अंतर्राष्ट्रीय डेस्क: वियतनाम के समंदर में हुए एक दर्दनाक हादसे ने 15 भारतीय परिवारों को सदमे में डुबो दिया है। फु क्वोक द्वीप के पास एक स्पीडबोट पलट गई, जिसमें कई लोग डूब गए और इनमें से 15 भारतीय पर्यटकों की मौत की खबर ने देश को हिला दिया। अब इन सभी मृतकों के शवों को भारत लाने की जद्दोजहद चल रही है, ताकि उनके परिवारजन आखिरी बार अपनों का चेहरा देख सकें। हनोई स्थित भारतीय दूतावास लगातार वियतनाम के अधिकारियों के संपर्क में है और शवों की वापसी के लिए तेजी से काम कर रहा है।
यह हादसा शनिवार को हुआ था, जिसने छुट्टियों पर निकले इन परिवारों की खुशियों को मातम में बदल दिया। दूतावास ने बताया है कि सभी 15 शवों को फिलहाल फु क्वोक से हो ची मिन्ह सिटी भेजा जा रहा है, ताकि कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रियाएं पूरी की जा सकें।
उम्मीद है कि ये शव जल्द से जल्द भारत पहुंच जाएंगे, जहां उनके परिवार बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं।
बता दें कि इस हादसे में 17 अन्य भारतीय पर्यटक भी थे, जिन्हें बचा लिया गया। इनमें से 16 अपने घर लौट चुके हैं, लेकिन एक भारतीय की हालत अब भी गंभीर बनी हुई है और उसका इलाज फु क्वोक के एक अस्पताल में चल रहा है।
यह पूरी घटना वाकई दिल दहला देने वाली है, जिसने विदेश यात्रा की अपनी ही चुनौतियां सामने ला दी हैं।
आखिर हुआ क्या था और कहां हुआ यह दर्दनाक हादसा?
यह भयावह घटना वियतनाम के फु क्वोक द्वीप के पास 'होन मे रुट न्गोई' इलाके में घटी। बताया जा रहा है कि शनिवार को अचानक एक स्पीडबोट पलट गई, जिसमें कुल 32 भारतीय पर्यटक और चालक दल के 4 स्थानीय सदस्य सवार थे।
समंदर की लहरों के बीच नाव का संतुलन बिगड़ गया और देखते ही देखते यह बड़ा हादसा हो गया। राहत की बात यह रही कि हादसे के बाद तेजी से रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया गया, जिसकी बदौलत 17 भारतीयों और सभी 4 स्थानीय क्रू मेंबर्स को सुरक्षित बचा लिया गया।
हालांकि, 15 भारतीयों को बचाया नहीं जा सका और उन्होंने अपनी जान गंवा दी।
भारतीय दूतावास की टीमें लगातार वियतनाम के प्रशासन के साथ मिलकर काम कर रही हैं। हनोई स्थित भारतीय दूतावास ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पहले ट्विटर) पर इस पूरी जानकारी को साझा किया है।
दूतावास ने बताया है कि वियतनाम प्रशासन ने पूरा भरोसा दिया है कि सभी जरूरी औपचारिकताएं जल्दी पूरी की जाएंगी और शवों को भारत भेजने में पूरा सहयोग किया जाएगा। यह एक संवेदनशील और जटिल प्रक्रिया है, जिसमें दोनों देशों के अधिकारियों के बीच तालमेल बहुत जरूरी होता है।
किन भारतीयों ने इस हादसे में अपनी जान गंवाई?
