पटना: दोस्तों, पैसे कमाने का सपना तो हम सब देखते हैं, और जब बात आती है सिस्टेमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान यानी SIP की, तो दिमाग में सबसे पहले कंपाउंडिंग की जादुई कहानी घूमती है। बचपन में वो खरगोश और कछुए वाली कहानी सुनी थी ना? बस, SIP भी कुछ वैसी ही धीमी, पर असरदार चाल से चलती है। लेकिन क्या हो जब मैं कहूं कि एक ही रकम की SIP लगाने पर भी दो लोग अलग-अलग करोड़ों का रिटर्न ले सकते हैं? और ये रिटर्न का अंतर इतना बड़ा हो सकता है कि आपकी आँखें फटी की फटी रह जाएं? जी हाँ, बात ₹2.85 करोड़ के भारी-भरकम अंतर की है!
अक्सर नए निवेशक जब SIP शुरू करते हैं, तो उनके मन में एक ही सवाल कौंधता है – "क्या मेरी SIP सच में काम कर रही है?" बेचारे, शुरू के दो-तीन साल तक तो बाजार के उतार-चढ़ाव में उनका पोर्टफोलियो कोई कमाल नहीं दिखाता। ना कोई जादुई ग्रोथ, ना कोई बंपर रिटर्न।
बस वही घिसी-पिटी चाल। ऐसे में कई लोग तो मान ही लेते हैं कि ये कंपाउंडिंग-वंपाउंडिंग की बातें सिर्फ किताबी हैं, असल जिंदगी में इनका कोई वजूद नहीं।
अगर आप भी ऐसा सोचते हैं, तो भइया, आप गलतफहमी के शिकार हैं।
आपको बता दें कि SIP के शुरुआती साल दौलत बनाने के नहीं होते, बल्कि ये तो एक मजबूत नींव, एक बड़ा बेस तैयार करने के साल होते हैं। ये वो समय होता है जब आपके छोटे-छोटे निवेश मिलकर एक बड़ा पहाड़ बनाने की तैयारी करते हैं।
अब इस बात को और बारीकी से समझने के लिए, एडेलवाइस एसेट मैनेजमेंट के हेड निरंजन अवस्थी ने एक बड़ा ही दिलचस्प उदाहरण दिया है। आइए, इसी उदाहरण से समझते हैं कि कैसे एक ही रकम की SIP करने के बावजूद दो लोगों के रिटर्न में करोड़ों का फर्क आ जाता है।
आखिर इस खेल में ट्विस्ट कहां है?
ट्विस्ट सारा 'रिटर्न की टाइमिंग' का है। यानी, आपको कब बंपर रिटर्न मिलता है – शुरुआत में या आखिर के सालों में।
सुनने में अजीब लग सकता है, लेकिन इसी टाइमिंग का खेल आपके पोर्टफोलियो को करोड़पति से अरबपति (या कम करोड़पति) बना सकता है। आम धारणा ये है कि भई, जितनी जल्दी ज्यादा रिटर्न मिलेगा, उतनी जल्दी पैसा बढ़ेगा और ज्यादा बढ़ेगा।
एकमुश्त निवेश के मामले में शायद ये बात थोड़ी-बहुत सही हो, लेकिन SIP का फंडा थोड़ा अलग है, दोस्त!
चलिए, दो दोस्तों की कहानी से समझते हैं ये पूरा गणित
मान लीजिए दो दोस्त हैं, रमेश और सुरेश। दोनों ने एक साथ, एक ही म्यूचुअल फंड में SIP शुरू की।
दोनों ही हर महीने ₹50,000 जमा करते हैं और पूरे 20 साल तक इस निवेश को बनाए रखते हैं। तो कुल मिलाकर, दोनों ने ₹1.2 करोड़ का निवेश किया।
अब ध्यान से देखिएगा, ट्विस्ट यहीं से शुरू होता है:
- रमेश की कहानी: रमेश को शुरुआत के 5 सालों में बंपर 24% का सालाना रिटर्न मिलता है। रमेश खुशी से झूम उठता है, सोचता है, "बल्ले-बल्ले! मेरा पैसा तो रॉकेट बन गया।" लेकिन, उसके बाद के 15 सालों में बाजार थोड़ा सुस्त हो जाता है और उसे सिर्फ 12% का सालाना रिटर्न मिलता है।
- सुरेश की कहानी: सुरेश के साथ ठीक उल्टा होता है। उसे पहले 15 सालों तक तो सिर्फ 12% का सालाना रिटर्न मिलता है। सुरेश थोड़ा निराश होता है, पर धीरज रखता है। उसे लगता है कि चलो, कुछ तो मिल रहा है। लेकिन, आखिरी के 5 सालों में बाजार दौड़ने लगता है और सुरेश को धमाकेदार 24% का सालाना रिटर्न मिलता है।
तो मोटा-मोटी देखें तो, दोनों ने एक ही रकम लगाई, एक ही समय के लिए। फर्क बस इतना था कि रमेश को पहले तेजी मिली, और सुरेश को आखिर में।
अब सवाल ये है, क्या दोनों को बराबर फंड मिला होगा? आपका जवाब शायद "हाँ" होगा, लेकिन यकीन मानिए, यहीं पर आप मात खा जाएंगे!
