लुधियाना: पंजाब में अगले विधानसभा चुनाव को अभी आठ महीने का वक्त है, लेकिन कांग्रेस के भीतर घमासान की स्क्रिप्ट अभी से लिखी जाने लगी है. हालिया घटनाक्रम ऐसा है कि लगने लगा है, मानों पुरानी कोई फिल्म फिर से पर्दे पर लौट आई हो, बस किरदार बदल गए हैं. कहानी के इस नए अध्याय में पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी ने कांग्रेस हाईकमान के फैसले के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. मुद्दा है अमरिंदर राजा वड़िंग को पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाए रखने का फैसला, जिसे चन्नी और उनके समर्थक फूटी आँख नहीं सुहा रहा. कांग्रेस में यह रार कोई दबे-छुपे तरीके से नहीं, बल्कि खुलेआम सड़क पर आ गई है और इसके गंभीर राजनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं.
मामले की शुरुआत पिछले शुक्रवार को हुई, जब चरणजीत सिंह चन्नी ने मोरिंडा स्थित अपने घर पर 50 से ज़्यादा नेताओं को एक मंच पर इकट्ठा कर हाईकमान को सीधा संदेश दे दिया. इस बैठक में साफ कह दिया गया कि हाईकमान का फैसला उन्हें मंजूर नहीं है और वे अगले सात दिनों के भीतर दिल्ली में हाईकमान से मिलकर अपना विरोध दर्ज करवाएंगे.
ये सब कुछ हू-ब-हू नवजोत सिंह सिद्धू के उस अंदाज की याद दिलाता है, जब 2021 में उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के खिलाफ ऐसी ही घेराबंदी की थी और आखिरकार उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटवाकर ही दम लिया था. हालांकि, तब सिद्धू खुद मुख्यमंत्री नहीं बन पाए और कुर्सी चन्नी को मिल गई थी, लेकिन आज चन्नी खुद उसी राह पर चल पड़े हैं, जहां से सिद्धू ने हाईकमान पर दबाव बनाने की शुरुआत की थी.
चन्नी की चाल: पुरानी फिल्म का नया ट्रेलर?
पॉलिटिकल एक्सपर्ट्स की मानें तो चन्नी का यह कदम कांग्रेस के लिए नई मुसीबतें खड़ी करने वाला है. जहां एक तरफ 2027 के चुनाव में पार्टी की वापसी की कोशिशें चल रही हैं, वहीं अंदरूनी गुटबाजी का यूं सार्वजनिक होना, सीधे-सीधे पार्टी के चुनावी समीकरणों को बिगाड़ सकता है.
वरिष्ठ पत्रकार और पॉलिटिकल एक्सपर्ट प्रमोद बातिश कहते हैं, "चरणजीत सिंह चन्नी के गुट ने मोरिंडा में जो बैठक की और उसमें हाईकमान के फैसले को सिरे से खारिज किया, उससे कांग्रेस की अंदरूनी लड़ाई अब खुलेआम सड़कों पर आ गई है. इस शक्ति प्रदर्शन में करीब 25 बड़े नेता चन्नी के समर्थन में दिखे, और कई ऐसे भी हैं जो भले ही इस बैठक में मौजूद न रहे हों, लेकिन अंदरखाने चन्नी के साथ हैं.
जब बात आर-पार की होगी, तो वे भी सामने आ सकते हैं." बातिश मानते हैं कि चन्नी ने हाईकमान पर दबाव बनाने की पुरजोर कोशिश की है और इस शक्ति प्रदर्शन का सीधा नुकसान विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को ही झेलना पड़ेगा.
हाईकमान की दुविधा: एक को मनाओ; दूसरा रूठेगा
सवाल यह उठता है कि क्या कांग्रेस हाईकमान चन्नी के इस दबाव के आगे झुकेगा? प्रमोद बातिश इस पर भी अपनी राय रखते हैं. उनके मुताबिक, "अगर चरणजीत सिंह चन्नी के दबाव में आकर कांग्रेस हाईकमान अपने फैसले को बदल देता है, तो निश्चित रूप से कांग्रेस का दूसरा गुट, यानी राजा वड़िंग का गुट नाराज हो जाएगा.
राजा वड़िंग अभी प्रदेश अध्यक्ष हैं और उनके साथ भी बड़ी संख्या में नेता जुड़े हुए हैं. ऐसे में हाईकमान के लिए यह किसी 'टेढ़ी खीर' से कम नहीं है कि वो गुटबाजी के इस दलदल से पार्टी को कैसे बाहर निकाले.
" यह स्थिति हाईकमान के लिए एक तरह से 'कुआं और खाई' जैसी हो गई है. एक तरफ चन्नी का गुस्सा है, तो दूसरी तरफ वड़िंग के समर्थक हैं, और किसी एक को खुश करने का मतलब दूसरे को नाराज करना होगा.
चन्नी के पास क्या हैं विकल्प?
अगर हाईकमान चन्नी गुट की बात नहीं मानता, तो क्या होगा? इस सवाल पर भी प्रमोद बातिश के पास दो विकल्प हैं. वे कहते हैं, "अगर हाईकमान चन्नी की बात नहीं मानता है, तो उनके सामने मुख्य तौर पर दो रास्ते बचते हैं.
पहला, वे चुपचाप कांग्रेस में बने रहें और पार्टी के फैसलों को स्वीकार करें. दूसरा, और ज़्यादा संभावित विकल्प यह है कि वे पार्टी छोड़ दें और किसी दूसरे दल में शामिल हो जाएं.
या फिर, यह भी हो सकता है कि चन्नी अपने पूरे समर्थक गुट के साथ मिलकर एक नई राजनीतिक पार्टी खड़ी कर दें." यह स्थिति कांग्रेस के लिए पंजाब में एक बड़ा झटका साबित हो सकती है, खासकर तब जब पार्टी पहले से ही अपनी जमीन मजबूत करने की जद्दोजहद में है.
सिद्धू वाला 'पैटर्न': क्या चन्नी को मिलेगा फल?
पॉलिटिकल एक्सपर्ट पवनदीप शर्मा भी इस पूरे घटनाक्रम को नवजोत सिंह सिद्धू के पुराने पैटर्न से जोड़ते हैं. वे बताते हैं, "चरणजीत सिंह चन्नी बिल्कुल उसी पैटर्न पर काम कर रहे हैं, जिस पैटर्न पर 2022 विधानसभा चुनाव से पहले सिद्धू ने काम किया था.
तब सिद्धू प्रदेश अध्यक्ष थे और उनकी सीधी कोशिश कैप्टन अमरिंदर सिंह को मुख्यमंत्री पद से हटवाने की थी, ताकि वो खुद मुख्यमंत्री बन सकें. सिद्धू ने तब कांग्रेस के कई नेताओं को एकजुट किया और कैप्टन को हटवाने में कामयाब भी रहे.
लेकिन मुख्यमंत्री बनने की बारी आई तो हाईकमान ने उन्हें नहीं, बल्कि चन्नी को चुना था." अब चन्नी भी उसी राह पर हैं, जहां वे हाईकमान पर दबाव बनाकर अपनी पसंद का प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त करवाना चाहते हैं.
देखना होगा कि उनकी यह चाल सफल होती है या नहीं, और इस पूरे खेल का अंत कांग्रेस के लिए क्या नया मोड़ लेकर आता है. इस बीच, पंजाब कांग्रेस के प्रभारी भूपेश बघेल भी आज चंडीगढ़ पहुंच सकते हैं, जिससे साफ है कि हाईकमान इस आंतरिक कलह को गंभीरता से ले रहा है.

