जौनपुर: उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले में राजनीतिक गलियारों से लेकर गांव की चौपालों तक, अगले पंचायत चुनाव को लेकर अभी से हलचल तेज हो गई है। साल 2026 में होने वाले त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों की आहट अभी दूर भले ही दिख रही हो, लेकिन इसे लेकर एक संगठन ने अभी से बिगुल फूंक दिया है। राष्ट्रीय अधिकार संघ नाम के इस संगठन ने जौनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में जिलाधिकारी को एक बकायदा ज्ञापन सौंपा है। उनकी मांगें सीधी और साफ हैं — चुनाव की तारीख बताओ, आरक्षण लिस्ट जारी करो और पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट भी जल्दी सामने लाओ, वरना अंजाम भुगतने को तैयार रहो!
मामला सिर्फ जौनपुर का नहीं, बल्कि प्रदेश की उन करीब 58,000 ग्राम पंचायतों का है, जहां अगले पंचायत चुनाव होने हैं। लाखों संभावित प्रत्याशी इन चुनावों की तैयारी में लगे हैं और उनके भविष्य को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।
इसी अनिश्चितता को खत्म करने और चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने की मांग को लेकर राष्ट्रीय अधिकार संघ मैदान में कूद पड़ा है। मंगलवार को जिलाधिकारी को सौंपे गए इस ज्ञापन ने चुनावी माहौल में एक नई गर्मी भर दी है।
राष्ट्रीय अधिकार संघ की प्रमुख मांगें और अल्टीमेटम
राष्ट्रीय अधिकार संघ ने अपने ज्ञापन में तीन प्रमुख मांगें रखी हैं, जिन पर वे तत्काल कार्रवाई चाहते हैं। उनकी पहली और सबसे अहम मांग है कि त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव 2026 की तारीखों का ऐलान जल्द से जल्द कर दिया जाए।
संघ चाहता है कि चुनाव की तारीखें 10 या 13 जुलाई तक हर हाल में घोषित कर दी जाएं। इससे न सिर्फ चुनाव आयोग बल्कि संभावित उम्मीदवारों को भी तैयारी का समय मिल पाएगा।
दूसरी मांग पंचायत चुनाव के लिए आरक्षण सूची जारी करने से जुड़ी है। संघ ने साफ तौर पर कहा है कि यह आरक्षण सूची भी 10 या 13 जुलाई तक जारी होनी चाहिए।
इसकी एक खास वजह भी है। दरअसल, संघ की चिंता है कि कहीं यह मामला फिर से कोर्ट-कचहरी के चक्कर में न फंस जाए।
इसलिए उनकी मांग है कि आरक्षण सूची न्यायालय में किसी भी सुनवाई से पहले आ जानी चाहिए। यानी, अगर कोई सुनवाई होनी है, तो आरक्षण सूची उसके पहले ही पब्लिक डोमेन में हो, ताकि किसी भी तरह के कानूनी पेच से बचा जा सके।
तीसरी और शायद सबसे महत्वपूर्ण मांग पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट को लेकर है। राष्ट्रीय अधिकार संघ का कहना है कि पिछड़ा वर्ग आयोग को भी अपनी रिपोर्ट 10 या 13 जुलाई तक न्यायालय में प्रस्तुत कर देनी चाहिए।
यह रिपोर्ट पंचायत चुनावों में पिछड़े वर्ग के आरक्षण की नींव होती है और इसकी समय पर प्रस्तुति ही चुनाव को संवैधानिक और निष्पक्ष तरीके से आगे बढ़ाने के लिए जरूरी है।
पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट और कानूनी पेंच
संघ ने इस बात पर जोर दिया है कि अगर पिछड़ा वर्ग आयोग तय समय सीमा यानी 10 या 13 जुलाई तक अपनी रिपोर्ट न्यायालय में पेश नहीं कर पाता है, तो सरकार को एक सख्त कदम उठाना चाहिए। उनकी मांग है कि ऐसी स्थिति में सभी पंचायत सीटों को सामान्य श्रेणी का मानकर चुनाव करवा दिए जाएं।
यह बात सुनने में थोड़ी कड़वी लग सकती है, लेकिन संघ ने इसके पीछे एक ठोस कानूनी आधार भी दिया है।
दरअसल, संघ ने मध्य प्रदेश में एक सुनवाई के दौरान पारित सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व आदेश का हवाला दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे मामलों में जहां पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट समय पर नहीं आती, वहां चुनाव को बाधित न करने और सभी सीटों को सामान्य मानकर चुनाव कराने का निर्देश दिया था।
संघ इसी precedent को उत्तर प्रदेश में भी लागू करने की बात कर रहा है, ताकि चुनावों में बेवजह की देरी न हो और लोकतांत्रिक प्रक्रिया सुचारू रूप से चलती रहे।
चुनावों की पारदर्शिता और लाखों प्रत्याशियों का भविष्य
सिर्फ तारीख और आरक्षण ही नहीं, राष्ट्रीय अधिकार संघ ने आगामी पंचायत चुनावों को लेकर एक व्यापक मांग रखी है। संघ ने जोर देकर कहा है कि लगभग 58,000 ग्राम पंचायतों में होने वाले निर्वाचन कार्यक्रम को पूरी तरह से पारदर्शी, निष्पक्ष और संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप संचालित किया जाना चाहिए।
उनका कहना है कि जनता के अधिकारों को सुनिश्चित करना और उन्हें निष्पक्ष चुनाव की गारंटी देना सरकार की जिम्मेदारी है।
इन चुनावों में पांच लाख से अधिक संभावित प्रत्याशी अपनी किस्मत आजमाने की तैयारी में हैं। इन सभी प्रत्याशियों के भविष्य की सुरक्षा और उनके हितों को ध्यान में रखते हुए संघ ने सरकार से त्वरित निर्णय लेने का आग्रह किया है।
उनके मुताबिक, अगर फैसले लेने में देरी होती है या प्रक्रिया में कोई गड़बड़ी होती है, तो इन लाखों लोगों की उम्मीदों पर पानी फिर जाएगा और लोकतंत्र में उनका विश्वास कमजोर होगा।
लखनऊ में महाप्रदर्शन की चेतावनी
राष्ट्रीय अधिकार संघ ने अपनी मांगों को लेकर एक मजबूत स्टैंड लिया है और सरकार को एक सीधा अल्टीमेटम दिया है। संघ ने चेतावनी दी है कि यदि 10 या 13 जुलाई तक उनकी इन प्रमुख मांगों पर कोई सकारात्मक निर्णय नहीं लिया गया, तो वे चुप नहीं बैठेंगे।
संघ ने घोषणा की है कि अगर उनकी मांगों को अनसुना किया गया, तो 14 जुलाई को वे लखनऊ में एक बड़े धरना-प्रदर्शन का आयोजन करेंगे। इतना ही नहीं, संघ ने यह भी साफ कर दिया है कि ऐसी स्थिति में वे अकेले नहीं होंगे।
उनके साथ पांच लाख से अधिक संभावित प्रत्याशी भी होंगे और ये सभी मिलकर विधानसभा पहुंचकर एक विशाल प्रदर्शन करने के लिए मजबूर होंगे। अब देखना ये होगा कि सरकार इस चेतावनी पर क्या रुख अपनाती है और पंचायत चुनाव 2026 की राह कितनी साफ होती है।

