टाटा की TCS 8900 खास इंजीनियरों की टीम बनाएगी, OpenAI और माइक्रोसॉफ्ट को टक्कर देने की तैयारी
सारांश


दिल्ली: दुनिया में आजकल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI की धूम मची हुई है। हर छोटी-बड़ी कंपनी इसी रेस में दौड़ना चाहती है, ताकि पीछे न रह जाए। गूगल से लेकर माइक्रोसॉफ्ट और OpenAI जैसे दिग्गज इस दौड़ में सबसे आगे चल रहे हैं। लेकिन, अब इस खेल में भारत की सबसे सबसे बड़ी आईटी कंपनी टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) ने भी एक बड़ा दांव खेल दिया है। ये कोई छोटा-मोटा दांव नहीं है, बल्कि एक पूरी नई फौज तैयार करने जैसा है। TCS ने ऐलान किया है कि वो AI से जुड़ी नई सर्विसेज को आगे बढ़ाने के लिए करीब 5,900 से लेकर 8,900 'फॉरवर्ड-डिप्लॉयड इंजीनियर्स' (FDEs) की एक खास टीम तैयार करने जा रही है। आप सोच रहे होंगे कि ये किस तरह की टीम है, और इसका काम क्या होगा? तो चलिए, आपको बताते हैं पूरी कहानी.
सिर्फ इंजीनियरों की फौज ही नहीं, कंपनी ने साफ कर दिया है कि वो AI सेक्टर में अधिग्रहण (Acquisition) के मौके भी तलाश रही है। यानी, अगर कोई छोटी AI कंपनी बढ़िया काम कर रही है, तो TCS उसे अपने साथ जोड़ सकती है।
कुल मिलाकर, TCS ने बता दिया है कि वो AI के मैदान में अब सिर्फ देखने नहीं, बल्कि खेलने भी आई है।
अब आप कहेंगे, ये FDEs आखिर क्या बला है? नाम तो थोड़ा टेक्निकल लग रहा है। दरअसल, ये कोई आम सॉफ्टवेयर इंजीनियर नहीं होते, जो सिर्फ ऑफिस में बैठकर कोड लिखते रहें।
इन 'फॉरवर्ड-डिप्लॉयड इंजीनियर्स' का काम थोड़ा अलग और ज्यादा जिम्मेदारी वाला होता है। ये सीधे ग्राहकों के साथ काम करते हैं।
मतलब, जिस कंपनी को AI की जरूरत है, TCS का ये इंजीनियर सीधा उसी कंपनी के साथ बैठेगा, उनकी समस्या को समझेगा और फिर उसी के हिसाब से AI या टेक्नोलॉजी सॉल्यूशन बनाएगा।
मिसाल के तौर पर, मान लीजिए एक बैंक अपनी कस्टमर सर्विस को AI की मदद से और बेहतर बनाना चाहता है, ताकि ग्राहक की हर दिक्कत फटाफट हल हो जाए। तो ऐसे में TCS का FDE उस बैंक के साथ मिलकर काम करेगा।
वो पहले बैंक के मौजूदा सॉफ्टवेयर, उनके सारे डेटा और बिजनेस प्रोसेस को समझेगा कि अभी काम कैसे हो रहा है। इसके बाद, वो AI मॉडल को उसी सिस्टम के साथ जोड़ेगा और उसे बैंक के लिए पूरी तरह से लागू करेगा।
इनका काम सिर्फ AI मॉडल बनाना नहीं, बल्कि उसे ग्राहक की जरूरत के हिसाब से ढालना और उसे पूरी तरह से लागू करवाना भी होता है। यानी, ये ऐसे इंजीनियर हैं जो फ्रंटलाइन पर जाकर ग्राहक की प्रॉब्लम सॉल्व करते हैं।
TCS के सीईओ के. कृतिवासन ने रॉयटर्स से बात करते हुए बताया है कि कंपनी का लक्ष्य है कि उसके कुल कर्मचारियों में से करीब 1% से 1.5% कर्मचारी 'फॉरवर्ड-डिप्लॉयड इंजीनियर' हों।
ये आंकड़ा छोटा लग सकता है, लेकिन TCS जैसी विशाल कंपनी के लिए ये हजारों में बैठता है, और ये अपने आप में एक बड़ा रणनीतिक कदम है।
इन खास इंजीनियरों का काम साफ है: ये सीधे क्लाइंट्स के साथ काम करेंगे। उनका मुख्य काम होगा कंपनियों में AI टूल्स को सही तरीके से लागू करना, उन्हें ग्राहकों के मौजूदा सिस्टम से जोड़ना और बिजनेस की जरूरत के हिसाब से एकदम फिट AI सॉल्यूशन तैयार करना।
ये ऐसी टीम है जो सिर्फ सलाह नहीं देगी, बल्कि खुद मैदान में उतरकर काम करेगी और AI को ज़मीनी स्तर पर लागू करवाएगी।
