चंडीगढ़: पंजाब के करीब 8 लाख सरकारी कर्मचारियों और पेंशनभोगियों की सांसें आज थमी हुई हैं। इन सभी की निगाहें चंडीगढ़ में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट पर टिकी हैं। वजह है इनका लंबे समय से अटका हुआ महंगाई भत्ता (DA) और पे-कमीशन एरियर का मामला। आज हाईकोर्ट की डबल बेंच में इस बेहद अहम मसले पर सुनवाई होनी है, जिस पर प्रदेश भर के लाखों परिवारों का भविष्य टिका है।
आप सोच रहे होंगे कि बात इतनी गंभीर क्यों है? दरअसल, पंजाब के सरकारी कर्मचारियों को अभी केंद्र सरकार के मुकाबले 18% कम महंगाई भत्ता मिल रहा है। यानी, जहां केंद्र के कर्मचारियों को ज्यादा DA मिल रहा है, वहीं पंजाब के कर्मचारियों के हाथ सिर्फ 42% DA ही आ रहा है।
यह गैप काफी बड़ा है और कर्मचारी संगठन इसे तुरंत भरने की मांग कर रहे हैं। इस मांग के साथ-साथ पिछले बकाए की भी बात है, जो कई सालों से अटका हुआ है।
पुराना आदेश और सरकार की चुनौती
इस कहानी में एक मोड़ तब आया, जब हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने 8 अप्रैल को पंजाब सरकार को एक सीधा-साधा आदेश दिया। अदालत ने कहा था कि सरकार 30 जून तक कर्मचारियों का लंबित महंगाई भत्ता चुका दे।
यह आदेश कर्मचारियों के लिए एक बड़ी जीत थी, लेकिन सरकार के लिए सिरदर्द। पंजाब सरकार ने इस आदेश को हाईकोर्ट की डबल बेंच में चुनौती दे दी।
अब आप कहेंगे, तो क्या सिंगल बेंच का आदेश रुक गया? नहीं, डबल बेंच ने सिंगल बेंच के आदेश पर कोई रोक नहीं लगाई। लेकिन, सरकार से एक सीलबंद लिफाफे में पूछा कि वो इस बकाया डीए का भुगतान कैसे करेगी, उसकी योजना क्या है? सरकार को अपना 'रोडमैप' देना था।
अब आज की सुनवाई में अदालत इसी बात पर गौर करेगी कि सरकार ने उस सीलबंद लिफाफे में क्या लिखा है। क्या वो किस्तों में भुगतान का प्रस्ताव लेकर आई है, या फिर अपनी 'खराब वित्तीय स्थिति' का हवाला देकर कुछ और समय मांग रही है? इसी पर कर्मचारियों का भविष्य निर्भर करता है।
केंद्र से 18% पीछे; क्या कहते हैं नियम?
जैसा कि हमने पहले बताया, पंजाब के कर्मचारी फिलहाल 42% महंगाई भत्ता पा रहे हैं, जबकि केंद्र सरकार के कर्मचारियों को इससे 18% ज्यादा मिल रहा है। कर्मचारी संगठनों का कहना है कि महंगाई भत्ता कोई 'उपहार' या 'बोनस' नहीं है।
उनकी दलील है कि ये कर्मचारियों के वेतन का वो हिस्सा है, जो बढ़ती महंगाई की मार से उनकी क्रय शक्ति (खरीदने की क्षमता) को बनाए रखने के लिए दिया जाता है। इस दलील के पीछे एक मजबूत आधार भी है।
दरअसल, कर्मचारी संगठनों की ओर से पेश वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने फैसले का हवाला दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि महंगाई भत्ता कर्मचारियों के वेतन का ही एक अभिन्न हिस्सा है, जिसे सरकार अपनी मर्जी से रोक या कम नहीं कर सकती।
इसी आधार पर पंजाब के कर्मचारी भी अपने बकाया डीए और केंद्र के बराबर डीए की मांग कर रहे हैं। उनकी मांग है कि सरकार जल्द से जल्द इस अंतर को खत्म करे और लंबित राशि जारी करे।
अगर राहत नहीं मिली तो क्या होगा?
कर्मचारी संगठन इतने सालों से इंतजार कर रहे हैं, तो उनकी उम्मीदें हाईकोर्ट पर टिकी हैं। लेकिन उन्होंने एक 'प्लान बी' भी तैयार रखा है, जो सरकार की मुश्किलें बढ़ा सकता है।
कर्मचारी नेताओं ने सरकार को सीधी चेतावनी दी है कि अगर आज की सुनवाई में हाईकोर्ट से कोई ठोस राहत नहीं मिलती है, या भुगतान को लेकर कोई स्पष्ट फैसला नहीं आता है, तो वे चुप नहीं बैठेंगे।
उनकी घोषणा के मुताबिक, 17 जुलाई को पूरे पंजाब में एक बड़ा आंदोलन छेड़ा जाएगा। इसमें 'महारैली' और 'महाबंद' का ऐलान किया गया है।
ये कोई छोटी-मोटी बात नहीं है। कर्मचारी नेताओं का दावा है कि अगर कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के परिवारों को भी इस आंदोलन से जोड़ दिया जाए, तो यह संख्या करीब 40 लाख लोगों तक पहुंच जाती है।
इतनी बड़ी संख्या में लोगों का गुस्सा किसी भी सरकार के लिए राजनीतिक रूप से ठीक नहीं होता।
इसका सीधा मतलब है कि यह मुद्दा सिर्फ कुछ कर्मचारियों के वेतन का नहीं, बल्कि आने वाले समय में पंजाब की राजनीति पर भी इसका गहरा असर देखने को मिल सकता है। सरकार के लिए ये एक चुनौती है कि वो अदालत के आदेशों का सम्मान करते हुए, कर्मचारियों की वाजिब मांगों को कैसे पूरा करती है, और साथ ही अपनी वित्तीय स्थिति को भी कैसे संभालती है।
सबकी निगाहें आज हाईकोर्ट के फैसले पर और उसके बाद सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं।


