लद्दाख: भारत के बर्फीले पहाड़ों से एक ऐसी खबर आई है, जिसने पूरे देश को गर्व महसूस कराया है! ठंडे रेगिस्तान लद्दाख में, जहां आमतौर पर जिंदगी की रफ्तार थोड़ी धीमी पड़ जाती है, वहीं अब ऊर्जा के क्षेत्र में एक क्रांति होने वाली है। सरकार की बड़ी कंपनी, ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉर्पोरेशन यानी ONGC ने एक ऐसा कमाल कर दिखाया है, जिससे अब बिना कोयले और बिना पानी के 24 घंटे बिजली मिलना मुमकिन हो पाएगा। सोचिए, एक ऐसी जगह जहां बिजली अक्सर एक चैलेंज होती है, वहां अब गर्मी से बिजली बनेगी!
ONGC ने लद्दाख की पुगा घाटी में अपना दूसरा जियोथर्मल वेल यानी भू-तापीय कुआं खोदने का काम सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है। ये खबर इसलिए भी बड़ी है, क्योंकि ये भारत के पहले पायलट जियोथर्मल पावर प्लांट को हकीकत बनाने की दिशा में एक बहुत ही अहम और मजबूत कदम है।
बता दें, पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, ONGC की रिसर्च और डेवलपमेंट ब्रांच, जिसे ONGC एनर्जी सेंटर के नाम से जाना जाता है, उन्होंने ये कारनामा 14000 फीट से भी ज्यादा की ऊंचाई पर किया है। और सबसे हैरतअंगेज बात? उन्होंने करीब एक महीने के भीतर 1000 मीटर की गहराई तक इस कुएं की ड्रिलिंग कर दी है।
कंपनी ने खुद एक सोशल मीडिया पोस्ट में इस कामयाबी की जानकारी दी है और कहा है कि इस बार ड्रिलिंग में न सिर्फ समय कम लगा, बल्कि लागत भी काफी सुधरी है। मतलब, काम तेजी से हुआ और पैसा भी बचा!
आखिर ये जियोथर्मल एनर्जी है क्या, और ONGC ने लद्दाख में क्या कमाल किया?
आपने अक्सर सुना होगा कि सूरज की रोशनी से बिजली बनती है (सोलर एनर्जी) या हवा से बिजली बनती है (विंड एनर्जी)। लेकिन क्या आप जानते हैं कि हमारी धरती के नीचे भी अपार ऊर्जा का खजाना छिपा है? इसी धरती की अंदरूनी गर्मी का इस्तेमाल करके बिजली बनाने को जियोथर्मल एनर्जी कहते हैं।
ये बिल्कुल ऐसा है जैसे आप धरती के अंदर से हॉट स्प्रिंग या गर्म पानी के झरने की गर्मी का इस्तेमाल कर रहे हों।
ONGC ने यही कमाल किया है। लद्दाख की पुगा घाटी में धरती के अंदर से निकलने वाली इस प्राकृतिक गर्मी को टैप करने के लिए उन्होंने गहराई तक ड्रिलिंग की है।
14000 फीट की ऊंचाई पर, जहां हवा भी पतली होती है, वहां 1000 मीटर नीचे तक खुदाई करना कोई बच्चों का खेल नहीं है। ये इंजीनियरिंग का एक बहुत बड़ा और जटिल काम है।
इस दूसरे कुएं की सफलता से ये साफ हो गया है कि भारत अब ऊर्जा के ऐसे स्रोतों पर भी निर्भर हो सकता है, जिन पर पहले कभी ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया था।
पहले कुएं की कहानी क्या है और इससे क्या सीख मिली?
