मनोरंजन डेस्क: बॉलीवुड की दुनिया में कई फिल्में आती हैं और चली जाती हैं, लेकिन कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जो वक्त के साथ और भी ज़्यादा निखरती जाती हैं। संजय लीला भंसाली की ‘देवदास’ भी कुछ ऐसी ही फिल्मों में से एक है। 12 जुलाई 2002 को रिलीज हुई ये फिल्म अब अपने 24 साल पूरे कर चुकी है। सोचिए, दो दशक से भी ज़्यादा का वक्त बीत गया, लेकिन इसका जादू आज भी वैसा ही बरकरार है। जब भी भव्यता, मोहब्बत में टूटन और क्लासिक सिनेमा की बात होती है, तो ‘देवदास’ का नाम सबसे पहले आता है। शाहरुख खान, ऐश्वर्या राय बच्चन और माधुरी दीक्षित जैसे दिग्गजों ने इसमें ऐसी परफॉर्मेंस दी थीं कि वो आज भी लोगों के जेहन में ताज़ा हैं।
शरत चंद्र चट्टोपाध्याय के मशहूर उपन्यास पर बनी ये फिल्म सिर्फ एक कहानी नहीं थी, बल्कि एक पूरा अनुभव थी। जिसने बड़े पर्दे पर भव्यता और सिनेमाई जादू का एक नया पैमाना तय कर दिया था।
इसके प्रोडक्शन डिज़ाइन से लेकर संगीत, कॉस्ट्यूम और कहानी कहने का अंदाज़, सब कुछ लाजवाब था। चलिए, आज हम इसी फिल्म से जुड़े कुछ ऐसे ही पहलुओं पर नज़र डालेंगे, जो इसे आज भी एक बेजोड़ क्लासिक बनाते हैं।
आखिर संजय लीला भंसाली ने क्या जादू कर दिया था?
सबसे पहले बात आती है फिल्म के निर्देशन की। संजय लीला भंसाली, जिन्हें भव्य फिल्मों का बादशाह कहा जाता है, उन्होंने 'देवदास' के हर सीन को किसी पेंटिंग की तरह सजाया था।
फिल्म का हर एक फ्रेम उनकी दूरदर्शिता और कलात्मकता का सबूत है। उन्होंने न केवल कहानी को बताया, बल्कि उसे महसूस कराया।
उनके निर्देशन में फिल्म का हर किरदार अपनी भावनाओं के साथ जीवंत हो उठा। क्या ऐसी भव्यता आज भी सिनेमा में देखने को मिलती है?
कैसे एक उपन्यास बड़े पर्दे पर उतर आया?
‘देवदास’ सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि शरत चंद्र चट्टोपाध्याय के मशहूर उपन्यास का एक बेहद शानदार और संवेदनशील रूपांतरण था। भंसाली ने उपन्यास की आत्मा को बड़े पर्दे पर बखूबी उतारा।
प्रेम, त्याग और टूटन की उस दर्दभरी कहानी को उन्होंने पूरी ईमानदारी और गहराई के साथ दिखाया, जिससे दर्शक कहानी के साथ पूरी तरह से जुड़ पाए। उपन्यास को इस तरह से पर्दे पर लाना कोई आसान काम नहीं था, लेकिन भंसाली ने इसे कमाल कर दिखाया।
शाहरुख खान की देवदास ने क्या कमाल किया?
देवदास के किरदार में शाहरुख खान ने जो परफॉर्मेंस दी, वो उनके करियर की सबसे यादगार परफॉर्मेंस में से एक मानी जाती है। देवदास का दर्द, उसकी तड़प, शराब में डूबा उसका बिखराव और पारो के लिए उसका अथाह प्रेम, शाहरुख ने इन सभी भावनाओं को इतनी गहराई से दिखाया कि दर्शकों की आंखें नम हो गईं।
उनकी एक्टिंग में वो सच्चापन था जो एक शराबी प्रेमी के किरदार के लिए जरूरी था। क्या कोई और एक्टर इस किरदार को ऐसे जी पाता?
ऐश्वर्या राय की पारो ने दिल कैसे जीता?
पारो के किरदार में ऐश्वर्या राय बच्चन ने अपनी सादगी, मजबूती और अंदर की भावनाओं को बेहद खूबसूरती से जाहिर किया। पारो का त्याग, उसका प्रेम और उसकी गरिमा, ऐश्वर्या ने इसे हर बारीकी के साथ निभाया।
वे हिंदी सिनेमा की सबसे यादगार नायिकाओं में से एक बन गईं। उनकी आंखें ही सब कुछ कह देती थीं, जिससे दर्शकों को उनका दर्द और उनकी हिम्मत साफ नज़र आती थी।
माधुरी दीक्षित की चंद्रमुखी क्यों इतनी खास है?