हादसे में जान गंवाने वाले 15 भारतीयों के नाम और पते भी सामने आ गए हैं। इनमें से सबसे ज्यादा 10 लोग तमिलनाडु के रहने वाले वाले थे, जो एक बड़ी संख्या है।
इसके अलावा तीन लोग आंध्र प्रदेश से और दो लोग केरल के निवासी थे। मृतकों में दो महिलाएं भी शामिल हैं, जिससे इस त्रासदी का दुख और गहरा हो जाता है।
भारतीय दूतावास ने मृतकों की एक सूची भी जारी की है।
- तमिलनाडु से: सेंथिल कुमार जयवेल, मुरुगा प्रभु अरुमुगम, श्रीधर सुंदरराजन, शेख अब्दुल्ला अब्दुल मजीद, बालाजी नटेसन, विनय कुमार चिथिरापुरम भास्कर, रविशंकर सुकुमारन, संतोष कुमार शांतिलाल जैन, बाबू कुप्पुस्वामी और अलगुराजन शिवसामी।
- आंध्र प्रदेश से: नल्लापेटा आदिशेषैया रवितेजा, श्रीधर मुडियम और जया लक्ष्मी गेल्ली।
- केरल से: मैं एविकोट चेरियन थॉमस और लोवेनी थॉमस।
इन सभी परिवारों के लिए यह एक असहनीय घड़ी है। दूतावास ने प्रभावित परिवारों की मदद के लिए हेल्पलाइन नंबर भी जारी किए हैं, ताकि वे किसी भी जानकारी या सहायता के लिए संपर्क कर सकें।
विदेश से शव लाने की प्रक्रिया क्या होती है और इसमें कितना वक्त लगता है?
जब कोई भारतीय नागरिक विदेश में दुखद रूप से अपनी जान गंवा देता है, तो उसके शव को वापस देश लाना एक लंबी और जटिल प्रक्रिया होती है। इसमें कई कानूनी और प्रशासनिक कदम शामिल होते हैं।
सबसे पहले, जिस देश में मौत हुई है, वहां की स्थानीय पुलिस और मेडिकल अथॉरिटीज की तरफ से डेथ सर्टिफिकेट (मृत्यु प्रमाण पत्र) जारी किया जाता है। इसके साथ ही, कई बार शव का पोस्ट-मॉर्टम भी करना पड़ता है, ताकि मौत के कारणों की पुष्टि हो सके।
इसके बाद, शव को भारत भेजने के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया होती है 'एमबालिंग' (Embalming)। एमबालिंग में शव को खास केमिकल्स से ट्रीट किया जाता है, ताकि उसे लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सके और वह खराब न हो।
यह हवाई यात्रा के दौरान शव को संक्रमण से बचाने और उसकी स्थिति बनाए रखने के लिए बेहद जरूरी होता है। एमबालिंग के बाद, शव को एक विशेष ताबूत में रखा जाता है।
आमतौर पर, यह ताबूत लकड़ी का होता है और अंदर से जिंक की परत से कवर होता है, जो एयरटाइट होता है। यह अंतर्राष्ट्रीय कार्गो नियमों का हिस्सा है।
शव को भारत भेजने के लिए भारतीय दूतावास या वाणिज्य दूतावास से 'नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट' (एनओसी) लेना भी अनिवार्य होता है। दूतावास स्थानीय अधिकारियों द्वारा जारी किए गए मृत्यु प्रमाण पत्र, एंबालिंग सर्टिफिकेट और अन्य दस्तावेजों की जांच करता है।
एनओसी मिलने के बाद, शव को हवाई कार्गो के जरिए भारत भेजने की तैयारी की जाती है। एयरलाइंस कंपनियां शवों को कार्गो सेक्शन में भेजने के लिए विशेष इंतजाम करती हैं।
यह सब एक लंबी कागजी कार्रवाई और लॉजिस्टिक्स का काम होता है, जिसमें काफी समय लग सकता है।
भारत पहुंचने पर, एयरपोर्ट पर भारतीय कस्टम्स (सीमा शुल्क) की प्रक्रियाएं पूरी करनी होती हैं। इसके बाद, शव को संबंधित राज्य के अधिकारी या सीधे परिवारजनों को सौंप दिया जाता है।
इस पूरी प्रक्रिया में आमतौर पर कुछ दिन से लेकर एक-दो हफ्ते तक का समय लग सकता है, यह निर्भर करता है कि स्थानीय नियम कितने जटिल हैं, दस्तावेजों को जुटाने में कितना समय लग रहा है और एयर कार्गो की उपलब्धता कैसी है। वियतनाम दूतावास भी इन्हीं प्रक्रियाओं से गुजर रहा है ताकि पीड़ित परिवारों को जल्द से जल्द राहत मिल सके और वे अपने प्रियजनों का अंतिम संस्कार सम्मानपूर्वक कर सकें।






