ONGC का ये दूसरा कुआं, दरअसल पुगा में खोदे गए उनके पहले जियोथर्मल वेल की शानदार सफलता पर आधारित है। पहला कुआं भी अपने आप में एक मील का पत्थर था।
उस कुएं से पानी के बॉइलिंग पॉइंट से भी ज्यादा तापमान पर भाप निकली थी। कल्पना कीजिए, इतना गर्म पानी कि वो तुरंत भाप में बदल जाए! इस घटना ने साफ कर दिया था कि लद्दाख का ये इलाका भू-तापीय संसाधनों से मालामाल है।
पहले कुएं से मिली इस हाई-टेंप्रेचर भाप ने वैज्ञानिकों को कॉन्फिडेंस दिया कि यहां जियोथर्मल पावर प्लांट लगाना पूरी तरह से मुमकिन है। ये एक तरह का ‘प्रूफ ऑफ कॉन्सेप्ट’ था, जिसने भविष्य की बड़ी योजनाओं के लिए रास्ता खोल दिया।
पहले कुएं की सफलता ने ही दूसरे कुएं की ड्रिलिंग के लिए नींव तैयार की और अब दूसरे कुएं की सफलता के बाद तो मानो जैसे तस्वीर और भी साफ हो गई है।
इस दूसरे कुएं से देश को क्या मिलेगा, और लद्दाख का भविष्य कैसा होगा?
ONGC के मुताबिक, ये दूसरा कुआं भारत के पहले 1-मेगावाट इलेक्ट्रिक पायलट जियोथर्मल पावर प्लांट को बनाने में बहुत मदद करेगा। 1-मेगावाट सुनने में भले ही छोटा लग रहा हो, लेकिन ये एक शुरुआत है, एक पायलट प्रोजेक्ट है जो आने वाले समय में बड़े बदलाव ला सकता है।
ये सफलता देश में जियोथर्मल एनर्जी के कमर्शियल इस्तेमाल का रास्ता साफ करेगी। सोचिए, जब ये टेक्नोलॉजी बड़े पैमाने पर लागू होगी, तो कितनी बिजली पैदा हो सकेगी!
इस परियोजना के अगले चरण में, ONGC 1-मेगावाट का पायलट पावर प्लांट स्थापित करने की योजना बना रहा है। और सिर्फ यहीं नहीं रुकना है।
उनकी लॉन्ग-टर्म योजना है कि इन भू-तापीय संसाधनों को बड़े पैमाने पर विकसित किया जाए, ताकि लद्दाख जैसे दूर-दराज के इलाकों को चौबीसों घंटे भरोसेमंद और बिना किसी रुकावट के बेसलोड बिजली मिल सके। इसका मतलब है कि लद्दाख के लोगों को अब बिजली कटौती की टेंशन नहीं लेनी पड़ेगी।
उनके घरों में, दुकानों में, और उद्योगों में हर समय बिजली उपलब्ध रहेगी। ये सिर्फ बिजली नहीं, बल्कि वहां के लोगों के जीवन स्तर को सुधारने और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने का एक जरिया भी है।
जियोथर्मल बाकी रिन्यूएबल सोर्सेज से कैसे बेहतर है?
हम अक्सर सोलर और विंड एनर्जी की बात करते हैं, जो बहुत अच्छे रिन्यूएबल एनर्जी सोर्स हैं। लेकिन इनकी अपनी सीमाएं हैं।
सोलर एनर्जी तभी काम करती है जब सूरज निकले और विंड एनर्जी तभी काम करती है जब हवा चले। मतलब, ये मौसम पर निर्भर होते हैं।
अगर बादल छाए हैं या हवा नहीं चल रही, तो बिजली उत्पादन रुक जाता है।
लेकिन जियोथर्मल एनर्जी के साथ ऐसा नहीं है। ये धरती के अंदर की गर्मी का इस्तेमाल करती है, जो चौबीसों घंटे, साल के 365 दिन उपलब्ध रहती है।
इस पर मौसम की स्थितियों का कोई असर नहीं पड़ता। इसके प्लस पॉइंट्स और भी हैं – जियोथर्मल एनर्जी से कार्बन उत्सर्जन बहुत कम होता है।
यानी ये पर्यावरण के लिए भी अच्छी है। और सबसे बड़ी बात, ये बिना किसी रुकावट के 24 घंटे बिजली की सप्लाई कर सकती है।
इसे 'बेसलोड पावर' कहा जाता है, जो किसी भी ग्रिड के लिए बहुत जरूरी होती है ताकि लगातार बिजली मिलती रहे। कुल मिलाकर, ONGC का ये कदम भारत को रिन्यूएबल एनर्जी के क्षेत्र में एक नई दिशा दे रहा है, जहां आत्मनिर्भरता का सपना अब हकीकत के और करीब आ गया है।

































