नई दिल्ली: कल्पना कीजिए कि देश का प्रधानमंत्री या किसी राज्य का मुख्यमंत्री किसी गंभीर मामले में फंस जाए और उन्हें जेल जाना पड़े। अब तक का सिस्टम ऐसा था कि अगर कोई बड़ा नेता हिरासत में जाता है, तो उसकी कुर्सी पर खतरा मंडराने लगता है। लेकिन अब संसद की एक संयुक्त समिति ने एक ऐसा सुझाव दिया है जो पूरी गेम बदल सकता है। समिति का कहना है कि ऐसे बड़े पदों पर बैठे लोगों को सीधे पद से हटाने के बजाय उन्हें 'सस्पेंड' किया जाना चाहिए।
मामला दरअसल 130वें संविधान संशोधन विधेयक से जुड़ा है। पिछले साल अगस्त में जब यह बिल पेश हुआ था, तो इसमें एक सख्त नियम था।
नियम यह था कि अगर प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्री या मुख्यमंत्री हिरासत में रहने के 31वें दिन तक इस्तीफा नहीं देते, तो उन्हें अपने आप पद से हटा दिया जाएगा। यानी सीधा 'आउट'।
लेकिन अब संसदीय पैनल ने इस 'हटाने' वाले शब्द को बदलकर 'निलंबन' यानी सस्पेंशन करने की सिफारिश की है।
विपक्ष को क्यों थी इस बिल से टेंशन?
बता दें कि जब यह विधेयक पहली बार सामने आया था, तो विपक्षी दलों ने इसका जमकर विरोध किया था। विपक्ष का सीधा आरोप था कि इस कानून का इस्तेमाल विरोधी दलों की सरकारों को अस्थिर करने के लिए किया जा सकता है।
डर यह था कि किसी भी मुख्यमंत्री को किसी गंभीर आरोप में फंसाकर 30 दिन जेल भेज दिया जाएगा और उनकी कुर्सी चली जाएगी। इसी वजह से कई विपक्षी दलों ने इस बिल की समीक्षा करने वाली संयुक्त समिति से दूरी बना ली थी।
अब समिति ने बीच का रास्ता निकालते हुए सस्पेंशन का सुझाव दिया है। इसका मतलब यह है कि जब तक कानूनी कार्यवाही चल रही है और कोर्ट का फैसला नहीं आता, तब तक नेता सस्पेंड रहेगा, लेकिन उसे स्थायी रूप से हटाया नहीं जाएगा।
क्या है यह 'ऑटोमैटिक रिवर्सल क्लॉज'?
पैनल ने एक और दिलचस्प सुझाव दिया है जिसे 'ऑटोमैटिक रिवर्सल क्लॉज' कहा जा रहा है। अब आप सोच रहे होंगे कि यह क्या बला है? आसान भाषा में कहें तो यह एक ऐसा नियम है जिससे सस्पेंशन अपने आप खत्म हो जाएगा।
अगर हिरासत में लिया गया मंत्री बरी हो जाता है या फिर तय समय के भीतर मुकदमे की कार्यवाही आगे नहीं बढ़ती है, तो वह व्यक्ति बिना किसी लंबी प्रक्रिया के वापस अपने पद पर लौट आएगा।
समिति का तर्क है कि यह सुरक्षा उपाय इसलिए जरूरी है ताकि जिन लोगों को अदालतें दोषी नहीं पातीं, उनका करियर और पद स्थायी रूप से खत्म न हो जाए। यह एक तरह का सेफ्टी नेट है जो दोबारा नियुक्ति को सुनिश्चित करता है।
कौन से अपराधों पर होगी यह कार्रवाई?
अब सवाल यह उठता है कि क्या किसी भी छोटे-मोटे केस में पीएम या सीएम सस्पेंड हो जाएंगे? जवाब है- नहीं। समिति ने 'गंभीर अपराधों' की एक परिभाषा भी तय की है।
उनके मुताबिक, केवल उन्हीं अपराधों को गंभीर माना जाएगा जिनमें सजा 5 साल या उससे अधिक के कारावास की हो सकती है। यानी छोटे-मोटे मामलों में यह नियम लागू नहीं होगा।
सुनवाई के लिए क्या है नया प्लान?
इतना ही नहीं, संयुक्त समिति ने सुनवाई की रफ्तार बढ़ाने पर भी जोर दिया है। समिति ने सुझाव दिया है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन करते हुए उच्च संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों से जुड़े मामलों की सुनवाई 'त्वरित' या 'विशेष अदालतों' (Special Courts) में होनी चाहिए।
ताकि मामला सालों-साल न खिंचे और जल्द से जल्द फैसला हो सके।
कुल मिलाकर, इस रिपोर्ट की स्वीकृति इस हफ्ते होने की संभावना है। अगर यह सिफारिशें मान ली जाती हैं, तो देश के राजनीतिक सिस्टम में एक बड़ा बदलाव आएगा, जहाँ जेल जाने का मतलब सीधे तौर पर कुर्सी खोना नहीं होगा, बल्कि कानूनी फैसले तक का इंतजार होगा।









































