रायबरेली: देश में जब से नीट (NEET) परीक्षा का पेपर लीक होने की खबर सामने आई है, छात्रों और उनके अभिभावकों का गुस्सा सातवें आसमान पर है। सपनों को संजोकर सालों मेहनत करने वाले युवा खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। अब ये गुस्सा सिर्फ घरों में बैठकर कुढ़ने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सड़कों पर उतरना शुरू हो गया है। इसी कड़ी में गुरुवार की सुबह उत्तर प्रदेश के रायबरेली में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) ने केंद्र सरकार और उसकी नीतियों के खिलाफ़ एक ज़ोरदार मोर्चा खोल दिया।
गुरुवार, यानी आज, सुबह ठीक 11 बजे भाकपा (माले) के कार्यकर्ता और पदाधिकारी विकास भवन के सामने इकट्ठा हुए। उनके हाथों में तख्तियाँ थीं और जुबां पर व्यवस्था के खिलाफ़ तीखे नारे।
घंटों तक चली नारेबाजी के बाद, उन्होंने अपनी मांगों और गुस्से को एक ज्ञापन में पिरोया और सिटी मजिस्ट्रेट के ज़रिए महामहिम राज्यपाल और राष्ट्रपति को भेजा। उनका मकसद साफ था – इस बदहाल शिक्षा व्यवस्था और भर्ती प्रक्रिया में फैले भ्रष्टाचार पर गंभीर सवाल उठाना और सरकार का ध्यान खींचना।
इस विरोध प्रदर्शन के दौरान एक सभा का भी आयोजन हुआ, जिसे भाकपा (माले) के ज़िला सचिव हनोमान अंबेडकर ने संबोधित किया। उनकी बातें सुनकर हर कोई सोचने पर मजबूर हो गया कि आखिर हमारे देश की शिक्षा प्रणाली किस दिशा में जा रही है।
अंबेडकर ने दो टूक शब्दों में कहा कि नीट पेपर लीक होने के बाद परीक्षा प्रणाली से छात्रों का जो थोड़ा-बहुत भरोसा बचा था, वह भी अब पूरी तरह से उठ गया है। उनका कहना था कि जब इतनी बड़ी राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा में ही धांधली हो जाए, तो फिर छात्र किस पर भरोसा करें? उनका भविष्य अब दांव पर लगा है।
उत्तर प्रदेश में भर्ती घोटालों का लंबा सिलसिला
हनोमान अंबेडकर यहीं नहीं रुके। उन्होंने अपनी बात को और मज़बूती देते हुए उत्तर प्रदेश में हुई पिछली कई महत्वपूर्ण भर्तियों का भी ज़िक्र किया।
उन्होंने आरोप लगाया कि सिर्फ नीट ही नहीं, बल्कि असिस्टेंट प्रोफेसर, यूपीएसआई (UP SI) और लेखपाल जैसी भर्तियों में भी बड़े पैमाने पर अपारदर्शिता और भ्रष्टाचार हुआ है। इन मामलों ने प्रदेश के लाखों युवाओं के सपनों को चकनाचूर कर दिया है।
उनका कहना था कि एक तरफ केंद्र सरकार पर आरोप हैं तो दूसरी तरफ राज्य सरकार भी इन घोटालों पर लगाम लगाने में नाकाम दिख रही है। ये तो सरासर अन्याय है!
अंबेडकर ने आगे बताया कि देश भर के छात्र और युवा इस दुर्व्यवस्था और बदहाली से इतने परेशान हैं कि वे अपनी आवाज़ उठा रहे हैं। लेकिन उनकी बात को अनसुना कर दिया जा रहा है, उनकी समस्याओं पर ध्यान नहीं दिया जा रहा।
यह एक ऐसी स्थिति है जहाँ भविष्य के निर्माता, देश के युवा, खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं और उनकी कोई सुनने वाला नहीं।
छात्रों का गुस्सा और सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणी
इस गंभीर स्थिति का एक दुखद पहलू छात्रों द्वारा की जा रही आत्महत्याएं भी हैं। अंबेडकर ने दर्जनों छात्रों द्वारा आत्महत्या करने की घटनाओं पर गहरी चिंता जताई।
उनका दर्द साफ झलक रहा था जब उन्होंने कहा कि इन युवाओं ने अपने भविष्य के लिए जो सपने देखे थे, वे भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गए। इससे भी ज़्यादा चौंकाने वाली और दर्दनाक बात उन्होंने बताई – सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों द्वारा युवाओं को 'कॉकरोच' और 'परजीवी' जैसे शब्दों से संबोधित करना।
अंबेडकर ने इन टिप्पणियों को छात्रों के आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाने वाला और बेहद अपमानजनक करार दिया। उन्होंने कहा कि यह हमारे देश के युवाओं का मनोबल तोड़ने जैसा है, जिनकी उम्मीदें पहले ही टूट चुकी हैं।
जंतर-मंतर पर छात्रों का अनवरत संघर्ष
इस अपमान और व्यवस्था की अनदेखी के खिलाफ़, छात्र अब चुप बैठने को तैयार नहीं हैं। हनोमान अंबेडकर ने जानकारी दी कि पिछले 12 दिनों से नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्र लगातार धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं।
यह सिर्फ एक प्रदर्शन नहीं, बल्कि अपने अधिकारों और न्याय के लिए एक लंबी लड़ाई है, जो अब पूरे देश का ध्यान खींच रही है।
इस आंदोलन को और तेज़ करते हुए, पिछले पाँच दिनों से कई प्रमुख हस्तियां भूख हड़ताल पर बैठी हैं। इनमें जाने-माने पर्यावरणविद और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक भी शामिल हैं, जिनकी आवाज़ का अपना एक वज़न है।
उनके साथ ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) की केंद्रीय अध्यक्ष नेहा, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्रसंघ की सह सचिव दानिश अली, उत्तर प्रदेश आइसा के अध्यक्ष मनीष कुमार, जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के बराक हॉस्टल के प्रेसिडेंट ऋषिकेश, डॉ. बी.
आर. अंबेडकर यूनिवर्सिटी दिल्ली की स्टूडेंट काउंसिल के पूर्व सदस्य अमीन और आइसा की दिल्ली यूनिवर्सिटी यूनिट के वाइस प्रेसिडेंट दीपक भी इस न्याय की लड़ाई में अपनी जान दांव पर लगाकर भूख हड़ताल कर रहे हैं।
यह संघर्ष तब तक जारी रहने की उम्मीद है, जब तक कि उनकी मांगों को सुना और माना नहीं जाता और परीक्षा प्रणाली में पूरी तरह से सुधार नहीं हो जाता।


