प्रयागराज: कहानी कुछ यूं है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट में अधिवक्ताओं के लिए एक शानदार नई इमारत बनी है, जिसमें चैंबर्स भी हैं और पार्किंग की भी सुविधा है। लेकिन इस नई चमक-धमक के पीछे एक बड़ा पेंच फंसा हुआ है – इस पूरी बिल्डिंग का बिजली का बिल और रखरखाव का खर्च। ये कोई छोटा-मोटा खर्च नहीं, बल्कि हर साल करोड़ों का आंकड़ा छू रहा है। अब सवाल ये था कि इस खर्च का बोझ कौन उठाएगा? क्या ये अधिवक्ताओं की जेब पर पड़ेगा या फिर सरकार इसकी जिम्मेदारी लेगी? इसी सवाल के जवाब में अब एक बड़ी खबर सामने आई है, जिसने पूरे कानूनी गलियारे में एक उम्मीद की किरण जगा दी है। खुद इलाहाबाद हाईकोर्ट के महानिबंधक (रजिस्ट्रार जनरल) ने उत्तर प्रदेश सरकार से सिफारिश की है कि इस पूरे तामझाम का खर्च सरकार उठाए और इसके लिए हर साल 24 करोड़ रुपये का बजट अनुदान दिया जाए।
ये कोई मामूली सिफारिश नहीं है, जनाब। ये सीधे-सीधे अधिवक्ताओं के हित में उठाया गया एक बड़ा कदम है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल मनजीत सिंह श्योरण ने 5 जुलाई 2026 को उत्तर प्रदेश के प्रमुख सचिव न्याय को एक चिट्ठी लिखी है। इस चिट्ठी में साफ तौर पर कहा गया है कि नवनिर्मित अधिवक्ता चैंबर्स और मल्टीलेवल पार्किंग भवन के बिजली के बिल और उसके रख-रखाव पर आने वाले खर्च की भरपाई के लिए राज्य सरकार को बजटीय अनुदान देना चाहिए।
अब समझते हैं कि आखिर ये पूरा मामला इतना तूल क्यों पकड़ा और कैसे ये सिफारिश इस मुकाम तक पहुंची।
अधिवक्ताओं के लिए नई इमारत, नया विवाद
दरअसल, इलाहाबाद हाईकोर्ट में अधिवक्ताओं के लिए अत्याधुनिक चैंबर्स और मल्टीलेवल पार्किंग की सुविधा वाला एक भव्य भवन बनाया गया है। ये इमारत अधिवक्ताओं को आधुनिक सुविधाएं देने के मकसद से बनाई गई थी।
लेकिन जैसे ही इन चैंबर्स के आवंटन की प्रक्रिया शुरू हुई, एक नया बवाल खड़ा हो गया। अधिवक्ता लंबे समय से इस बात का विरोध कर रहे हैं कि उन्हें चैंबर्स किराए पर दिए जाएं।
उनकी मांग बहुत साफ है: कुछ निश्चित राशि जमा करवाकर उन्हें चैंबर आवंटित कर दिए जाएं, लेकिन उनसे हर महीने किराया न लिया जाए। अधिवक्ताओं का कहना है कि वकालत का पेशा पहले से ही काफी संघर्षपूर्ण है, ऐसे में एक नए भवन का किराया उनकी आर्थिक स्थिति पर और बोझ बढ़ाएगा।
यही वो मूल मुद्दा था जिसने इस पूरी कवायद को जन्म दिया।
इस मुद्दे को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन और अन्य अधिवक्ता संगठनों ने लगातार अपनी आवाज उठाई। उन्होंने सरकार और न्यायपालिका दोनों से गुहार लगाई कि इस समस्या का समाधान निकाला जाए।
अधिवक्ताओं का तर्क था कि ये सुविधाएं उनके काम को बेहतर बनाने के लिए हैं, न कि उन पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ डालने के लिए। उनका संघर्ष काफी लंबा चला, जिसमें कई बैठकें, धरने और ज्ञापन शामिल थे।
ये सिर्फ एक इमारत के किराए का सवाल नहीं था, बल्कि ये हजारों अधिवक्ताओं के भविष्य और उनकी रोजी-रोटी से जुड़ा मामला था।
बार एसोसिएशन की पहल और मुख्यमंत्री से मुलाकात
अधिवक्ताओं के इस बड़े मुद्दे को लेकर हाईकोर्ट बार एसोसिएशन, इलाहाबाद के अध्यक्ष और महासचिव ने एक अहम पहल की। 12 फरवरी 2026 को उन्होंने सीधे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को एक पत्र लिखा।
