह सिर्फ हत्या का मामला नहीं है, बल्कि समाज की अंतरात्मा को झकझोर देने वाला अपराध है।
उन्होंने दोषियों के लिए मृत्युदंड की मांग की। अदालत ने सभी गवाहों के बयान सुने, परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर गौर किया और अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत हर एक प्रमाण को बारीकी से परखा।
न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद, अदालत ने अपने फैसले में टिप्पणी की कि यह अपराध अत्यंत क्रूर, अमानवीय और समाज को झकझोर देने वाला है। एक मां का अपने ही बच्चों के प्रति ऐसी क्रूरता, और एक प्रेमी के साथ मिलकर इस अपराध को अंजाम देना, मानवीयता की सारी हदें पार कर गया था।
यह सिर्फ व्यक्तिगत प्रतिशोध या किसी झगड़े का मामला नहीं था, बल्कि उन मासूमों का कत्ल था जो अपने मां-बाप पर सबसे ज्यादा भरोसा करते हैं।
पहली बार झंझारपुर कोर्ट से फांसी की सजा
जिला जज-2 अभिषेक रंजन ने अपने फैसले में दोनों दोषियों, अनीता कुमारी और जय प्रकाश मंडल को भारतीय दंड संहिता की धारा 302/34 (हत्या) के तहत दोषी करार दिया। अदालत ने इस दोहरे हत्याकांड को 'रेयर ऑफ द रेयरेस्ट' श्रेणी में रखते हुए उन्हें मृत्युदंड की सजा सुनाई।
इसके साथ ही, अदालत ने दोनों पर 50-50 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया है। यदि वे यह जुर्माना अदा नहीं करते हैं, तो उन्हें छह-छह माह का अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा।
इतना ही नहीं, भारतीय न्याय संहिता की धारा 201/34 (साक्ष्य मिटाने) के तहत भी दोनों को सात-सात साल के कठोर कारावास और 10-10 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई है। इस जुर्माने का भुगतान न करने पर तीन-तीन माह का अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा।
झंझारपुर कोर्ट का यह फैसला एक नजीर बन गया है, जो बताता है कि न्याय की उम्मीद कभी खत्म नहीं होती, भले ही अपराध कितना ही घिनौना क्यों न हो। यह फैसला उन सभी के लिए एक चेतावनी है जो रिश्तों की पवित्रता और मानवीय मूल्यों को कुचलते हैं।




































