अंतर्राष्ट्रीय डेस्क: वियतनाम का फू क्वोक द्वीप, अपने सफेद रेत वाले किनारों और नीले समंदर के लिए जाना जाता है। दुनिया भर के सैलानी यहां छुट्टियां मनाने आते हैं, सुकून के पल बिताने आते हैं। लेकिन पिछले शनिवार को इसी खूबसूरत द्वीप पर कुछ ऐसा हुआ जिसने कई परिवारों की खुशियों को हमेशा के लिए छीन लिया। एक पल में सब कुछ बदल गया। जिन भारतीय पर्यटकों ने अपनी छुट्टियों के लिए इस जन्नत को चुना था, उन्हें क्या पता था कि उनका यह शानदार सफर एक खौफनाक अंत की तरफ बढ़ रहा है। समंदर की लहरों पर एक स्पीडबोट सवार होकर वे एक द्वीप से दूसरे द्वीप जा रहे थे, जब अचानक सब कुछ बिखर गया।
जिस पल का कोई अंदाज़ा भी नहीं लगा सकता था, वही पल मौत बनकर सामने आया। आंखों के सामने तूफान आया और नाव पलट गई। 15 भारतीय पर्यटकों की ज़िंदगी वहीं खत्म हो गई। सोचिए, एक शख्स जो खुद इस भयानक हादसे में बच निकला, निर्मल कुमार, उन्होंने अपनी आपबीती सुनाते हुए जो कहा, वो रोंगटे खड़े कर देने वाला है। उन्होंने बताया, "तूफान आते ही समंदर में कूदा और सब खत्म..." ये बस कुछ शब्द नहीं, उस मंजर की पूरी कहानी बयान करते हैं।
आखिर उस दिन हुआ क्या था, कैसे पलटा मौत का यह बेड़ा?
यह दर्दनाक हादसा फू क्वोक द्वीप के तट के बिल्कुल करीब हुआ। शनिवार का दिन था, भारतीय पर्यटकों का एक दल स्पीडबोट में सवार होकर एक द्वीप से दूसरे द्वीप की ओर जा रहा था।
निर्मल कुमार भी इसी दल का हिस्सा थे। सब कुछ सामान्य चल रहा था।
शायद लोग समंदर की ठंडी हवा का आनंद ले रहे होंगे, तस्वीरें खींच रहे होंगे, हंसी-मजाक कर रहे होंगे। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।
निर्मल कुमार ने एएनआई (ANI) से बात करते हुए बताया कि अचानक बिना किसी चेतावनी के मौसम का मिजाज बिगड़ गया।
समंदर जो कुछ पल पहले शांत और लुभावना लग रहा था, देखते ही देखते रौद्र रूप ले लिया। पलक झपकते ही वहां तेज तूफान आ गया।
उनकी स्पीडबोट में कुल 36 लोग सवार थे, जिनमें से 32 भारतीय पर्यटक थे। सोचिए, 32 भारतीय चेहरे, जो अपने देश से दूर एक खूबसूरत जगह पर छुट्टियां मनाने आए थे, उनके लिए ये पल कितने भयानक रहे होंगे।
तूफान इतना अचानक और इतना तेज था कि कुछ ही सेकंड में उनकी नाव पलट गई। किसी को संभलने या समझने का मौका भी नहीं मिला कि आखिर ये क्या हो गया।
यह बिल्कुल किसी बुरे सपने जैसा था, जिससे कोई जागना चाहता हो, लेकिन जागना मुमकिन नहीं था।
निर्मल कुमार खुशकिस्मत थे कि वे नाव के आगे वाले हिस्से में बैठे थे। उन्होंने उस खौफनाक पल को याद करते हुए बताया, "हम नाव के आगे वाले हिस्से में थे, इसलिए समुद्र में कूदकर अपनी जान बचा ली। लेकिन जो लोग नाव के अंदर थे, वे उसमें फंस गए। नाव पलटने के कारण वे बाहर नहीं निकल सके।" यह सुनकर दिल दहल जाता है कि कैसे चंद सेकंड में ज़िंदगी और मौत के बीच की पतली सी लकीर खिंच गई। जो लोग नाव के अंदर फंसे थे, उन्होंने अपनी जान बचाने की कितनी जद्दोजहद की होगी, लेकिन पानी की तेज़ धार और नाव का वजन उन्हें बाहर निकलने का कोई मौका नहीं दिया होगा।
निर्मल कुमार ने यह भी बताया कि उस यात्रा में सिर्फ उनकी ही नाव नहीं थी, बल्कि आसपास और भी नावें थीं, जिनमें दूसरे सैलानी भी सफर कर रहे थे। कुल मिलाकर करीब 105 लोग उस समुद्री यात्रा का हिस्सा थे।
कल्पना कीजिए, इतने सारे लोग एक साथ समंदर में फंसे हुए, चीख-पुकार मची होगी, जान बचाने की आखिरी कोशिशें चल रही होंगी। वह मंजर कितना भयावह रहा होगा, यह सोचकर भी कंपकंपी छूट जाती है।
बचाव दल ने निभाई अहम भूमिका, पर मेडिकल सुविधाएं नदारद क्यों थीं?