माधुरी दीक्षित ने चंद्रमुखी के किरदार में सम्मान, दया और गरिमा को इतने खूबसूरत तरीके से दिखाया कि ये उनके करियर की बेहतरीन परफॉर्मेंस में गिनी जाती है। एक तवायफ के किरदार में भी उन्होंने ऐसी गरिमा और समझदारी लाईं कि चंद्रमुखी को देखकर किसी को भी उनसे हमदर्दी हो जाए।
उनकी अदाकारी ने इस किरदार को एक नया आयाम दिया, जिससे वो सिर्फ एक तवायफ नहीं, बल्कि एक प्यार करने वाली, त्याग करने वाली महिला के रूप में सामने आईं।
देव और पारो की केमिस्ट्री का राज क्या है?
देव और पारो की प्रेम कहानी बॉलीवुड की सबसे पसंदीदा और दर्दभरी लव स्टोरीज में से एक है। उनकी केमिस्ट्री इतनी कमाल की थी कि पर्दे पर उनका हर पल दर्शकों को अपनी ओर खींच लेता था।
उनके प्यार का जुनून, उनके बिछड़ने का दर्द और एक-दूसरे के लिए उनकी तड़प, ये सब कुछ आज भी लोगों को रुला देता है। क्या आप भी उनकी केमिस्ट्री को आज भी मिस करते हैं?
पारो और चंद्रमुखी के रिश्ते ने क्या नई बात कही?
फिल्म में पारो और चंद्रमुखी के बीच का रिश्ता भी अपने आप में बेहद खास था। अमूमन ऐसी फिल्मों में दो नायिकाओं को एक-दूसरे की दुश्मन के तौर पर दिखाया जाता है, लेकिन 'देवदास' में उनके बीच सम्मान और समझ का रिश्ता था।
उन्होंने एक-दूसरे के दर्द को समझा और एक-दूसरे के प्रति संवेदनशीलता दिखाई, जो उस समय की फिल्मों में कम देखने को मिलता था। यह एक नया कॉन्सेप्ट था जो दर्शकों को खूब पसंद आया।
फिल्म के भव्य सेट्स ने कैसे समां बांध दिया?
'देवदास' की भव्यता उसके सेट्स में भी झलकती थी। फिल्म के शानदार और विशालकाय सेट्स ने हर सीन को एक अलग ही लेवल पर पहुंचा दिया।
चाहे वह पारो का हवेली हो, देवदास का टूटता घर हो या चंद्रमुखी का कोठा, हर जगह की बनावट और सजावट ऐसी थी कि दर्शक बस देखते रह जाएं। इन सेट्स ने कहानी को और भी ज़्यादा जीवंत बना दिया था।
क्या आपने कभी किसी फिल्म में इतने आलीशान सेट्स देखे हैं?
सिनेमैटोग्राफी ने कैसे हर फ्रेम को पेंटिंग बना दिया?
फिल्म की सिनेमैटोग्राफी इतनी शानदार थी कि इसका हर फ्रेम किसी पेंटिंग की तरह नजर आता है। छायाकार (cinematographer) बिनोद प्रधान ने प्रकाश और रंगों का ऐसा कमाल का इस्तेमाल किया कि फिल्म का हर दृश्य एक कलाकृति बन गया।
ये 'देवदास' को भारतीय सिनेमा की सबसे खूबसूरत फिल्मों में से एक बनाता है। हर सीन में इतनी बारीकी से काम किया गया था कि आप उसे बार-बार देखना चाहेंगे।
'देवदास' के कॉस्ट्यूम्स क्यों आज भी यादगार हैं?
फिल्म के कॉस्ट्यूम्स की बात करें तो वो आज भी फैशन डिजाइनर्स और दर्शकों को इंस्पायर करते हैं। ऐश्वर्या राय की खूबसूरत साड़ियां हों या माधुरी दीक्षित के लहंगे, हर पोशाक में इतनी डिटेलिंग थी कि वो किरदार की पहचान बन गई।
इन कॉस्ट्यूम्स ने फिल्म की भव्यता और उस दौर के कल्चर को बखूबी दर्शाया। आज भी जब पारंपरिक परिधानों की बात होती है, तो 'देवदास' के कॉस्ट्यूम्स का जिक्र जरूर होता है।
कुल मिलाकर, 'देवदास' सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा का एक गौरवशाली अध्याय है। 24 साल बाद भी इसकी चमक फीकी नहीं पड़ी है और शायद कभी पड़ेगी भी नहीं।
यह आज भी हमें सिखाती है कि प्यार कितना गहरा हो सकता है और खो देने का दर्द कैसा होता है। यह सिर्फ एक कहानी नहीं, बल्कि एक विरासत है जिसे हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को भी दिखाना चाहेंगे।






