TCS की ये पूरी रणनीति ऐसे समय में सामने आई है, जब AI की दुनिया के बड़े खिलाड़ी जैसे OpenAI, Anthropic और खुद माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनियां भी इसी तरह के 'फॉरवर्ड-डिप्लॉयड इंजीनियर्स' की भर्ती में तेजी दिखा रही हैं। इन दिग्गज कंपनियों ने भी समझ लिया है कि सिर्फ AI मॉडल बनाने से काम नहीं चलेगा, उन्हें ग्राहकों तक पहुंचाने और उनकी जरूरतों के हिसाब से ढालने के लिए एक्सपर्ट्स की जरूरत है।
इन इंजीनियरों की मदद से बड़ी कंपनियां अपने ग्राहकों के यहां AI को और भी तेजी से लागू कर पा रही हैं। अब TCS भी उसी रास्ते पर चल पड़ी है, जिसका सीधा मतलब है कि भारतीय आईटी दिग्गज अब AI की रेस में किसी से पीछे नहीं रहना चाहती और सीधे दुनिया के सबसे बड़े AI प्लेयर्स को टक्कर देने की तैयारी में है।
ये देखना दिलचस्प होगा कि ये मुकाबला कितना जोरदार होता है।
सिर्फ नई टीम तैयार करना ही नहीं, TCS की नजर AI, डेटा सिक्योरिटी और साइबर सिक्योरिटी से जुड़े अधिग्रहणों पर भी है। यानी, कंपनी ऐसी छोटी-बड़ी फर्म्स को खरीदने पर विचार कर रही है जो इन सेक्टर्स में अच्छा काम कर रही हैं।
TCS के सीएफओ समीर सेक्सरिया ने इस बारे में बताया कि कंपनी ऐसे कारोबार तलाश रही है जो उसकी रणनीतिक स्थिति को और मजबूत बना सकें। इसका मतलब साफ है कि TCS सिर्फ ऑर्गेनिक तरीके से (यानी खुद से टीम बनाकर) ही नहीं, बल्कि इनऑर्गेनिक तरीके (यानी कंपनियों को खरीदकर) भी AI और सिक्योरिटी सेक्टर में अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती है।
ये एक 360-डिग्री अप्रोच है, ताकि हर तरफ से AI मार्केट में मजबूत हो सके।
कई निवेशकों के मन में एक बड़ी चिंता है: क्या AI की वजह से आईटी कंपनियों को मिलने वाले आउटसोर्सिंग प्रोजेक्ट कम हो जाएंगे? क्या AI इंसानों की जगह ले लेगा और नौकरियां खा जाएगा? ये सवाल आजकल हर जगह पूछे जा रहे हैं। लेकिन TCS के सीईओ के.
कृतिवासन इस पर कुछ और ही राय रखते हैं।
उनका मानना है कि ऐसा बिल्कुल नहीं होगा। उन्होंने साफ कहा कि कंपनियों को AI अपनाने के लिए ऐसे भरोसेमंद पार्टनर की जरूरत पड़ेगी, जो उनके मौजूदा सिस्टम, डेटा और काम करने के तरीकों को बहुत अच्छे से समझते हों।
और यही तो TCS की सबसे बड़ी ताकत है! TCS के पास दशकों का अनुभव है, उसने दुनियाभर की हजारों कंपनियों के साथ काम किया है और उनके सिस्टम को समझा है। कृतिवासन के मुताबिक, AI के इस दौर में सिर्फ कम लागत का मामला नहीं रहेगा, बल्कि कंपनी के गहरे अनुभव और बेहतरीन प्रतिभा का फायदा मिलेगा।
यानी, TCS जैसी कंपनियां AI को लागू करने में ग्राहकों की मदद करके और भी जरूरी पार्टनर बन जाएंगी।
ये सब तो भविष्य की बात हो गई, लेकिन एक सच ये भी है कि जून तिमाही में TCS के AI कारोबार की रफ्तार में थोड़ी सुस्ती देखने को मिली है। पहली तिमाही में AI से होने वाली सालाना आय की ग्रोथ 13% रही, जबकि पिछली तिमाहियों में ये रफ्तार इससे ज्यादा थी।
हालांकि, ये सिर्फ एक तिमाही का आंकड़ा है और किसी भी नए टेक्नोलॉजी सेक्टर में उतार-चढ़ाव आना आम बात है।
कंपनी के अधिकारी इस बात को लेकर आश्वस्त हैं कि AI का भविष्य उज्ज्वल है और TCS ने जो बड़ा दांव खेला है, वो लॉन्ग टर्म में जरूर रंग लाएगा। कुल मिलाकर, TCS की ये चाल बता रही है कि वो AI के मैदान में अब सिर्फ खिलाड़ी नहीं, बल्कि एक अहम गेम चेंजर बनने की तैयारी में है।
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