अंतर्राष्ट्रीय बाजार: मंगलवार (7 जुलाई, 2026) का दिन सोने-चांदी के निवेशकों के लिए थोड़ा 'ठंडा' रहा। जो चमक पिछले हफ्ते इन कीमती धातुओं के बाजार में वापस आई थी, वो आज थोड़ी फीकी पड़ गई। एक तरफ जहाँ सोना अपना थोड़ा सा तेज खो बैठा, वहीं चांदी भी अपनी पिछली बढ़त से थोड़ी फिसल गई। इसे ऐसे समझिए जैसे कोई धावक रेस में तेजी से भागा हो, लेकिन फिनिश लाइन से ठीक पहले थोड़ा धीमा पड़ जाए।
असल में, पिछले हफ्ते गोल्ड और सिल्वर ने बाजार में जबरदस्त वापसी की थी, लेकिन मंगलवार को सुबह की शुरुआत ही गिरावट के साथ हुई। निवेशक अब अमेरिकी मॉनेटरी पॉलिसी के अगले कदम और बाजार के बड़े डेवलपमेंट्स पर अपनी निगाहें गड़ाए हुए हैं।
यही वजह है कि पिछले हफ्ते की मजबूत रिकवरी के बाद, इन धातुओं में थोड़ी गिरावट देखने को मिली।
सोने-चांदी का आज का खेल: आंकड़े क्या कहते हैं?
अगर आंकड़ों की बात करें तो, COMEX पर सोना $4,152 प्रति औंस के आसपास कारोबार कर रहा था। यह पिछले बंद से $15.50, यानी 0.37% की गिरावट थी।
जबकि दिन के दौरान, सोना $4,179.50 प्रति औंस के हाई लेवल तक पहुंच गया था, लेकिन उस चमक को बरकरार नहीं रख सका। वहीं, चांदी की कहानी भी कुछ ऐसी ही रही।
COMEX पर चांदी $62.59 प्रति औंस के सेशन हाई लेवल को छूने के बाद 0.89% फिसलकर $61.775 प्रति औंस पर आ गई। मतलब, सोने से ज्यादा तेज गिरावट चांदी में देखी गई।
पिछले हफ्ते की तेजी और उसके पीछे की वजह
अब सवाल उठता है कि पिछले हफ्ते सोने-चांदी में इतनी तेज बढ़ोतरी क्यों हुई थी? इसकी कई वजहें थीं, जो एक साथ काम कर रही थीं।
- कमजोर अमेरिकी जॉब्स डेटा: अमेरिका में नौकरी के आंकड़े उम्मीद से कमजोर आए थे। जब रोजगार बाजार कमजोर होता है, तो इससे डॉलर कमजोर होता है। और जब डॉलर कमजोर होता है, तो सोना और चांदी जैसी कीमती धातुएं दूसरे देशों के निवेशकों के लिए सस्ती हो जाती हैं, जिससे उनकी मांग बढ़ती है और कीमतें ऊपर जाती हैं।
- कमजोर अमेरिकी डॉलर: जॉब्स डेटा के अलावा भी अमेरिकी डॉलर में कमजोरी दिखी, जिसने सोने को लगभग 2% और चांदी को करीब 5% की बढ़त दी।
- फेडरल रिजर्व से उम्मीद: कमजोर आर्थिक आंकड़ों के बाद ऐसी उम्मीद जगी कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व ब्याज दरों को लेकर शायद उतना 'आक्रामक' रवैया न अपनाए। कम ब्याज दरें आमतौर पर सोने के लिए अच्छी मानी जाती हैं, क्योंकि यह एक नॉन-यील्डिंग एसेट है (यानी इस पर कोई ब्याज नहीं मिलता)। जब ब्याज दरें कम होती हैं, तो सोने को अपने पास रखने की लागत कम हो जाती है, जिससे यह निवेशकों के लिए ज्यादा आकर्षक बन जाता है।
विशेषज्ञ की राय: पृथ्वीराज कोठारी का विश्लेषण
इस पूरे उतार-चढ़ाव पर रिद्धिसिद्धि बुलियंस के मैनेजिंग डायरेक्टर और इंडिया बुलियन एंड ज्वैलर्स एसोसिएशन (IBJA) के प्रेसिडेंट पृथ्वीराज कोठारी ने अपनी बात रखी। उन्होंने बताया कि इस तेजी के पीछे कुछ भू-राजनीतिक वजहें भी थीं।
हॉरमुज स्ट्रेट के आसपास जो भू-राजनीतिक तनाव बना हुआ था, उसने सोने को सहारा दिया। इसके अलावा, गोल्ड एक्सचेंज-ट्रेडेड फंड्स (ETF) में भले ही निवेश कम रहा हो, लेकिन दुनिया भर के सेंट्रल बैंकों द्वारा सोने की लगातार खरीदारी ने बाजार को अतिरिक्त सपोर्ट दिया।
कोठारी ने यह भी कहा कि हाल के निचले स्तरों से सोने का उछाल काफी तेज रहा है। उनके मुताबिक, एक बड़े अपट्रेंड (तेजी का रुख) शुरू होने से पहले, शॉर्ट-टर्म पुलबैक (थोड़ी गिरावट) मुमकिन है।
चांदी के बारे में उनका कहना था कि हाल की रैली के बाद इसमें भी कुछ कंसोलिडेशन (एक दायरे में स्थिरता) देखने को मिल सकता है, जिसके बाद ही यह एक और ऊपर जाने की कोशिश करेगी।
आगे क्या? किन बातों पर रहेगी निवेशकों की नज़र?
अब बाजार के खिलाड़ी ब्याज दरों के रास्ते के बारे में नए सुराग पाने के लिए नए आर्थिक डेटा और अमेरिकी फेडरल रिजर्व के संकेतों का इंतजार कर रहे हैं। जैसा कि पहले बताया गया, कम ब्याज दरें आमतौर पर सोने जैसे नॉन-यील्डिंग एसेट्स को सपोर्ट करती हैं, क्योंकि उन्हें रखने की लागत कम हो जाती है।
इसके साथ ही, निवेशक ग्लोबल कमोडिटी मार्केट्स में हो रहे डेवलपमेंट्स पर भी गहरी नज़र रखे हुए हैं। मंगलवार (7 जुलाई) को कच्चे तेल की कीमतों में थोड़ी बढ़ोतरी देखी गई।
हालांकि, यह बढ़त सीमित थी, क्योंकि ट्रेडर्स ग्लोबल डिमांड के आउटलुक के मुकाबले OPEC+ प्रोड्यूसर्स से बढ़ी सप्लाई पर विचार कर रहे थे। कच्चे तेल के बाजार में मजबूती से महंगाई की उम्मीदों पर असर पड़ सकता है, जिससे सोने जैसे 'सेफ़-हेवन' एसेट्स की मांग पर असर पड़ सकता है।
इन सब के बीच, भारत के बाजार में गोल्ड-बैक्ड फाइनेंसिंग की मांग मजबूत बनी हुई है। हाल ही में CRISIL रेटिंग्स की एक रिपोर्ट आई थी, जिसके मुताबिक अप्रैल-जून तिमाही में गोल्ड लोन सबसे बड़ा सिक्योरिटाइज़्ड एसेट क्लास बनकर उभरा।
यह दिखाता है कि भारत में सोने को सिर्फ एक आभूषण या निवेश के तौर पर ही नहीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर पैसों की व्यवस्था करने के एक अहम साधन के तौर पर भी देखा जाता है।






































