इंदौर: मध्य प्रदेश की सियासत में इन दिनों कुछ अलग ही खिचड़ी पक रही है। बात निकली है इंदौर से, जहां बीजेपी के कद्दावर नेता और शिवराज सरकार में रहे मंत्री, अब मोहन सरकार में नगरीय विकास एवं आवास विभाग संभाल रहे कैलाश विजयवर्गीय ने सीधे मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को एक चिट्ठी लिखकर बवाल काट दिया है। ये कोई आम चिट्ठी नहीं, बल्कि एक 'दर्द-ए-बयां' है, जिसमें विजयवर्गीय ने पिछले ढाई साल से मिल रहे असहयोग, उपेक्षा और विरोध का लंबा-चौड़ा हिसाब-किताब दिया है। उन्होंने साफ-साफ कह दिया है कि अगर इंदौर से जुड़े विकास के मुद्दों का समाधान नहीं हुआ, तो जनता की आवाज को सार्वजनिक मंच पर उठाना उनकी मजबूरी होगी। अब सोचिए, एक सीनियर मंत्री अगर अपनी ही सरकार और मुखिया के खिलाफ ऐसी बात कह दे, तो मामला कितना गरमाया होगा!
ये कोई पहली बार नहीं है जब विजयवर्गीय की नाराजगी सामने आई हो। इससे पहले 20 मई को उज्जैन-इंदौर ग्रीन कॉरिडोर के भूमिपूजन कार्यक्रम में भी उनकी नाराजगी साफ दिखी थी।
तब उन्हें खुद मुख्यमंत्री को पास बुलाना पड़ा था, जिससे अंदाजा लग गया था कि 'ऑल इज वेल' नहीं है। लेकिन इस बार तो उन्होंने सीधे कलम उठाई है और 20 जून की अपनी चिट्ठी में पुराने पत्रों को भी अटैच कर दिया है, जिनमें इंदौर के मास्टर प्लान और मेट्रोपॉलिटन अथॉरिटी का नाम इंदौर केंद्रित रखने की मांग की गई थी।
हालांकि, जब मीडिया ने इस चिट्ठी के बारे में पूछा तो विजयवर्गीय साहब पल्ला झाड़ते नजर आए, बोले- "पता नहीं, ये जानकारी आपको कहां से मिली।" उधर, कांग्रेस के दिग्गज नेता दिग्विजय सिंह ने सोशल मीडिया एक्स पर तुरंत चुटकी लेते हुए लिखा, "आपका दर्द व पीड़ा मैं समझ रहा हूं।
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विजयवर्गीय की चिट्ठी में लिखी एक-एक बात
विजयवर्गीय ने अपने पत्र में कई गंभीर मुद्दे उठाए हैं, जो सीधे तौर पर इंदौर के विकास से जुड़े हैं और उनकी परेशानी का सबब बन रहे हैं।
इंदौर को नहीं मिल रहा 'न्याय का हक'
मुख्यमंत्री यादव को लिखी अपनी चिट्ठी में विजयवर्गीय ने साफ कहा है कि प्रदेश के मुखिया और इंदौर जिले के प्रभारी मंत्री होने के नाते उन्हें सहयोग की उम्मीद थी, लेकिन उन्हें लगातार सिर्फ असहयोग और उपेक्षा ही मिली है। उन्होंने यह भी बताया कि उनके विभाग से जुड़े स्थानांतरण भी कई बार उनकी जानकारी के बिना ही कर दिए जाते हैं, जो उनकी अनदेखी का सीधा सबूत है।
विजयवर्गीय का कहना है कि इंदौर के विकास की गति बढ़ाने की बात तो दूर, शहर को उसका 'न्यायोचित हक' भी नहीं मिल पा रहा है। यह बात अपने आप में बहुत बड़ी है, जब एक मंत्री अपने ही शहर के लिए ऐसी शिकायत करे।
मास्टर प्लान अटका; पुराने पत्र भी अनसुने
