पटना: अरे भैया, आजकल बिहार में क्या चल रहा है? बात सिर्फ विकास की नहीं, नामों की भी हो रही है! कुछ दिन पहले की बात है, जब सदगुरु पटना आए थे, तो उन्होंने भरी महफ़िल में एक बात कह दी. उन्होंने कहा कि भैया इस शहर को पटना नहीं, ‘पाटलिपुत्र’ कहिए. उन्होंने समझाया कि ‘पाटली’ एक फूल का नाम होता है और पाटलिपुत्र का मतलब है 'पाटली फूल की संतान'. सुनकर कैसा लगा? मन में एक खूबसूरत तस्वीर उभरती है न! सदगुरु का कहना था कि हमें ऐसे नामों का इस्तेमाल करना चाहिए, जो हमें अपनी विरासत पर गर्व महसूस कराएं. अब ये बात सिर्फ सदगुरु के मन की नहीं थी, बल्कि बिहार की सियासी गलियों में भी ये बातें खूब तैर रही हैं.
असल में, बिहार में इन दिनों पांच शहरों के नाम बदलने की मांग ज़ोर पकड़ रही है. इसमें सबसे ऊपर है पटना, जिसे पाटलिपुत्र करने की बात चल रही है.
इसके अलावा, बख्तियारपुर को व्यासपुर, औरंगाबाद को आदित्य नगर बनाने की चर्चाएं भी हैं. जहानाबाद और सुल्तानगंज के नाम बदलने की भी डिमांड उठी है.
अब सवाल ये है कि आखिर ये अचानक नामों की सियासत क्यों गरम हो गई है? इसके पीछे क्या कहानी है और नाम बदलने में कितना खर्च आता है, ये सब बातें जानना भी तो दिलचस्प होगा.
क्यों उठी नाम बदलने की इतनी बड़ी मांग?
ये सारी बातें तब और तेज़ी से उठने लगीं, जब बिहार में बीजेपी नेता सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री बने. याद कीजिए, उत्तर प्रदेश में भी कुछ ऐसा ही हुआ था, जब इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज और फैजाबाद का नाम बदलकर अयोध्या कर दिया गया था.
अब बिहार में भी सीएम सम्राट से वैसी ही कुछ पहल की उम्मीद की जा रही है. बीजेपी का अपना राष्ट्रवाद का एजेंडा है और वह अपनी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान को सबसे ऊपर रखने की बात करती है.
इसी एजेंडे को मजबूत करने के लिए देश के कई राज्यों में नाम बदलने का प्रयोग पहले ही हो चुका है और अब बिहार में भी ऐसी ही नज़ीर पेश करने की तैयारी दिख रही है.
किन 5 शहरों के नाम बदलने की हो रही है बात?
1. पटना: कभी अखंड भारत की राजधानी था पाटलिपुत्र
पटना का इतिहास बहुत पुराना और गौरवशाली रहा है. इतिहास की किताबों में इसे पाटलिपुत्र के नाम से जाना जाता था, जो कभी अखंड भारत की राजधानी हुआ करता था.
गंगा किनारे बसा ये शहर पटना कैसे बन गया, इसकी भी कई कहानियां हैं. कुछ लोग कहते हैं कि राजा पत्रक ने अपनी रानी पाटलि के लिए ये शहर बसाया था.
आज से करीब 3 हज़ार साल पहले इस पूरे इलाके में पाटलि नाम के ढेर सारे पेड़ हुआ करते थे, जिससे इसका नाम पाटलिपुत्र पड़ा.
फिर मुगल शासक औरंगजेब का ज़माना आया. साल 1704 में, उसके पोते मोहम्मद अजीम के कहने पर, जिसका नाम अजीम था और वो उस वक्त पटना का सूबेदार था, इस शहर का नाम बदलकर 'अजीमाबाद' कर दिया गया.
लेकिन ये नाम ज्यादा दिन तक नहीं चला. चंद्रगुप्त मौर्य और सम्राट अशोक जैसे महान राजाओं के दौर में पाटलिपुत्र, मौर्य सत्ता का सबसे बड़ा केंद्र था.
सम्राट अशोक के समय तो पाटलिपुत्र दुनिया के सबसे अमीर और विकसित शहरों में से एक गिना जाता था. फिर ब्रिटिश काल आया और इस शहर का नाम बदलकर 'पटना' हो गया.
अब फिर से मांग उठ रही है कि पाटलिपुत्र को उसकी पुरानी पहचान लौटाई जाए. हाल ही में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने पटना के पास पुनपुन में एक सैटेलाइट टाउनशिप बनाने की बात कही और उसका नाम ‘पाटलिपुत्र’ रखने का इरादा भी ज़ाहिर किया.
ये एक संकेत है कि सरकार भी इस दिशा में सोच रही है.
हमने बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष अनिल सुलभ से इस बारे में बात की, जिनकी संस्था भी पटना का नाम पाटलिपुत्र करने की मांग करती रही है. उन्होंने हमें बताया, ‘एक वक्त था जब पटना अखंडित भारत की राजधानी था.
ये सिर्फ एक शहर का नाम नहीं, हमारी सभ्यता और संस्कृति का प्रतीक है.’
अनिल सुलभ ने आगे कहा, ‘पटना की जगह पाटलिपुत्र नाम रखने के लिए विधान परिषद में एक संकल्प भी लाया गया था. प्रेम कुमार, नंदकिशोर यादव, जनार्दन सिंह सिग्रीवाल जैसे कई बड़े नेताओं ने उस वक्त इसका समर्थन किया था.
सरकार ने जवाब दिया था कि वे एक सैटेलाइट टाउनशिप बनाएंगे और उसका नाम पाटलिपुत्र रखेंगे.’
उन्होंने ये भी बताया कि भले ही पूरे पटना का नाम पाटलिपुत्र नहीं किया गया, लेकिन पटना लोकसभा की एक सीट का नाम ‘पाटलिपुत्र’ कर दिया गया. दीघा इलाके में एक पाटलिपुत्र रेलवे स्टेशन भी बना.
सुलभ जी मानते हैं कि अब एक बार फिर से इस मांग को और भी दमदार तरीके से उठाने का सही वक्त आ गया है.
2. बख्तियारपुर बनेगा व्यासपुर और बाकी भी कतार में
बात सिर्फ पटना की नहीं है. बिहार के दूसरे शहर बख्तियारपुर का नाम बदलने की भी जोरदार मांग है.
इस शहर का नाम एक आक्रांता बख्तियार खिलजी के नाम पर है, जिसने नालंदा विश्वविद्यालय को तबाह किया था. अब इसे बदलकर 'व्यासपुर' करने की बात चल रही है.
वहीं, औरंगाबाद को ‘आदित्य नगर’ और जहानाबाद, सुल्तानगंज के भी नाम बदलने की मांगें उठी हैं, जिनके पीछे अपनी-अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी दलीलें हैं. ये देखना दिलचस्प होगा कि सम्राट सरकार इस दिशा में कितना आगे बढ़ती है और बिहार के नक्शे पर कौन-कौन से नए नाम उभर कर आते हैं.




































