नई दिल्ली: तेल बाजार में इस वक्त कुछ बड़ा पक रहा है, जिसकी खुशबू या कह लीजिए, झटका, पूरी दुनिया महसूस करेगी। सऊदी अरब ने एक ऐसा दांव चला है, जिसने कच्चे तेल की कीमतों के खेल में हलचल मचा दी है। पिछले 26 सालों में ऐसा पहली बार हुआ है कि सऊदी की सरकारी तेल कंपनी अरामको ने अपने एशियाई ग्राहकों के लिए कच्चे तेल की कीमत में इतनी बड़ी कटौती का ऐलान किया है।
आप सोच रहे होंगे कि आखिर ये कटौती कितनी है और इसके मायने क्या हैं? अगस्त के महीने के लिए अरामको ने अपने सबसे ज्यादा बिकने वाले ‘अरब लाइट क्रूड’ की कीमत में सीधे-सीधे 11 डॉलर प्रति बैरल की कटौती कर दी है। अब एशिया के ग्राहकों को यह तेल क्षेत्रीय बेंचमार्क के मुकाबले 1.50 डॉलर प्रति बैरल की छूट पर मिलेगा।
मजेदार बात तो ये है कि ब्लूमबर्ग के जानकारों ने अनुमान लगाया था कि कटौती करीब 8 डॉलर प्रति बैरल की होगी, लेकिन अरामको ने तो उससे भी कहीं ज्यादा बड़ी कैंची चला दी। ये फैसला तेल बाजार में एक नए समीकरण की तरफ इशारा कर रहा है, जिसके पीछे कई बड़ी वजहें हैं।
आइए, इनकी गहराई से पड़ताल करते हैं।
तेल की कीमतों में गिरावट की बड़ी वजहें
इस अप्रत्याशित कटौती के पीछे कई घटनाक्रमों की एक लंबी कहानी है। सबसे पहली और बड़ी वजह है कच्चे तेल की लगातार बढ़ती सप्लाई।
जून के मध्य से ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में गिरावट का सिलसिला जारी है। इस दौरान एक बड़ा घटनाक्रम हुआ जिसने खेल बदल दिया – अमेरिका और ईरान के बीच संघर्षविराम।
इस समझौते के बाद फारस की खाड़ी में मौजूद जलमार्ग, जिसे स्ट्रेट ऑफ होर्मुज कहते हैं, में जहाजों की आवाजाही एक बार फिर सामान्य हो गई।
आप इसे ऐसे समझिए कि जब किसी चीज की सप्लाई आसान हो जाती है और बाजार में उसकी भरमार हो जाती है, तो उसकी कीमत अपने आप नीचे आने लगती है। तेल के साथ भी यही हुआ।
होर्मुज जलमार्ग का सामान्य होना मतलब ज्यादा तेल का आसानी से बाजार तक पहुंचना, जिससे कीमतों पर दबाव बढ़ गया। इसका सीधा असर ब्रेंट क्रूड पर देखने को मिला, जिसकी कीमत गिरकर लगभग 72 डॉलर प्रति बैरल पर आ गई।
ये वही स्तर है, जहां ब्रेंट क्रूड फरवरी के आखिर में था। यानी, इतने बड़े अंतरराष्ट्रीय संघर्ष के बाद भी कीमतें लगभग उसी जगह पर लौट आई हैं, जहां से कहानी शुरू हुई थी।
मध्य पूर्व से बढ़ता तेल का निर्यात
युद्ध के दौरान सऊदी अरामको को बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा था। फारस की खाड़ी के रास तनूरा बंदरगाह से तेल निर्यात कम कर दिया गया था, क्योंकि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में आवाजाही जोखिम भरी हो गई थी।
उस वक्त कंपनी ने ज्यादातर तेल यनबू बंदरगाह के जरिए भेजा था। लेकिन अब हालात पूरी तरह से बदल चुके हैं।
समुद्री यातायात फिर से सामान्य हो गया है, और इसका फायदा उठाते हुए अरामको ने रास तनूरा से भी निर्यात बढ़ा दिया है। जानकारी के मुताबिक, रास तनूरा से होने वाला निर्यात अब युद्ध शुरू होने से पहले के स्तर के करीब 90% तक पहुंच गया है।
इसका मतलब है कि मध्य पूर्व से बाजार में पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा तेल पहुंच रहा है, जो कीमतों पर और दबाव डाल रहा है।
OPEC+ का फैसला और भविष्य के संकेत
तेल बाजार पर दबाव बढ़ाने में एक और बड़ा फैसला काम कर रहा है, वो है OPEC+ समूह का। इस समूह की कमान सऊदी अरब और रूस जैसे बड़े तेल उत्पादक देशों के हाथ में है।
OPEC+ ने अगस्त के लिए एक बार फिर तेल उत्पादन बढ़ाने का फैसला किया है। युद्ध के दौरान कई खाड़ी देशों के लिए उत्पादन बढ़ाना आसान नहीं था, क्योंकि होर्मुज के रास्ते तेल भेजना मुश्किल था।
लेकिन अब जब समुद्री रास्ता सामान्य हो गया है, तो सऊदी अरब, इराक और कुवैत जैसे देश अपने बढ़े हुए उत्पादन कोटे का पूरा फायदा उठा सकेंगे।
बाजार के जानकार इस फैसले को एक साफ संकेत मान रहे हैं। उनका कहना है कि OPEC+ फिलहाल अपने सदस्य देशों को ज्यादा तेल निकालने से रोकना नहीं चाहता।
अगर बाजार में तेल की सप्लाई इसी तरह बढ़ती रही, तो आने वाले महीनों में कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव बना रह सकता है। कुछ एक्सपर्ट तो यहां तक मान रहे हैं कि कच्चे तेल की कीमत 60 डॉलर प्रति बैरल से भी नीचे जा सकती है।
उनका तर्क है कि चीन की आर्थिक नीतियां और उसकी मांग कच्चे तेल के बाजार का पूरा खेल बदल सकती हैं। फिलहाल तो एशियाई ग्राहकों के लिए सऊदी अरब की यह कटौती एक बड़ी राहत की खबर है, लेकिन इसका असर वैश्विक तेल बाजार पर क्या होगा, यह देखना दिलचस्प होगा।






































