लखनऊ: बुधवार की सुबह, राजधानी लखनऊ के हजरतगंज इलाके में एक अलग ही गहमागहमी थी। दारुलशफा के सामने, जहां रोजमर्रा की जिंदगी अपनी रफ्तार पकड़ती है, वहां सैकड़ों की भीड़ इकट्ठा थी। ये कोई आम मजमा नहीं था। ये थे उत्तर प्रदेश के वो ग्राम रोजगार सेवक, जो अपनी मांगों को लेकर आर-पार की लड़ाई लड़ने निकले थे। सुबह के ठीक 9:05 बजे का वक्त था, जब प्रदेशभर से आए इन सेवकों ने 'उत्तर प्रदेश ग्राम रोजगार सेवक संघ' के बैनर तले जोरदार प्रदर्शन शुरू किया। उनके नारों में सिर्फ सरकार के खिलाफ गुस्सा नहीं, बल्कि सालों की अनदेखी और निराशा का दर्द साफ झलक रहा था।
लेकिन ये कहानी सिर्फ नारों तक सीमित नहीं थी। उनका इरादा तो सीधा और स्पष्ट था – विधानसभा का घेराव करना।
अपनी आवाज को सीधे सत्ता के गलियारों तक पहुंचाना। लेकिन प्रशासन भी अपनी जगह मुस्तैद था।
जैसे ही प्रदर्शनकारी विधानसभा की तरफ बढ़े, पुलिस ने बैरिकेडिंग कर उनका रास्ता रोक दिया। आगे बढ़ने की कोशिशें धरी की धरी रह गईं, लेकिन सेवकों का जोश कम नहीं हुआ।
उन्होंने वहीं, बैरिकेडिंग के सामने ही अपने गुस्से का इजहार किया और चेतावनी दे डाली कि अगर उनकी मांगें जल्द नहीं मानी गईं, तो वे इको गार्डन में अनिश्चितकालीन आंदोलन शुरू करेंगे। जरूरत पड़ने पर भूख हड़ताल और विधानसभा का फिर से घेराव भी होगा।
क्यों गुस्से में हैं ग्राम रोजगार सेवक?
ग्राम रोजगार सेवकों का कहना है कि उनकी नाराजगी सिर्फ आज की नहीं, बल्कि लंबे वक्त से चली आ रही अनदेखी का नतीजा है। संगठन के प्रदेश उपाध्यक्ष राम लखन तिवारी ने इस मौके पर साफ कहा कि मुख्यमंत्री ने 4 अक्टूबर 2021 को खुद ग्राम रोजगार सेवकों के हित में कुछ घोषणाएं की थीं, लेकिन अफसोस! आज ढाई साल से ज्यादा हो चुके हैं, और वो घोषणाएं सिर्फ कागजों तक सीमित हैं।
उन्हें आज तक लागू नहीं किया गया। उनका कहना है कि कई बार उन्होंने शासन स्तर पर अपनी बात उठाई है, अधिकारियों से मुलाकात की है, ज्ञापन दिए हैं, लेकिन हर बार उन्हें सिर्फ आश्वासन मिला, कोई ठोस फैसला नहीं।
इसी बात से कर्मचारियों में भारी रोष है।
पेट पर पड़ी लात: 7,788 रुपए में कैसे चले घर?
ग्राम रोजगार सेवकों की मुख्य पीड़ा उनके मानदेय को लेकर है। उनका आरोप है कि वर्तमान में उन्हें सिर्फ 7,788 रुपए प्रति माह का मानदेय मिलता है।
इस महंगाई के दौर में इतनी कम रकम में एक परिवार का गुजारा कैसे हो सकता है, यह सवाल उनकी आंखों में साफ दिख रहा था। लेकिन बात सिर्फ इतनी ही नहीं है।
उनका आरोप है कि पिछले डेढ़ से दो सालों से कई ग्राम रोजगार सेवकों को यह मामूली मानदेय भी नियमित रूप से नहीं मिल पा रहा है। सोचिए, जब दो साल तक किसी के घर में नियमित आय न आए, तो उस परिवार पर क्या बीतती होगी! राम लखन तिवारी ने कहा, “आर्थिक संकट ने हमें तोड़ कर रख दिया है।
घर चलाना मुश्किल हो गया है। बच्चों की पढ़ाई-लिखाई और दो वक्त की रोटी का इंतजाम करना पहाड़ चढ़ने जैसा है।
”
आत्महत्याओं का दर्द और अनदेखी का आरोप
राम लखन तिवारी ने बातचीत के दौरान एक बेहद गंभीर और दिल दहला देने वाली बात कही। उन्होंने बताया कि आर्थिक तंगी और सरकार की लगातार उपेक्षा के कारण कई ग्राम रोजगार सेवकों ने तो आत्महत्या तक कर ली है।
यह आंकड़ा शायद बहुत से लोगों को पता नहीं होगा, लेकिन उनके बीच यह दर्दनाक हकीकत है। उन्होंने आरोप लगाया कि इन सारी त्रासदियों के बावजूद, सरकार और प्रशासन ने उनकी समस्याओं को हल करने की दिशा में कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया है।
यह वाकई एक गंभीर सवाल खड़ा करता है कि आखिर जिन लोगों के कंधों पर ग्रामीण इलाकों में सरकारी योजनाओं को जमीन पर उतारने की जिम्मेदारी है, उनका खुद का जीवन इतना दूभर क्यों बना हुआ है?
क्या है आगे की रणनीति और चेतावनी?
पुलिस द्वारा रोके जाने के बाद भी ग्राम रोजगार सेवकों का हौसला कम नहीं हुआ। संगठन ने अपनी बात फिर दोहराई और चेतावनी दी कि अगर उनकी मांगों पर प्रमुख सचिव स्तर की वार्ता में कोई सकारात्मक निर्णय नहीं लिया गया, तो वे अपने आंदोलन को और तेज करेंगे।
उनकी अगली रणनीति इको गार्डन में अनिश्चितकालीन आंदोलन शुरू करने की है। यदि वहां भी बात नहीं बनी, तो वे भूख हड़ताल पर भी बैठेंगे और जरूरत पड़ने पर विधानसभा का दोबारा घेराव करेंगे।
राम लखन तिवारी ने आखिर में एक भावुक अपील करते हुए कहा, “हमने हमेशा सरकार के हित में काम किया है। ग्रामीण क्षेत्रों में सरकार की हर योजना को जनता तक पहुंचाने में हमने अपनी अहम भूमिका निभाई है।
जहां भी हमारी जरूरत पड़ी है, हमने अपना शत प्रतिशत योगदान दिया है। उसके बाद हमें इस तरह से नजरअंदाज करना बेहद दुखद है।
” अब देखना ये है कि सरकार उनकी इस चेतावनी को कितना गंभीरता से लेती है और क्या उनकी मांगों पर कोई ठोस फैसला लेती है, या ये विरोध ऐसे ही सड़कों पर गूंजता रहेगा।

