नई दिल्ली: भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्तों की कड़वाहट अब सिर्फ सरहदों तक सीमित नहीं रही, बल्कि अब बात पानी के बंटवारे और दशकों पुरानी संधियों तक पहुँच गई है। सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) को लेकर एक बार फिर माहौल गरमाया हुआ है। विदेश मंत्रालय ने साफ कर दिया है कि भारत का रुख एकदम स्पष्ट है और इसमें कोई बदलाव नहीं आया है। सीधा संदेश यह है कि अगर पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद को बढ़ावा देना बंद नहीं करता, तो भारत अपनी शर्तों पर बात करेगा।
दरअसल, यह पूरा विवाद तब और गहरा गया जब इस्लामाबाद में इस संधि को लेकर एक सेमिनार हुआ। वहाँ पाकिस्तान के डिप्टी पीएम इशाक डार ने भारत के फैसले को खारिज करते हुए कहा कि कोई भी देश एकतरफा तरीके से संधि को खत्म या सस्पेंड नहीं कर सकता।
पाकिस्तान का तर्क है कि इस ट्रीटी में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो किसी एक देश को इसे रोकने की इजाजत दे। लेकिन भारत का रुख इस बात पर टिका है कि आतंकवाद और बातचीत एक साथ नहीं चल सकते।
आतंकवाद और संधि का कनेक्शन
भारत ने यह सख्त कदम अचानक नहीं उठाया। इसकी पृष्ठभूमि में वह दर्दनाक आतंकी हमला है जो 22 अप्रैल को पहलगाम में हुआ था।
उस हमले में 26 मासूम लोगों की जान चली गई थी। इस घटना के बाद भारत ने कड़ा रुख अपनाते हुए 2025 में इस संधि को रोकने का फैसला किया था।
भारत का मानना है कि जब पड़ोसी देश आतंकवाद का समर्थन कर रहा हो, तो ऐसी संधियों का पालन करना मुश्किल हो जाता है।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने अपनी साप्ताहिक मीडिया ब्रीफिंग में इस मुद्दे पर जब सवाल पूछा गया, तो उन्होंने बिना किसी लाग-लपेट के कह दिया कि सिंधु जल संधि पर भारत का रुख वही है जो पहले था। यानी, भारत अपनी बात पर अडिग है और पाकिस्तान को अब अपनी प्राथमिकताएं तय करनी होंगी।
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क्या है सिंधु जल संधि का पूरा मामला?
अगर आप सोच रहे हैं कि यह संधि आखिर है क्या, तो आपको बता दें कि यह दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण जल समझौतों में से एक है। साल 1960 में वर्ल्ड बैंक की मध्यस्थता से भारत और पाकिस्तान के बीच यह समझौता हुआ था।
इसका मकसद सिंधु नदी और उसकी सहायक नदियों के पानी के बंटवारे और इस्तेमाल को कंट्रोल करना था ताकि दोनों देशों के बीच पानी को लेकर कोई बड़ा विवाद न हो।
इस संधि के तहत नदियों का बंटवारा किया गया था, लेकिन पिछले कुछ समय से भारत ने पाकिस्तान के रवैये को देखते हुए इस समझौते की समीक्षा और इसके कार्यान्वयन पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। भारत का कहना है कि संधि का सम्मान तभी तक संभव है जब तक दोनों पक्ष शांति और सद्भाव बनाए रखें, लेकिन पाकिस्तान की तरफ से लगातार हो रही आतंकी गतिविधियों ने इस भरोसे को तोड़ दिया है।
फिलहाल, गेंद अब पाकिस्तान के पाले में है। भारत ने साफ कर दिया है कि आतंकवाद को सपोर्ट देना बंद करना ही एकमात्र रास्ता है, वरना पानी के बंटवारे जैसी संधियाँ भी अब सुरक्षित नहीं हैं।
विदेश मंत्रालय की यह ब्रीफिंग इस बात का संकेत है कि भारत अब केवल कागजी समझौतों के आधार पर नहीं, बल्कि जमीनी हकीकत और सुरक्षा के आधार पर अपने फैसले लेगा।