हादसे के तुरंत बाद अफरा-तफरी का माहौल था। हर तरफ मदद की गुहार लग रही थी। आसपास मौजूद अन्य नावों से भी शायद कुछ मदद मिली होगी, लेकिन असली और संगठित चुनौती बचाव दल के लिए थी। निर्मल कुमार ने बचाव दल की जमकर तारीफ की। उनका कहना था कि अगर राहत और बचाव टीम समय पर नहीं पहुंचती, तो मरने वालों की संख्या और भी ज्यादा हो सकती थी। उन्होंने कहा, "बचाव टीम ने हमें सुरक्षित बाहर निकाल लिया..." यह वाकई राहत की बात थी कि ऐसे मुश्किल हालात में भी बचाव दल ने तेजी से काम किया और कई जिंदगियां बचाईं, जो वाकई एक बड़ा चैलेंज था।
लेकिन एक पहलू ऐसा भी था जिसने बचे हुए लोगों की परेशानी को और बढ़ा दिया। निर्मल कुमार ने बताया कि जिस द्वीप पर उन्हें ले जाया गया, वहां इलाज के लिए जरूरी मेडिकल सुविधाओं की भारी कमी थी।
सोचिए, इतने बड़े हादसे के बाद, जब लोगों को तुरंत इलाज, फर्स्ट-एड और डॉक्टर्स की जरूरत हो, तब उन्हें पर्याप्त सुविधाएँ न मिलें तो उनकी हालत कितनी बिगड़ सकती है। घायलों का ठीक से इलाज करना मुश्किल हो गया था।
यह एक गंभीर सवाल खड़ा करता है कि फू क्वोक जैसे एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल के पास ऐसी इमरजेंसी मेडिकल सुविधाएं क्यों नहीं थीं, खासकर तब जब समंदर से जुड़े खतरे हमेशा बने रहते हैं?
वियतनाम सरकार की जांच और भारतीय दूतावास की मदद का हाथ
इस दर्दनाक हादसे के बाद वियतनाम सरकार ने तुरंत एक्शन लिया। उन्होंने इस पूरे मामले की जांच के आदेश दिए हैं, ताकि पता चल सके कि आखिर ऐसी लापरवाही कहां हुई और भविष्य में ऐसे हादसों को कैसे रोका जा सकता है।
यह कदम बहुत जरूरी था ताकि इस तरह के इंसिडेंट फिर न हों। वियतनाम में भारतीय दूतावास ने भी अपनी तरफ से पूरी मदद की पुष्टि की है।
उन्होंने बताया कि हादसे में जान गंवाने वाले सभी 15 लोग भारतीय नागरिक ही थे, जो भारत के लिए एक और दुखद खबर थी। दूतावास ने पीड़ित परिवारों को हर संभव सहायता का आश्वासन दिया है।
निर्मल कुमार ने बताया कि हादसे के बाद भारतीय अधिकारियों ने उनकी पूरी मदद की। उन्होंने कहा, "कल भारतीय अधिकारी यहां आए थे और जरूरी औपचारिकताएं पूरी कर रहे हैं। बाकी सभी लोग वापस लौट चुके हैं। हमारी कंपनी के चार लोग थे, जिनमें से मैं अभी भी यहीं रुका हुआ हूं।" उनका वहां रुकना शायद कुछ कानूनी या प्रशासनिक औपचारिकताओं को पूरा करने के लिए था, जो ऐसे बड़े हादसों के बाद जरूरी होता है। कुल मिलाकर, यह एक दर्दनाक सबक है कि कैसे प्रकृति का मिजाज और सुरक्षा इंतजामों की कमी मिलकर एक खूबसूरत सफर को मातम में बदल सकते हैं। उम्मीद है कि इस जांच से कुछ ठोस निकलकर आएगा ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं को टाला जा सके।






