तो कौन निकला बाजीगर?
20 साल पूरे होने पर जो नतीजा सामने आया, उसे सुनकर आपके होश उड़ जाएंगे! जब फंड का हिसाब-किताब किया गया, तो पता चला कि सुरेश का कुल फंड ₹8.77 करोड़ हो चुका था! वहीं, रमेश का फंड सिर्फ ₹5.92 करोड़ पर ही अटका हुआ था। आप देख रहे हैं? दोनों ने हर महीने एक बराबर पैसा जमा किया था, ₹50,000 महीना, पूरे 20 साल तक। लेकिन रिटर्न की टाइमिंग के इस छोटे से फेर ने दोनों के बीच पूरे ₹2.85 करोड़ का बड़ा फासला पैदा कर दिया!
आप सोच रहे होंगे कि ये तो बहुत बड़ी रकम की बात है। अगर SIP छोटी होती, जैसे ₹10,000 महीना की, तब भी क्या इतना फर्क पड़ता? जी हाँ, बिल्कुल पड़ता।
तब भी आखिरी सालों में बड़ा रिटर्न पाने वाला निवेशक करीब ₹57 लाख ज्यादा कमा लेता। तो अब आप समझ सकते हैं कि ये सिर्फ बड़े निवेशकों का खेल नहीं, बल्कि छोटे निवेशकों पर भी इसका बड़ा असर पड़ता है।
लेकिन सवाल ये है, ऐसा हुआ कैसे?
जैसा कि हमने पहले बात की, लोग सोचते हैं कि शुरुआत में ज्यादा रिटर्न मिलने पर पैसा बढ़ने के लिए ज्यादा समय मिलेगा, इसलिए फंड बड़ा होना चाहिए। ये बात एकमुश्त निवेश (lump sum) में शायद कुछ हद तक काम करती है।
पर SIP में हिसाब-किताब थोड़ा जुदा होता है।
जब आप SIP शुरू करते हैं, तो पहले कुछ सालों में आपका कुल जमा फंड बहुत छोटा होता है। मान लीजिए आपने ₹50,000 महीना जमा किया, तो पहले साल में आपने ₹6 लाख जमा किए।
अगर इस ₹6 लाख पर 24% का रिटर्न भी मिलता है, तो वो महज ₹1.44 लाख होगा। बहुत बड़ा नहीं।
ये वैसी ही बात है जैसे एक छोटे से पौधे को सूरज की रोशनी मिले। वो बढ़ेगा, पर धीरे-धीरे।
अब जरा सुरेश के मामले पर गौर कीजिए। उसके शुरुआती 15 सालों में उसे सिर्फ 12% रिटर्न मिला।
इस दौरान उसका फंड धीरे-धीरे बड़ा होता रहा, पर रमेश जितनी तेजी से नहीं। लेकिन, 15 साल बाद, उसका कुल जमा फंड काफी बड़ा हो चुका था।
वो एक मजबूत पेड़ बन चुका था। अब आखिरी के 5 सालों में जब उसे 24% का बंपर रिटर्न मिला, तो ये 24% उस बड़े फंड पर काम किया।
एक बड़े पेड़ को अगर अचानक से बहुत ज्यादा खाद-पानी मिल जाए, तो वो कितनी तेजी से बढ़ेगा, इसकी कल्पना कीजिए!
मोटा-मोटी कहने का मतलब ये है कि SIP में शुरुआती सालों में ज्यादा रिटर्न मिलने से आपका फंड उतना तेजी से नहीं बढ़ता, क्योंकि तब आपका "बेस" यानी कुल जमा पूंजी छोटी होती है। असली खेल तब शुरू होता है जब आपका फंड काफी बड़ा हो चुका होता है, और उस बड़े फंड पर फिर जब तगड़ा रिटर्न मिलता है, तो वो पैसों की सुनामी ले आता है।
तो जनाब, SIP का असली मजा कंपाउंडिंग की ताकत में है, और ये ताकत तब सबसे ज्यादा काम करती है जब आपका पैसा बड़ा हो चुका हो और उसे बढ़ने का 'सही समय' पर 'तेज रिटर्न' का मौका मिले। बस, लगे रहिए, धीरज रखिए, आपका पैसा भी एक दिन बड़ा कमाल दिखाएगा!






































