पटना: अरे भाई साहब! ये क्या हो रहा है? दूसरों को मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाने वाले, चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर, जिन्हें लोग प्यार से ‘पीके’ बुलाते हैं, अब खुद चुनावी मैदान में उतर गए हैं। वो भी किसी मामूली सीट से नहीं, बल्कि पटना की बांकीपुर विधानसभा सीट से होने वाले उपचुनाव में। ये सीट भाजपा का एक तरह से अभेद्य किला मानी जाती है, जिसे भेदना बड़े-बड़े सूरमाओं के लिए मुश्किल रहा है। तो अब सवाल ये है कि जो प्रशांत किशोर कभी खुद चुनाव लड़ने से कतराते थे, आखिर उन्होंने ये बड़ा दांव खेलने का फैसला क्यों किया? उनके इस अचानक चुनावी अवतार के पीछे की पूरी कहानी क्या है और क्या वो सच में भाजपा के इस मजबूत गढ़ को हिला पाएंगे? आइए, इस इनसाइड स्टोरी को जरा गहराई से समझते हैं।
आप सबको याद होगा, प्रशांत किशोर ने बिहार की राजनीति में जन सुराज पार्टी बनाई थी। 2025 के विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी ने 243 में से 238 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे।
नतीजा? भैया, जन सुराज का खाता तक नहीं खुला। पूरे बिहार में सिर्फ एक सीट, मढ़ौरा, पर उनकी पार्टी दूसरे नंबर पर रही।
कुल मिलाकर, 16 लाख 77 हजार से ज्यादा वोट मिले, जो बिहार के कुल वोट का करीब 3.4% था। ये हार प्रशांत किशोर और उनकी टीम के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं थी।
सोचिए, जिस रणनीतिकार के इशारों पर बड़ी-बड़ी पार्टियां और नेता अपनी किस्मत बदलते थे, उसकी अपनी पार्टी का ये हाल।
जब जन सुराज ने खाई थी करारी चोट: 2025 का सबक
इस करारी हार के बाद जन सुराज पार्टी में मंथन का दौर चला। पार्टी की सभी इकाइयों को भंग कर दिया गया और लगातार रिव्यू मीटिंग्स हुईं।
इन बैठकों में बहुत साफगोई से एक बात निकलकर सामने आई – और वो ये कि खुद प्रशांत किशोर का चुनाव न लड़ना लोगों में भरोसा नहीं जगा पाया। सूत्रों की मानें तो, पार्टी के अंदर ये राय बनी कि अगर प्रशांत किशोर खुद चुनाव लड़े होते, तो शायद परिणाम कुछ और होते, बेहतर होते।
कार्यकर्ताओं का मनोबल भी इससे गिर गया था कि उनके नेता खुद मैदान में नहीं उतर रहे।
इस फीडबैक को प्रशांत किशोर ने गंभीरता से लिया। यहीं से एक नई रणनीति का जन्म हुआ।
तय ये हुआ कि अब अगर भविष्य में कोई उपचुनाव होता है और सीट के समीकरण प्रशांत किशोर के लिए अनुकूल होते हैं, तो उन्हें खुद चुनाव लड़ाया जाएगा। ये एक ऐसा फैसला था, जिसने पार्टी की आगे की दिशा तय कर दी।
उन्हें लगा कि सिर्फ संगठन बनाने और सलाह देने से बात नहीं बनेगी, जनता के बीच सीधा जाना होगा और अपनी विश्वसनीयता साबित करनी होगी।




































