मुंबई: बॉलीवुड की चकाचौंध वाली दुनिया बाहर से जितनी ग्लैमरस दिखती है, अंदर से उतनी ही कड़वी है। इस कड़वाहट का खुलासा किया है फिल्म डायरेक्टर विक्रम भट्ट ने। विक्रम भट्ट का कहना है कि फिल्म इंडस्ट्री में एक बहुत पुराना और अजीब रिवाज है—अगर फिल्म सुपरहिट हो जाए, तो सारी वाहवाही और तालियां बड़े सितारों की झोली में गिरती हैं, लेकिन जैसे ही फिल्म फ्लॉप होती है, सबसे पहले डायरेक्टर की गर्दन पकड़ी जाती है।
विक्रम भट्ट ने अपने चार दशकों के करियर का निचोड़ निकालते हुए एक ऐसी बात कही जो किसी भी फिल्ममेकर को चुभ सकती है। उन्होंने बेबाकी से कहा कि निर्देशकों को दरअसल "फ्लॉप फिल्मों की लाश उठाने के पैसे दिए जाते हैं।
" उनका मानना है कि डायरेक्टर वह इंसान है जो फिल्म की असफलता का बोझ अकेले ढोता है, जबकि सफलता का क्रेडिट स्टार्स ले जाते हैं।
हॉरर फिल्मों को हिंदी सिनेमा में एक नई दिशा देने वाले विक्रम भट्ट ने अपने सफर में हर तरह का उतार-चढ़ाव देखा है। उन्होंने जहां एक तरफ ब्लॉकबस्टर फिल्में दीं, वहीं निजी विवादों और जेल तक का सफर भी तय किया।
लेकिन इन सबके बावजूद वह आज भी अपने सिद्धांतों पर कायम हैं और स्टार सिस्टम की असलियत पर खुलकर बात कर रहे हैं।
हॉरर फिल्मों से बनाई अपनी खास पहचान
विक्रम भट्ट का फिल्मी सफर काफी दिलचस्प रहा है। वह फिल्मी माहौल में ही पले-बढ़े, इसलिए सिनेमा की बारीकियां उन्हें बचपन से पता थीं।
शुरुआती दौर में उन्होंने रोमांटिक और थ्रिलर फिल्मों के साथ एक्सपेरिमेंट किया, लेकिन उन्हें असली पहचान तब मिली जब उन्होंने हॉरर जॉनर को गंभीरता से लिया।
उनकी फिल्में 'राज', '1920', 'शापित' और 'हॉन्टेड 3डी' ने बॉक्स ऑफिस पर तहलका मचाया। इन फिल्मों ने यह साबित कर दिया कि अगर कहानी दमदार हो और ट्रीटमेंट सही हो, तो डरावनी फिल्में भी दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींच सकती हैं।
विक्रम भट्ट ने हॉरर फिल्मों के जरिए इंडस्ट्री में अपना एक अलग मुकाम बनाया और लोगों को यह बताया कि डर का बिजनेस कैसे किया जाता है।
बड़े स्टार्स बनाम नए कलाकार: किसका पलड़ा भारी?
विक्रम भट्ट ने अपने करियर में अमिताभ बच्चन, मिथुन चक्रवर्ती, आमिर खान, अक्षय कुमार और सुनील शेट्टी जैसे दिग्गजों के साथ काम किया है। साथ ही उन्होंने कई नए चेहरों को लॉन्च भी किया।
जब उनसे पूछा गया कि बड़े स्टार्स और नए कलाकारों के साथ काम करने में क्या फर्क होता है, तो उन्होंने बहुत ही व्यावहारिक जवाब दिया।
विक्रम के मुताबिक, अनुभवी कलाकार मंझे हुए होते हैं और उनके काम करने का तरीका तय होता है, लेकिन कई बार उनमें वह सीखने की ललक नहीं होती जो नए कलाकारों में होती है। नए कलाकार भले ही उतने ट्रेंड न हों, लेकिन उनमें कुछ नया कर दिखाने का जज्बा और उत्साह होता है।
वह कहते हैं कि स्टार्स के साथ काम करने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि फिल्म को एक शानदार ओपनिंग मिलती है और एक अनुभवी अभिनेता का साथ मिलता है। वहीं, नए कलाकारों के साथ काम करते समय डायरेक्टर को एक ऐसा इंसान मिलता है जो सीखने के लिए तैयार रहता है।
उनके लिए दोनों के अपने-अपने फायदे हैं, लेकिन चुनौती दोनों ही जगह अलग होती है।
जिम्मेदारी डायरेक्टर की; श्रेय सितारों का
फिल्म निर्माण की प्रक्रिया में निर्देशक की भूमिका सबसे अहम होती है। विक्रम भट्ट का स्पष्ट मानना है कि चाहे फिल्म में कोई बड़ा सुपरस्टार हो या न हो, पूरी फिल्म की जिम्मेदारी अंततः डायरेक्टर की ही होती है।
विजन डायरेक्टर का होता है, मेहनत डायरेक्टर की होती है, लेकिन जब बात क्रेडिट की आती है, तो समीकरण बदल जाते हैं।
विक्रम भट्ट का यह बयान इंडस्ट्री के उस सिस्टम पर चोट करता है जहाँ निर्देशक को केवल तब याद किया जाता है जब फिल्म असफल होती है। उनके मुताबिक, सफलता और असफलता का श्रेय बराबर नहीं बंटता, और यही वजह है कि निर्देशक अक्सर पर्दे के पीछे रहकर अपनी मेहनत का फल सितारों को जाते हुए देखता है।

