अंतरराष्ट्रीय: दुनिया की वो सबसे अहम समुद्री सड़क, जहां से दुनिया का एक तिहाई कच्चा तेल गुजरता है, उस पर फिर से आग लग गई है। हम बात कर रहे हैं होर्मुज जलडमरूमध्य की, जहां सोमवार को एक तेल टैंकर पर मिसाइल हमला हुआ है। इस हमले ने सिर्फ टैंकर को आग के हवाले नहीं किया, बल्कि कच्चे तेल की कीमतों में आग लगाने और अमेरिका-ईरान के बीच नई जंग छेड़ने का खतरा भी पैदा कर दिया है।
ताजा खबर ये है कि ये हमला तब हुआ, जब अमेरिका और ईरान के बीच पिछले हफ्ते ही खत्म हुआ एक शांति समझौता टूटा है। अमेरिकी अधिकारी दावा कर रहे हैं कि ये हमला ईरान के 'इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स' (IRGC) ने जानबूझकर दो व्यापारिक जहाजों पर किया है।
अगर ये सच है, तो इसका मतलब है कि दुनिया एक बार फिर ऊर्जा संकट और मध्य-पूर्व में तनाव के एक नए दौर की तरफ बढ़ रही है।
होर्मुज जलडमरूमध्य, जिसे अक्सर ग्लोबल ऑयल सप्लाई की धड़कन कहा जाता है, अपनी संवेदनशीलता और रणनीतिक महत्व के लिए जाना जाता है। ओमान के तट से करीब 8 समुद्री मील दूर हुए इस हमले ने दुनिया की अर्थव्यवस्था पर गहरा असर डालने की क्षमता रखता है।
मिसाइल हमला और अमेरिका-ईरान का दावा
यूनाइटेड किंगडम मैरीटाइम ट्रेड ऑपरेशंस (UKMTO) की तरफ से मिली जानकारी के मुताबिक, ये हमला सोमवार को हुआ। एक बड़े तेल टैंकर पर मिसाइल या ड्रोन से वार किया गया, जिससे उसमें भीषण आग लग गई।
UKMTO ने बताया कि ये टैंकर होर्मुज जलडमरूमध्य से दक्षिण की ओर बढ़ रहा था, तभी उसके पोर्ट साइड (जहाज के बाईं ओर) में मिसाइल लगी। राहत की बात ये है कि इस घटना में जहाज पर मौजूद किसी भी क्रू मेंबर को कोई चोट नहीं आई है और न ही पर्यावरण को कोई बड़ा नुकसान हुआ है।
लेकिन मामला सिर्फ इतना नहीं है। अमेरिकी अधिकारियों ने तुरंत इस हमले के पीछे ईरान के 'इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स' (IRGC) का हाथ बताया।
अमेरिकी मीडिया आउटलेट 'एक्सियोस' ने दो अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से पुष्टि की है कि ईरान ने जानबूझकर दो व्यापारिक जहाजों को निशाना बनाया, जिससे उन्हें भारी नुकसान हुआ है। अमेरिका अब इस हमले के जवाब में ईरानी ठिकानों पर जवाबी सैन्य कार्रवाई की तैयारी कर रहा है।
ये एक खतरनाक मोड़ है, जो पूरे क्षेत्र को युद्ध की आग में धकेल सकता है।
क्यों टूटा शांति समझौता और क्या है इतिहास?
ये हमला ऐसे समय में हुआ है, जब वॉशिंगटन और तेहरान के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य में हमलों को रोकने के लिए हुआ एक हफ्ते का संघर्ष विराम समझौता अभी-अभी खत्म हुआ था। सिर्फ तीन हफ्ते पहले ही दोनों देशों ने एक सहमति पत्र पर दस्तखत किए थे, जो अब पूरी तरह से टूटता नजर आ रहा है।
पिछले हफ्ते कतर की राजधानी दोहा में दोनों पक्षों के बीच अप्रत्यक्ष बातचीत हुई थी। इस बातचीत का मकसद इस रणनीतिक समुद्री रास्ते के भविष्य को लेकर कोई ठोस रास्ता निकालना था, लेकिन दुर्भाग्य से वो बिना किसी नतीजे के खत्म हो गई।
ऐसा नहीं है कि ये पहली बार हुआ है। ईरान ने पहले भी इस रास्ते की घेराबंदी की है और कई व्यापारिक जहाजों पर हमले किए हैं।
तब अमेरिका ने इसके जवाब में नौसैनिक नाकेबंदी की थी, जिससे हालात और तनावपूर्ण हो गए थे।
पिछले महीने हुए समझौते के बाद ही इस रास्ते पर जहाजों की आवाजाही दोबारा शुरू हो पाई थी, लेकिन अब ये फिर से खतरे में है। ये दिखाता है कि मध्य-पूर्व में शांति कितनी नाजुक है और एक छोटी सी चिंगारी कब बड़ी आग में बदल जाए, कोई नहीं जानता।
ईरान की नई चाल: 'टोल' वसूलने की तैयारी?
इस पूरी कहानी में एक और नया और खतरनाक पहलू जुड़ गया है। ईरान ने साफ कर दिया है कि वह युद्ध से पहले वाली स्थिति में वापस नहीं जाएगा।
'ईरान अब जहाजों से वसूलेगा 'टोल'' – ये वो बयान है जो ईरान की तरफ से आया है। इसका सीधा मतलब है कि ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों से एक तरह का टैक्स या फीस वसूलना चाहता है।
अगर ऐसा होता है, तो ये अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानूनों का सीधा उल्लंघन होगा और वैश्विक व्यापार के लिए एक बड़ा खतरा पैदा करेगा। दुनिया का एक बड़ा हिस्सा अपने कच्चे तेल के लिए इस रास्ते पर निर्भर है।
अगर ईरान यहां से गुजरने वाले जहाजों से टोल वसूलना शुरू कर देता है या उन पर हमले जारी रखता है, तो इसका सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ेगा।
पहले से ही महंगाई की मार झेल रही दुनिया के लिए कच्चे तेल की कीमतों में उछाल एक और बड़ा झटका होगा। पेट्रोल और डीजल की कीमतें आसमान छूने लगेंगी, जिसका सीधा असर आम आदमी की जेब पर पड़ेगा।
अमेरिका ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया देने की बात कही है, जिससे ये साफ है कि दोनों देशों के बीच तनाव कम होने के बजाय और बढ़ने वाला है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ये सिर्फ तेल टैंकर पर हमला नहीं है, बल्कि अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे 'छाया युद्ध' (Shadow War) का एक और अध्याय है। होर्मुज जलडमरूमध्य में स्थिरता बनाए रखना वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए बेहद जरूरी है।
इस घटना ने एक बार फिर दुनिया को चिंता में डाल दिया है कि कहीं ये छोटी सी घटना बड़े संघर्ष में न बदल जाए।









