इस पत्र में उन्होंने साफ-साफ शब्दों में मांग की थी कि नवनिर्मित भवन के बिजली और रख-रखाव के खर्च के लिए प्रति वर्ष 24 करोड़ रुपये का बजटीय अनुदान या सब्सिडी दी जाए। उनकी मुख्य चिंता यही थी कि इस भारी-भरकम खर्च का बोझ किसी भी सूरत में अधिवक्ताओं पर नहीं पड़ना चाहिए।
इस पत्र के बाद भी बार एसोसिएशन चुप नहीं बैठा। उन्होंने इस मामले को और गंभीरता से आगे बढ़ाने का फैसला किया।
7 जून 2026 को बार एसोसिएशन के पदाधिकारियों ने खुद मुख्यमंत्री से मुलाकात की। ये मुलाकात बेहद महत्वपूर्ण थी क्योंकि इसमें मुख्यमंत्री ने इस मुद्दे पर 'सकारात्मक रुख' दिखाया।
मुख्यमंत्री का ये आश्वासन अधिवक्ताओं के लिए एक बड़ी राहत बनकर आया। इसने न सिर्फ उनकी उम्मीदों को बढ़ाया, बल्कि इस बात का भी संकेत दिया कि सरकार इस मामले पर गंभीरता से विचार कर रही है।
मुख्यमंत्री की ओर से मिले इस सकारात्मक संकेत के बाद बार एसोसिएशन के हौसले और बुलंद हो गए और उन्होंने अपनी मुहिम को और तेज कर दिया।
हाईकोर्ट की सिफारिश: क्या खत्म होगा अधिवक्ताओं का इंतजार?
मुख्यमंत्री से मिली सकारात्मक प्रतिक्रिया के बाद बार एसोसिएशन ने एक और महत्वपूर्ण कदम उठाया। 3 जुलाई 2026 को उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को एक पत्र लिखा।
इस पत्र में उन्होंने अनुरोध किया कि इस पूरे मामले को राज्य सरकार को 'सकारात्मक सिफारिश' के साथ भेजा जाए, ताकि बजटीय सहायता मिल सके। बार एसोसिएशन जानता था कि न्यायपालिका की सिफारिश से इस मामले को सरकारी गलियारों में और भी अधिक गंभीरता से लिया जाएगा।
और फिर आया वो दिन, जब अधिवक्ता समुदाय का इंतजार खत्म होने की उम्मीद जगी। मुख्य न्यायाधीश के निर्देश पर रजिस्ट्रार जनरल मनजीत सिंह श्योरण ने राज्य सरकार को एक विस्तृत पत्र लिखा।
इस पत्र में बार एसोसिएशन द्वारा मुख्यमंत्री और मुख्य न्यायाधीश को लिखे गए सभी पत्रों को संलग्न किया गया था। रजिस्ट्रार जनरल ने साफ तौर पर राज्य सरकार से अनुरोध किया है कि इस पूरे मामले को मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश के समक्ष 'सहानुभूतिपूर्वक विचार' और 'उचित आदेश' के लिए प्रस्तुत किया जाए।
यह सिफारिश हाईकोर्ट की तरफ से एक आधिकारिक और ठोस समर्थन है, जो अधिवक्ताओं की मांगों को और मजबूती प्रदान करता है।
इस पत्र की प्रतियां बार एसोसिएशन के अध्यक्ष राकेश पांडे और एडवोकेट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष सगीर अहमद को भी भेजी गई हैं, जिससे उन्हें भी इस प्रगति की जानकारी मिल सके। अब अधिवक्ताओं की निगाहें उत्तर प्रदेश सरकार पर टिकी हैं कि वह इस सिफारिश पर क्या फैसला लेती है।
अधिवक्ताओं के लिए यह सिफारिश एक बड़ी जीत की तरह है, जिसने उनके लंबे संघर्ष को एक नई दिशा दी है। अगर सरकार इस सिफारिश को मान लेती है, तो न केवल अधिवक्ताओं को किराए के बोझ से मुक्ति मिलेगी, बल्कि नई सुविधाओं का उपयोग भी बिना किसी वित्तीय चिंता के हो पाएगा।
यह इलाहाबाद हाईकोर्ट के विशाल अधिवक्ता समुदाय के लिए एक बड़ी राहत होगी और न्याय व्यवस्था में उनके योगदान को भी एक तरह से सम्मान मिलेगा। फिलहाल, नई चैंबर्स के आवंटन की प्रक्रिया अभी भी जारी है, और इस सिफारिश ने उम्मीद की एक नई किरण जगा दी है कि शायद अब किराए का मुद्दा सुलझ जाएगा।






































