अलवर: राजस्थान का वो सरिस्का टाइगर रिजर्व, जिसे डेढ़ दशक पहले बिल्कुल 'खाली' मान लिया गया था, वो आज एक नई कहानी लिख रहा है। बाघों के शोर से आबाद इस जंगल में अब कुछ ऐसे नजारे दिख रहे हैं, जिन्हें देख कर वन्यजीव प्रेमियों की आंखें फटी रह गई हैं। कल्पना कीजिए, एक सफेद मोर अपनी दूधिया चमक बिखेरता हुआ घूम रहा हो, और उसके पास से एक ऐसा सांभर गुजरे जिसका बदन धूप में सोने की तरह दमक रहा हो! जी हां, सरिस्का के जंगलों में इन दिनों ऐसे ही दो बेहद दुर्लभ और अनोखे मेहमान कैमरे में कैद हुए हैं। राजस्थान में ऐसा पहली बार हुआ है जब ये दोनों जीव एक साथ देखे गए हैं, और यही वजह है कि वन विभाग से लेकर सैलानियों तक, सब हैरान हैं।
बात सिर्फ इन नए मेहमानों की नहीं है, सरिस्का ने तो पिछले कुछ सालों में एक ऐसी कामयाबी की दास्तान लिखी है, जिसे जानने के लिए देश भर के वन्यजीव विशेषज्ञ यहां डेरा डाले हुए हैं। वो रिसर्च कर रहे हैं कि आखिर कैसे 18 साल पहले पूरी तरह टाइगर-विहीन हो चुका ये अभयारण्य आज 56 बाघों का घर बन गया है।
इस जंगल की मिट्टी में कुछ तो खास है, जो इसे दूसरों से अलग बनाता है।
सरिस्का के नए मेहमान: सफेद मोर और गोल्डन सांभर
आइए पहले आपको इन दो नए सितारों से मिलवाते हैं। इनमें पहला है वो 'सफेद रंग का मोर'।
यह दूधिया सफेद मोर सरिस्का के बफर जोन में, बाला किला और गंगोडी इलाके के आस-पास, जून के पहले हफ्ते में देखा गया था। जंगल में ट्रैकिंग कर रहे वनकर्मियों ने इसे सबसे पहले देखा था, लेकिन उस वक्त इसकी तस्वीर नहीं ले पाए।
बाद में ओडिशा से आए एक वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर ने अपनी कला से इसकी खूबसूरती को कैमरे में कैद किया। अब सरिस्का आने वाले पर्यटक बाघिन ST-19 और बाकी 12 बाघों के साथ-साथ इस दुर्लभ सफेद मोर के भी दीदार कर सकेंगे।
दूसरा मेहमान है, 'गोल्डन सांभर'। इसके नाम से ही आप समझ गए होंगे कि इसकी खासियत क्या है।
वाइल्डलाइफ एक्सपर्ट्स बताते हैं कि इसे सामने से देखने पर और जब सूरज की किरणें इस पर पड़ती हैं, तो इसका शरीर बिल्कुल सोने की तरह चमकता हुआ दिखाई देता है। यह नजारा इतना अद्भुत होता है कि इसे देखने वाला मंत्रमुग्ध हो जाता है।
टाइगर एक्सपर्ट निरंजन सिंह का कहना है कि सफेद मोर और गोल्डन सांभर का दिखना अपने आप में बेहद खास है। उनके मुताबिक, इनके रंग में यह दुर्लभ बदलाव पिगमेंटेशन या हार्मोन्स में गड़बड़ी के कारण हो सकता है, जिसे 'जीनेटिक म्यूटेशन' भी कहते हैं।
प्रकृति के इस अनोखे रंग-रूप को देखना किसी चमत्कार से कम नहीं है।
बाघों का कुनबा: सरिस्का की रिकॉर्डतोड़ सफलता
अब बात उस कामयाबी की जिसने सरिस्का को पूरे देश में चर्चा का विषय बना दिया है। आपको जानकर हैरानी होगी कि करीब 18 साल पहले यह टाइगर रिजर्व पूरी तरह से बाघ-विहीन हो चुका था।
यानी यहां एक भी बाघ नहीं बचा था। लेकिन आज, यहां बाघों का कुनबा बढ़कर 56 हो गया है! यह संख्या अपने आप में एक मिसाल है और सरिस्का ने 'कम समय में ज्यादा शावकों' को जन्म देने का एक अनोखा नेशनल रिकॉर्ड बनाया है।
पिछले तीन साल के भीतर, सरिस्का में 4 अलग-अलग बाघिनों ने एक बार में 4-4 शावकों को जन्म दिया है। यह एक ऐसा रिकॉर्ड है जो सवाई माधोपुर के रणथंभौर टाइगर रिजर्व में भी नहीं है, जबकि रणथंभौर में लगभग 90 बाघ हैं।
वाइल्डलाइफ एक्सपर्ट हिमांशु शर्मा बताते हैं कि सरिस्का की 0 से 56 बाघों तक की यात्रा वाकई रोमांचकारी रही है। उन्होंने यह भी बताया कि पिछले सिर्फ दो सालों में यहां 25 शावकों का जन्म हुआ है, जो इसकी हैबिटेट की मजबूती को दिखाता है।
बेहतरीन आवास और सुनहरा भविष्य
निरंजन सिंह, जो खुद एक टाइगर एक्सपर्ट हैं, सरिस्का के जंगल की खासियत बताते हैं। उनके अनुसार, सरिस्का का जंगल दूसरे जंगलों से अलग और विशेष है।
यहां का घना जंगल और बेहतरीन हैबिटेट यानी प्राकृतिक आवास ही मुख्य वजह है, जिससे बाघिनें एक बार में चार-चार शावक देकर नया इतिहास रच रही हैं। उनका कहना है कि अब सोने सा चमकता सांभर और सफेद मोर देखना तो जैसे इस जंगल के शानदार माहौल में एक और नगीना जुड़ गया है।
यह सब प्रकृति का चमत्कार ही है।
वन राज्य मंत्री संजय शर्मा ने भी इस कामयाबी पर खुशी जताई है। उन्होंने बताया कि वर्ष 2026 तक सरिस्का में बाघों की संख्या 60 के पार चली जाएगी, ऐसा लक्ष्य निर्धारित किया गया है और उसकी दिशा में लगातार काम हो रहा है।
सरिस्का की ये कहानी सिर्फ बाघों के संरक्षण की नहीं, बल्कि एक ऐसे जंगल की भी है जिसने अपनी किस्मत खुद लिखी है और आज देश के लिए एक प्रेरणा बन गया है।


