श्रावस्ती: उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती जिले में एक रात ऐसी गुजरी, जब हवा में सिर्फ गम और अकीदत घुली थी। शुक्रवार देर रात तक, नासिरगंज और चौगाई इलाकों की गलियों में एक खास महफिल सजी थी, जहां शिया समुदाय के हजारों लोग जमा थे। यह महफिल किसी खुशी के जश्न की नहीं, बल्कि एक हजारों साल पुराने दर्द और एक महान शहादत को याद करने की थी। मौका था मोहर्रम का, और इमाम हुसैन समेत कर्बला के तमाम शहीदों को अपनी श्रद्धांजलि देने के लिए 'मजलिस-ए-अज़ा' का आयोजन किया गया था। इस मजलिस में मातम और नौहाख्वानी की वो गूंज उठी, जिसने सुनने वालों का दिल दहला दिया।
कहते हैं कि इंसानियत को राह दिखाने के लिए कई पैगाम दिए गए, लेकिन कर्बला का पैगाम उन सब में सबसे मुखर और दर्दनाक है। श्रावस्ती में जुटी इस भीड़ ने उसी पैगाम को एक बार फिर बुलंद किया।
देर रात तक चली इस मजलिस में बड़ी तादाद में अज़ादारों ने शिरकत की। सिर्फ बड़े-बुजुर्ग ही नहीं, महिलाएं और युवा भी अपने इमाम की याद में आंसू बहाने और मातम करने पहुंचे थे।
यह किसी त्योहार की तरह इकट्ठा होना नहीं था, बल्कि एक ऐसी ऐतिहासिक त्रासदी की सामूहिक याद थी, जो आज भी ज़ुल्म के खिलाफ खड़े होने की प्रेरणा देती है।
कर्बला की दास्तान: हक और इंसाफ का पैगाम
मजलिस की शुरुआत होते ही माहौल बेहद गमगीन हो गया। ज़ाकिर साहब ने कर्बला के उन वाकयात का विस्तार से वर्णन करना शुरू किया, जिन्हें सुनकर आज भी रूह कांप जाती है।
उन्होंने बताया कि कैसे इमाम हुसैन ने हक और इंसाफ के लिए अपनी और अपने साथियों की जान कुर्बान कर दी थी। ज़ाकिर साहब की आवाज़ में वो दर्द था, जो कर्बला की प्यासी ज़मीन और वहां बहे खून की कहानी को जीवंत कर रहा था।
उन्होंने इमाम हुसैन के उस अटल संकल्प की बात की, जब उन्होंने ज़ुल्म के आगे झुकने से इनकार कर दिया था, भले ही इसके लिए उन्हें अपने सबसे प्यारे लोगों को भी कुर्बान करना पड़ा।
यह सिर्फ एक कहानी नहीं थी, बल्कि इंसानियत के लिए एक सबक था। ज़ाकिर ने अज़ादारों को समझाया कि इमाम हुसैन का बलिदान सिर्फ एक ऐतिहासिक घटना भर नहीं है, बल्कि यह कयामत तक इंसानियत को हक, इंसाफ और सच्चाई के रास्ते पर चलने का पैगाम देता रहेगा।
उन्होंने लोगों से आह्वान किया कि वे इमाम हुसैन के आदर्शों को अपनाएं और उनके दिखाए रास्ते पर चलें। यह रास्ता वो है, जहां ज़ुल्म के खिलाफ आवाज़ उठाना और कमजोरों के साथ खड़े होना सबसे बड़ा फर्ज माना जाता है।
अज़ादारों का हुजूम और मातम की गूंज
जैसे-जैसे ज़ाकिर की तकरीर आगे बढ़ती गई, मजलिस में मौजूद अज़ादारों की आंखें नम होती गईं। फिर बारी आई नौहाख्वानी की।
नौहाख्वान अपनी दर्द भरी आवाज़ में कर्बला की शहादत को बयान कर रहे थे। एक-एक शब्द, एक-एक धुन में गम और मायूसी घुली हुई थी।
नौहाख्वानी की आवाज से पूरा इलाका गूंज रहा था। इसके साथ ही अज़ादारों ने मातम करना शुरू किया।
सीना कोबी और सर पर हाथ मारकर, वे इमाम हुसैन और कर्बला के शहीदों के लिए अपना गम और अकीदत ज़ाहिर कर रहे थे। यह सिर्फ एक रस्म नहीं थी, बल्कि अपने इमाम के प्रति अटूट प्रेम और उस शहादत के प्रति सम्मान का इजहार था, जिसने इतिहास को हमेशा के लिए बदल दिया।
मजलिस में उपस्थित हर शख्स इस दर्द में शरीक था। बच्चे, महिलाएं, और बुजुर्ग सब अपने-अपने तरीके से इस ऐतिहासिक त्रासदी को याद कर रहे थे।
सबकी आंखों में आंसू थे और दिलों में इमाम हुसैन के लिए मोहब्बत। इस दौरान सिर्फ मातम ही नहीं, बल्कि दुआएं भी मांगी गईं।
दुआएं इंसानियत की सलामती के लिए, शांति और भाईचारे के लिए, और ज़ुल्म के खिलाफ हमेशा खड़े रहने के जज्बे के लिए।
पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा
स्थानीय लोगों का कहना है कि नासिरगंज और चौगाई में मोहर्रम के दिनों में मजलिस-ए-अज़ा का आयोजन बरसों से होता आ रहा है। यह यहां की एक पुरानी और पवित्र परंपरा है, जिसे हर साल पूरी शिद्दत के साथ निभाया जाता है।
इन मजलिसों के माध्यम से सिर्फ कर्बला की कुर्बानियों को ही याद नहीं किया जाता, बल्कि सब्र, इंसाफ और इंसानियत के उस संदेश को भी नई पीढ़ियों तक पहुंचाया जाता है, जो इमाम हुसैन ने अपने लहू से लिखा था।
इस साल भी यह पूरा कार्यक्रम बेहद शांतिपूर्ण माहौल में संपन्न हुआ। पुलिस और प्रशासन की तरफ से भी सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए थे, ताकि कोई अप्रिय घटना न हो।
लेकिन जिस तरह से अज़ादारों ने शांति और अकीदत के साथ इस मजलिस को अंजाम दिया, वह खुद में एक मिसाल थी। श्रावस्ती ने एक बार फिर दिखाया कि गम और अकीदत के इन पलों को पूरी संजीदगी और अमन के साथ कैसे मनाया जाता है, जहां कर्बला का पैगाम हर दिल तक पहुंचता है।