इंदौर का मास्टर प्लान, जो शहर के भविष्य के विकास की कुंजी है, उसे लेकर विजयवर्गीय बेहद चिंतित हैं। उन्होंने बताया कि इंदौर का मास्टर प्लान करीब दो साल पहले ही मुख्यमंत्री को भेजा जा चुका है।
विभागीय और मुख्य सचिव स्तर पर भी इस पर कई बार चर्चा हो चुकी है, लेकिन आज तक इसे जारी नहीं किया गया है। विजयवर्गीय ने याद दिलाया कि उन्होंने पहले भी इस संबंध में पत्र लिखे थे, लेकिन न तो उनका कोई जवाब मिला और न ही कोई चर्चा हुई।
मास्टर प्लान का यूं अटका रहना इंदौर के सुनियोजित विकास में बड़ी बाधा बन रहा है।
मेट्रोपॉलिटन रीजन के नाम पर 'आपत्ति'
इंदौर मेट्रोपॉलिटन रीजन के नाम को लेकर भी विजयवर्गीय ने अपनी आपत्ति दर्ज कराई है। उन्होंने लिखा कि इंदौर प्रदेश का सबसे बड़ा आर्थिक केंद्र है और इस मेट्रोपॉलिटन रीजन की हर चर्चा हमेशा इंदौर केंद्रित ही रही है।
लेकिन, अधिसूचना में इसका नाम “उज्जैन-इंदौर मेट्रोपॉलिटन रीजन” कर दिया गया है। विजयवर्गीय ने तर्क दिया कि इस पूरे रीजन में इंदौर का हिस्सा शत-प्रतिशत है, जबकि उज्जैन का हिस्सा करीब 59 प्रतिशत है।
ऐसे में नाम बदलना इंदौर की पहचान और उसके महत्व को कम करने जैसा है। यह एक ऐसा मुद्दा है, जो इंदौर की अस्मिता से जुड़ता है।
RGPV विभाजन में इंदौर की अनदेखी
राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (RGPV) को तीन हिस्सों में बांटने के प्रस्ताव पर भी कैलाश विजयवर्गीय ने सवाल उठाए हैं। उन्होंने पत्र में लिखा है कि इस प्रस्ताव में भोपाल, उज्जैन और जबलपुर में नई इकाइयां प्रस्तावित की गई हैं, लेकिन 1952 से स्थापित इंदौर के श्री गोविंदराम सेकसरिया प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान संस्थान (SGSITS) को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया है।
इंदौर में 50 से ज्यादा इंजीनियरिंग कॉलेज हैं और यह शिक्षा का एक बड़ा हब है, इसके बावजूद यहां इकाई स्थापित करने का अवसर नहीं दिया गया, जो बेहद चौंकाने वाला है।
पीथमपुर को सुविधाओं से 'वंचित' रखना
पीथमपुर, जो कि मध्य प्रदेश का एक बड़ा औद्योगिक क्षेत्र है, वहां सुविधाओं की कमी को लेकर भी विजयवर्गीय ने आवाज उठाई है। उन्होंने कहा कि पीथमपुर को पर्याप्त सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं, जबकि यह प्रदेश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देता है।
औद्योगिक विकास के लिए बुनियादी सुविधाओं का मजबूत होना बेहद जरूरी होता है, और उनकी कमी से पूरा क्षेत्र प्रभावित होता है।
कैलाश विजयवर्गीय की यह चिट्ठी मध्य प्रदेश की राजनीति में एक नई बहस छेड़ गई है। एक तरफ जहां सरकार के अंदर की खींचतान सतह पर आ गई है, वहीं दूसरी तरफ इंदौर जैसे महत्वपूर्ण शहर के विकास से जुड़े गंभीर सवाल भी उठ खड़े हुए हैं।
अब देखना ये है कि मुख्यमंत्री मोहन यादव इस 'आवाज' को कैसे सुनते हैं और इन 'असहयोग' के आरोपों पर क्या कार्रवाई होती है।

