जौनपुर: उत्तर प्रदेश से एक ऐसी खबर आ रही है, जो सिर्फ 80 हजार कोटेदारों की नहीं, बल्कि सूबे के करोड़ों उन परिवारों की नींद उड़ा सकती है, जिनकी थाली का सीधा रिश्ता सरकारी राशन से है। ये वो लोग हैं, जो 'कम लाभांश' और 'बढ़ती महंगाई' के बीच पिस रहे हैं। बात इतनी बढ़ गई है कि इन उचित दर विक्रेताओं ने अब आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर दिया है। उन्होंने साफ-साफ कह दिया है कि अगर उनकी मांगें नहीं मानी गईं, तो अगस्त 2026 से यूपी में राशन का वितरण ठप हो जाएगा। जरा सोचिए, जब ये 80 हजार दुकानें बंद होंगी, तो क्या होगा?
मामला कुछ यूं है कि सरकार की जनवितरण प्रणाली (PDS) का एक अहम हिस्सा कहे जाने वाले कोटेदार इन दिनों अपने हक की लड़ाई लड़ रहे हैं। वो कह रहे हैं कि सरकार उनकी मेहनत का सही दाम नहीं दे रही और बढ़ती महंगाई में उनका घर चलाना मुश्किल हो गया है।
इसी सिलसिले में ऑल इंडिया फेयर प्राइस शॉप डीलर एसोसिएशन के बैनर तले कोटेदारों ने जौनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में हुंकार भरी। उन्होंने जोरदार प्रदर्शन किया और अपनी मांगों का पुलिंदा लेकर अतिरिक्त मजिस्ट्रेट के पास पहुंचे, उन्हें ज्ञापन सौंपा।
उनकी चेतावनी साफ है: अगर सरकार ने उनकी मांगों पर कान नहीं धरे, तो 80 हजार कोटेदार अगस्त 2026 से खाद्यान्न वितरण का बहिष्कार कर देंगे। यानी, गरीबों के घर तक राशन पहुंचाने का सिलसिला थम जाएगा।
क्यों खफा हैं कोटेदार? क्या हैं उनकी मुख्य मांगें?
कोटेदारों का गुस्सा बेवजह नहीं है। उनकी मुख्य मांगें दो हैं – पहली, खाद्यान्न और चीनी पर मिलने वाले लाभांश (कमीशन) में बढ़ोतरी की जाए; और दूसरी, उन्हें न्यूनतम आय की गारंटी मिले।
अब आप सोच रहे होंगे कि लाभांश कितना मिलता है? तो आपको बता दें कि इस समय उत्तर प्रदेश के कोटेदारों को प्रति क्विंटल मात्र 10 रुपये का लाभांश मिलता है। सुनकर आप चौंक सकते हैं, लेकिन यह सच है।
कोटेदारों का तर्क है कि आज की तारीख में 10 रुपये प्रति क्विंटल में न तो उनके दुकान का किराया निकलता है, न बिजली का बिल भरता है, और न ही उनके परिवार का भरण-पोषण हो पाता है। इस मामूली कमाई में पूरे महीने की मशक्कत और जिम्मेदारियों को निभाना उनके लिए पहाड़ तोड़ने जैसा है।
दूसरे राज्यों में क्या है हाल? यूपी क्यों पीछे?
कोटेदारों का कहना है कि जब हम दूसरे राज्यों से अपने लाभांश की तुलना करते हैं, तो यूपी का हाल देखकर दुख होता है। उत्तर प्रदेश में जहां 10 रुपये प्रति क्विंटल मिल रहा है, वहीं हरियाणा और दिल्ली में यह लाभांश 200 रुपये प्रति क्विंटल है।
गोवा जैसे छोटे राज्य में तो यह आंकड़ा 230 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच जाता है। यहीं नहीं, गुजरात में तो कोटेदारों के लिए 20,000 रुपये की न्यूनतम आय गारंटी का प्रावधान है।
ये आंकड़े साफ बताते हैं कि उत्तर प्रदेश के कोटेदार बाकी राज्यों की तुलना में कितना कम पा रहे हैं। उनका सवाल वाजिब है कि जब दूसरे राज्य अपने उचित दर विक्रेताओं का ख्याल रख सकते हैं, तो यूपी सरकार क्यों नहीं?
एसोसिएशन के पदाधिकारियों ने बताया कि लगातार बढ़ती महंगाई ने उनकी कमर तोड़ दी है। दाल, चावल, तेल से लेकर बच्चों की पढ़ाई-लिखाई और घर के बाकी खर्चों तक, सब कुछ आसमान छू रहा है।
ऐसे में 10 रुपये प्रति क्विंटल का लाभांश उनकी पारिवारिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए कतई पर्याप्त नहीं है। इस वजह से उनमें भारी असंतोष और निराशा फैल रही है।
कई कोटेदारों का तो यह भी कहना है कि इस धंधे में अब मुनाफा तो दूर, लागत निकालना भी मुश्किल हो गया है। वे अपनी दुकानों को किसी तरह खींच रहे हैं, क्योंकि ये उनकी रोजी-रोटी का इकलौता जरिया है।
2026 की चेतावनी: क्या होगा अगर सरकार नहीं मानी?
कोटेदारों के बढ़ते असंतोष के मद्देनजर ही एसोसिएशन ने यह कड़ा निर्णय लिया है। उन्होंने साफ कर दिया है कि जब तक विभाग और शासन उनकी मांगों पर गंभीरता से ध्यान नहीं देते और लाभांश या न्यूनतम आय गारंटी का ठोस प्रावधान नहीं करते, तब तक वे चैन से नहीं बैठेंगे।
अगस्त 2026 से शुरू होने वाले वितरण बहिष्कार की चेतावनी कोई छोटी-मोटी बात नहीं है। यह सीधे-सीधे लाखों गरीब परिवारों की थाली पर असर डालेगी।
एसोसिएशन ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि अगर अगस्त 2026 से खाद्यान्न वितरण का बहिष्कार होता है और इससे कोई असुविधा उत्पन्न होती है, तो इसकी पूरी जिम्मेदारी कोटेदारों या एसोसिएशन की नहीं होगी, बल्कि यह पूरी तरह से विभाग और शासन की मानी जाएगी।
उनकी यह चेतावनी एक तरह से सरकार को पर्याप्त समय देने जैसा है, ताकि वो इस गंभीर मुद्दे पर विचार करे और कोई समाधान निकाले। एसोसिएशन ने सरकार से विनम्र अनुरोध किया है कि कोटेदारों के लाभांश और उनके भरण-पोषण के लिए आवश्यक न्यूनतम आय गारंटी के संबंध में जल्द से जल्द कोई निर्णय लिया जाए।
साथ ही, उन्होंने यह भी अपील की है कि इस निर्णय से एसोसिएशन को भी समय रहते अवगत कराया जाए, ताकि किसी भी प्रकार की असुविधा या टकराव की स्थिति से बचा जा सके। अब गेंद पूरी तरह से उत्तर प्रदेश सरकार के पाले में है।
देखना होगा कि क्या सरकार 80 हजार कोटेदारों की इस गंभीर चेतावनी को गंभीरता से लेती है, या फिर अगस्त 2026 में एक बड़ा संकट सामने आएगा, जो सीधे-सीधे प्रदेश के करोड़ों लोगों की भूख से जुड़ा होगा।

