जमुई: बिहार के जमुई जिले के बरहट प्रखंड में एक ऐसी कहानी सामने आई है, जो सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच के फासले को साफ दिखाती है। यहां लकरा गांव की विभा देवी अपने छह छोटे-छोटे बच्चों के साथ पिछले ढाई साल से एक ऐसी छत के नीचे रहने को मजबूर हैं, जिसे आप शायद ही 'घर' कह पाएं। सोचिए, एक परिवार, सात लोग, और सिर पर बस एक पॉलीथीन की चादर! यह कोई फिल्म का सीन नहीं, बल्कि आज की तारीख में विभा देवी और उनके बच्चों की रोजमर्रा की जिंदगी है।
बरसात का मौसम आते ही विभा देवी के दिल की धड़कनें तेज हो जाती हैं। उनके मिट्टी के जर्जर घर की छत सालों पहले ही दम तोड़ चुकी है।
अब बस ऊपर एक पॉलीथीन तान दी गई है, जो थोड़ी देर की बूंदाबांदी में तो शायद टिक जाए, लेकिन तेज बारिश में घर को तालाब बनने से नहीं रोक पाती। बारिश होते ही पूरा घर कीचड़ में सराबोर हो जाता है और उस काली रात में बच्चों को कहां छिपाएं, यही विभा देवी की सबसे बड़ी चिंता बन जाती है।
संघर्षों से भरी ज़िंदगी और पलायन का दर्द
विभा देवी की जिंदगी सिर्फ टूटी छत तक ही सीमित नहीं है। उनके पति दीपक राम पहले जमुई में ई-रिक्शा चलाकर जैसे-तैसे परिवार का पेट पालते थे।
लेकिन बढ़ती महंगाई और आमदनी का कम होना, उन्हें अब वहां भी रास नहीं आया। करीब 15 दिन पहले ही दीपक राम रोजी-रोटी की तलाश में हजारों किलोमीटर दूर गुजरात के सूरत चले गए।
अब परिवार के सात सदस्यों की पूरी जिम्मेदारी विभा देवी के कंधों पर आ गई है। वह खेतों में मजदूरी करके बच्चों के लिए दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करती हैं।
महीने के आखिर में पति की पहली मजदूरी आने का इंतजार है, ताकि शायद कुछ राहत मिल सके, कुछ उम्मीद बंध सके।
आप कल्पना कीजिए, दो छोटे-छोटे मिट्टी के कमरे, जिनकी छत वर्षों पहले ढह चुकी है। अब छत के नाम पर सिर्फ एक मोटी पॉलीथीन ही बची है।
बारिश की एक-एक बूंद घर के भीतर टपकती है, फर्श पर कीचड़ भर जाता है। बिजली जब कड़कती है और तेज बारिश होती है, तो बच्चों की जान बचाने की फिक्र में विभा देवी की नींद उड़ जाती है।
वह अपने छह मासूम बच्चों को उठाकर चारपाई के नीचे बिठा देती हैं, ताकि वे किसी तरह सुरक्षित रहें। और खुद? खुद पूरी रात चारपाई पर बैठकर जागती रहती हैं, बस इस उम्मीद में कि कोई अनहोनी न हो जाए।
विभा देवी का दर्द शब्दों में नहीं, उनकी आंखों में साफ झलकता है। उन्होंने भरी आंखों से बताया, "हम छह बच्चों को लेकर कहां जाएं? रहने के लिए बस यही एक जगह है।
ढाई साल से ऐसे ही पॉलीथीन डालकर रह रहे हैं। बरसात में सबसे ज्यादा चिंता बच्चों की जान की रहती है।
रातभर नींद नहीं आती।" यह सिर्फ एक मां का दर्द नहीं, बल्कि उस सिस्टम की लाचारी भी दिखाता है, जहां गरीबों को बुनियादी सुविधाओं के लिए भी इतना इंतजार करना पड़ता है।
सरकारी दफ्तरों के चक्कर और अधूरी योजनाएं
विभा देवी ने बताया कि उन्होंने प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ पाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी। कई बार वार्ड सदस्य, मुखिया और बरहट प्रखंड कार्यालय के चक्कर लगाए।
लेकिन हर बार उन्हें यही जवाब मिला कि जब लाभुकों की सूची में उनका नाम आएगा, तभी आवास मिल पाएगा। आज ढाई साल बीत चुके हैं, लेकिन उनका नाम इस सूची में शामिल नहीं हो सका है।
सरकारी योजनाओं के नाम पर इस परिवार को क्या मिला? सिर्फ दो यूनिट का राशन कार्ड, जबकि खाने वाले सात सदस्य हैं। उज्ज्वला योजना के तहत गैस कनेक्शन और सिलेंडर तो मिला था, लेकिन जब घर गिरने के बाद परिवार कुछ समय के लिए दूसरी जगह रहने को मजबूर हुआ, उसी दौरान सिलेंडर चोरी हो गया।
आर्थिक तंगी ऐसी कि नया सिलेंडर खरीदना संभव नहीं था। बाद में बड़ी मुश्किल से एक छोटा सिलेंडर खरीदा, जिससे किसी तरह बच्चों के लिए खाना बनता है।
यह कहानी बताती है कि कैसे एक के बाद एक मुश्किलें इस परिवार का पीछा नहीं छोड़तीं।
अधिकारियों का क्या कहना है?
जब इस मामले में आवास सहायक मोहम्मद इमरान आलम से बात की गई, तो उन्होंने वही सरकारी बात दोहराई। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ तभी दिया जा सकता है, जब लाभार्थी का नाम अधिकृत सूची में शामिल हो।
उनका कहना था कि सूची में नाम आने के बाद नियमानुसार आवास उपलब्ध कराया जाएगा।
वहीं, बरहट प्रखंड विकास पदाधिकारी एस.के.
पाण्डेय ने आश्वासन दिया कि प्रधानमंत्री आवास योजना का नया आवंटन मिलते ही, प्राथमिकता के आधार पर विभा देवी को योजना का लाभ सबसे पहले दिलाया जाएगा।
एक तरफ हमारी सरकार हर गरीब परिवार को पक्का मकान उपलब्ध कराने के बड़े-बड़े दावे करती है, 'सबका साथ, सबका विकास' की बात करती है। वहीं, दूसरी तरफ लकरा गांव की विभा देवी और उनके छह मासूम बच्चे पॉलीथीन की छत के नीचे हर रात मौत के डर से जागते हुए बिताने को मजबूर हैं।
यह कहानी सिर्फ जमुई की नहीं, बल्कि देश के उन अनगिनत गरीब परिवारों की है, जो आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए सिस्टम के भरोसे बैठे हैं। उनके लिए आवास योजना सिर्फ एक कागज का टुकड़ा नहीं, बल्कि सम्मान और सुरक्षा के साथ जीने का आधार है।

