नई दिल्ली: दुनिया की दो बड़ी आर्थिक ताकतें, भारत और जापान, अब कुछ ऐसा करने जा रही हैं जिससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अमेरिकी डॉलर का दबदबा थोड़ा कम हो सकता है। जी हाँ, आपने ठीक सुना। खबर आ रही है कि दोनों देश ऐसी व्यवस्था बनाने की तैयारी में हैं, जहाँ व्यापार का भुगतान सीधे भारतीय रुपए और जापानी येन में हो सके, बिना डॉलर का झंझट पाले। ये कोई छोटा-मोटा बदलाव नहीं है, बल्कि एक बड़ा कदम है जो वैश्विक वित्तीय सिस्टम पर अपनी छाप छोड़ सकता है।
इस बड़े प्रस्ताव पर आधिकारिक मुहर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जापान की प्रधानमंत्री साने ताकाइची की नई दिल्ली में होने वाली मुलाकात के बाद लग सकती है। साने ताकाइची आज यानी मंगलवार को तीन दिन के भारत दौरे पर आ रही हैं और प्रधानमंत्री बनने के बाद यह उनका पहला भारत दौरा होगा।
इस दौरे पर दोनों नेताओं के बीच कई अहम मुद्दों पर बात होगी, जिनमें व्यापार, निवेश, रक्षा, सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ऑटोमोबाइल, सप्लाई चेन और हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा शामिल हैं। लेकिन इन सब के बीच जिस बात पर दुनिया की नजर है, वह है रुपए और येन में सीधे व्यापार का ऐलान।
इससे पहले नवंबर 2025 में दक्षिण अफ्रीका में हुए G20 समिट के दौरान भी मोदी और ताकाइची की मुलाकात हुई थी, जहाँ शायद इस बड़े प्लान की नींव रखी गई थी।
डॉलर को बाय-बाय कहने की तैयारी
अगर ये प्रस्ताव सच में लागू हो जाता है, तो भारत और जापान के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को लेकर पहली बार एक औपचारिक व्यवस्था बनेगी। आसान भाषा में कहें तो, अब तक हमें कोई भी अंतरराष्ट्रीय व्यापार करने के लिए अक्सर डॉलर की जरूरत पड़ती थी।
जैसे, अगर कोई भारतीय कंपनी जापान से कुछ खरीदती थी, तो उसे पहले रुपए को डॉलर में बदलना पड़ता था, फिर जापान को डॉलर में पेमेंट होती थी। जापान की कंपनी को भी फिर डॉलर को येन में बदलना पड़ता था।
इस पूरे खेल में डॉलर एक बिचौलिए की तरह काम करता था।
लेकिन नई व्यवस्था में ये सब बदल जाएगा। इस योजना के तहत जापानी कंपनियाँ भारत के बैंकों में स्पेशल खाते खोलेंगी।
इन खातों के जरिए वो सीधे रुपए में पेमेंट ले सकेंगी और कर सकेंगी। ठीक ऐसे ही, भारतीय कंपनियाँ जापान के बैंकों में खाते खोलकर सीधे येन में लेनदेन कर पाएंगी।
इससे अमेरिकी डॉलर या किसी तीसरे देश के बैंक की जरूरत खत्म हो जाएगी। सोचिए, इससे क्या-क्या फायदे होंगे? सबसे पहले तो विदेशी मुद्रा बदलने का जो मोटा-मोटा खर्च लगता है, वो बच जाएगा।
दूसरा, पैसे भेजने की लागत कम होगी। और तीसरा, भुगतान पहले के मुकाबले तेजी से हो पाएगा।
दोनों देशों को उम्मीद है कि इससे व्यापार करना सिर्फ आसान ही नहीं होगा, बल्कि कंपनियों का समय और पैसा दोनों बचेगा, जिससे व्यापार में और उछाल आएगा।
पुराना प्लान, अब अमल की बारी
ये सुनने में जितना नया लग रहा है, उतना है नहीं। इस प्लान की नींव बहुत पहले पड़ चुकी थी।
दरअसल, अगस्त 2025 में प्रधानमंत्री मोदी जब जापान गए थे, तब दोनों देशों ने अगले दस सालों के लिए एक साझा विजन डॉक्यूमेंट जारी किया था। उस डॉक्यूमेंट में पेमेंट सिस्टम और स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने की बात साफ-साफ लिखी थी।
अब उसी पुरानी योजना को आगे बढ़ाने और उसे जमीन पर उतारने का काम हो रहा है। जापान का वित्त मंत्रालय अब वित्त वर्ष 2026 के दौरान भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के साथ एक सहयोग समझौता (MoC) करने की तैयारी में है, ताकि स्थानीय मुद्राओं के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया जा सके।
भारत पहले से ही बढ़ा रहा है देसी करेंसी का दबदबा
भारत तो पिछले कुछ सालों से अंतरराष्ट्रीय व्यापार में रुपए के दबदबे को बढ़ाने के लिए लगातार काम कर रहा है। जुलाई 2022 में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने 'स्पेशल रुपी वोस्ट्रो अकाउंट' (Special Rupee Vostro Account) की शुरुआत की थी।
इसका सीधा मकसद ये था कि दूसरे देशों के साथ रुपए में व्यापार को बढ़ावा मिले। ये वोस्ट्रो खाते एक तरह के विशेष बैंक खाते होते हैं जो एक विदेशी बैंक द्वारा घरेलू बैंक में खोले जाते हैं ताकि उस विदेशी बैंक की घरेलू मुद्रा में लेनदेन किया जा सके।
बाद में RBI ने इस व्यवस्था का दायरा और बढ़ा दिया। विदेशी बैंकों को इन खातों में जमा अतिरिक्त रकम को भारतीय सरकारी बॉन्ड में निवेश करने की भी छूट दे दी गई।
सरकार ने संसद में बताया था कि अब तक 30 देशों के 123 विदेशी बैंकों के लिए भारत के 26 बैंकों में कुल 156 स्पेशल रुपया वोस्ट्रो खाते खोले जा चुके हैं। RBI का मानना है कि इस पहल से अंतरराष्ट्रीय व्यापार में मजबूत विदेशी मुद्राओं पर हमारी निर्भरता कम होगी और रुपए का वैश्विक इस्तेमाल बढ़ेगा।
सिर्फ भारत ही नहीं, जापान भी एशिया के दूसरे देशों के साथ स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा देने में लगा हुआ है। दिसंबर 2025 में उसने इंडोनेशिया के साथ भी ऐसी ही व्यवस्था पर काम करना शुरू किया था।
यानी, ये दोनों देश मिलकर ग्लोबल इकोनॉमी में एक नए अध्याय की शुरुआत कर रहे हैं, जहाँ डॉलर ही सब कुछ नहीं होगा।

