पटना: बिहार की सियासत में आजकल खूब हलचल है. कभी नीतीश-लालू की जोड़ी, तो कभी बीजेपी की धमक. इन सब के बीच, एक और बड़ा खिलाड़ी मैदान में उतरने को तैयार है. हम बात कर रहे हैं कांग्रेस के बड़े नेता राहुल गांधी की, जो 15 जुलाई को पटना आ रहे हैं. राहुल गांधी यहां एक छात्र सम्मेलन को संबोधित करेंगे. देखने में तो ये एक आम दौरा लग रहा है, लेकिन इसका मकसद साफ है – बिहार में कांग्रेस की खोई हुई जमीन वापस दिलाना और पार्टी में नई जान फूंकना.
लेकिन भैया, ये राह इतनी आसान नहीं है. कांग्रेस, जो कभी बिहार की राजनीति का एक अहम हिस्सा हुआ करती थी, आज कई अंदरूनी झगड़ों और घटते जनाधार से जूझ रही है.
राहुल गांधी के सामने चुनौतियां पहाड़ जैसी खड़ी हैं. पार्टी के कार्यकर्ता तो दूर, बड़े नेता भी आपस में ही भिड़े हुए हैं.
ऐसे में राहुल का ये दौरा कितना कामयाब होगा, ये एक बड़ा सवाल है. चलिए, आज आपको बताते हैं कि राहुल गांधी को बिहार में कांग्रेस को फिर से खड़ा करने के लिए किन बड़ी मुश्किलों से पार पाना होगा और पार्टी के अंदर क्या चल रहा है.
जनाधार की जंग: क्यों सिमटती जा रही है कांग्रेस?
एक वक्त था जब कांग्रेस बिहार में मजबूत थी. 2015 के विधानसभा चुनाव में पार्टी के पास 27 विधायक थे.
ये संख्या अच्छी-खासी थी और कांग्रेस गठबंधन में अपनी बात मजबूती से रख पाती थी. लेकिन वक्त बदला, हालात बदले और पार्टी का जनाधार घटता चला गया.
2020 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के विधायकों की संख्या 19 पर आ गई. और आज की तारीख में तो अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, पार्टी की प्रभावी ताकत और भी कम होकर लगभग 6 सीटों तक सिमट गई है.
ये अपने आप में पार्टी के लिए एक खतरे की घंटी है.
कांग्रेस विपक्षी दलों के ‘इंडिया’ गठबंधन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा जरूर है, लेकिन बिहार में उसका अपना पैर उतनी मजबूती से जमा नहीं है. पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और बिहार में राजद जैसे मजबूत क्षेत्रीय दलों की ताकत भी हाल के दिनों में कम हुई है, लेकिन कांग्रेस तो राष्ट्रीय पार्टी होने के बावजूद बिहार में लगातार कमजोर हो रही है.
जनता में निराशा का आलम ये है कि कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम और विधान मंडल दल के नेता डॉ. शकील अहमद खान जैसे बड़े नेता भी चुनाव हार गए थे.
ये दिखाता है कि जमीन पर कांग्रेस की पकड़ कितनी कमजोर हो चुकी है.
राज्यसभा चुनाव में भी महागठबंधन के उम्मीदवार एडी सिंह को हार का सामना करना पड़ा था. इसकी एक बड़ी वजह कांग्रेस के तीन विधायकों का वोट न देना बताया गया था.
जबकि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अखिलेश प्रसाद सिंह ने तो दावा किया था कि सभी विधायक उनके घर पर बैठे हैं. इस घटना से पार्टी के अंदर की खींचतान खुलकर सामने आ गई थी.
बिहार में कांग्रेस, बीजेपी-जेडीयू की बढ़त को तो रोक नहीं पाई, उल्टा खुद और लुढ़कती चली गई. कुछ लोग बीजेपी-जेडीयू पर आरोप लगाते रहे कि उन्होंने 10-10 हजार रुपए बांटकर चुनाव जीता, लेकिन सच्चाई ये है कि राहुल गांधी का चुनावी कैंपेन भी बिहार में उतना सफल नहीं रहा.
अभी न तो कोई विधानसभा चुनाव है और न ही लोकसभा चुनाव. ऐसे में कांग्रेस के पास जनाधार मजबूत करने और अगले चुनावों की तैयारी करने का अच्छा-खासा वक्त है.
आमतौर पर देखा गया है कि कांग्रेस चुनाव के ठीक पहले जागती है, और उसका नतीजा सबके सामने है. क्या इस बार राहुल गांधी इस पैटर्न को बदल पाएंगे?
घर की लड़ाई: जब बड़े नेता ही आमने-सामने
कांग्रेस की मुश्किल सिर्फ बाहर ही नहीं, घर के अंदर भी कम नहीं है. पार्टी में बड़े नेता आपस में ही उलझे हुए हैं.
प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश प्रसाद सिंह के बीच आजकल छत्तीस का आंकड़ा चल रहा है. सिर्फ यही नहीं, अखिलेश प्रसाद सिंह की नाराजगी प्रभारी अल्लावरु और वरिष्ठ नेता डॉ.
शकील अहमद से भी बताई जाती है. ये अंदरूनी खींचतान पार्टी को और कमजोर कर रही है.
हाल ही में दिल्ली में हुए एक कार्यक्रम में तो अखिलेश प्रसाद सिंह ने अपनी भड़ास खुलकर निकाली. उन्होंने हार का ठीकरा सीधे-सीधे प्रभारी अल्लावरु पर फोड़ दिया.
अखिलेश ने कहा कि “मुझे प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाने के बाद बिहार कांग्रेस का जो नतीजा आया, वो सबके सामने है. जिन्हें राजनीति से कोई वास्ता नहीं, उन्हें प्रभारी बना दिया जा रहा है.
” उनके इस बयान ने पार्टी के अंदर की कलह को और उजागर कर दिया.
अखिलेश प्रसाद सिंह ने ‘जिसकी जितनी भागीदारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी’ जैसे नारे की भी खुलकर आलोचना की. दिलचस्प बात ये है कि जहां राहुल गांधी ओबीसी वर्ग को संगठन से लेकर टिकट बंटवारे तक में उनका हक देने की वकालत करते रहे हैं, वहीं अखिलेश प्रसाद सिंह सवर्णों की ताकत और उनके महत्व पर जोर देते दिखे.
ये विचारधारा का टकराव भी पार्टी के लिए एक नई चुनौती खड़ी कर रहा है. कांग्रेस में अखिलेश प्रसाद सिंह के बेटे आकाश भी प्रभारी अल्लावरु पर गंभीर आरोप लगा चुके हैं.
अखिलेश प्रसाद सिंह का झुकाव तो लालू यादव की तरफ भी काफी रहा है. खुद लालू यादव भी यह बात कह चुके हैं कि उन्होंने सोनिया गांधी से पैरवी करके ही अखिलेश को पहली बार.
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