सिद्धार्थनगर: उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर जिले से एक ऐसी सनसनीखेज कहानी सामने आई है, जिसे सुनकर आप दांतों तले उंगलियां दबा लेंगे। सोचिए, एक अस्पताल है जिसके मुख्य गेट पर बाहर से ताला लगा है, लेकिन अंदर ‘इलाज’ का गोरखधंधा धड़ल्ले से चल रहा है। ये कोई फिल्मी कहानी नहीं, बल्कि सिद्धार्थनगर के इटवा में स्थित ‘जनता सेवा हॉस्पिटल’ की हकीकत है। ये वही अस्पताल है जो पहले से ही एक नवजात शिशु की मौत और कथित तौर पर एक अयोग्य व्यक्ति द्वारा ऑपरेशन किए जाने के आरोपों में घिरा हुआ था। अब इस पूरे मामले ने एक नया मोड़ ले लिया है, क्योंकि स्वास्थ्य विभाग ने इटवा पुलिस को एक नई तहरीर भेजी है, जिसमें एक शख्स का नाम FIR में शामिल करने और मामले में और भी गंभीर धाराएं बढ़ाने की सिफारिश की गई है। ये वो शख्स है जो संयुक्त छापेमारी के दौरान अस्पताल के एक कमरे में बेड के नीचे छिपा मिला था।
दरअसल, ये सारा माजरा 27 जून की देर रात का है। स्वास्थ्य विभाग को लगातार शिकायतें मिल रही थीं कि जनता सेवा हॉस्पिटल को बंद रखने के साफ आदेश दिए जाने के बावजूद, वहां चोरी-छिपे मरीजों का इलाज किया जा रहा है।
इन गंभीर शिकायतों पर एक्शन लेते हुए प्रशासन, स्वास्थ्य विभाग और पुलिस की एक संयुक्त टीम ने रात के करीब 11:30 बजे जनता सेवा हॉस्पिटल पर अचानक धावा बोल दिया। टीम जब अस्पताल के बाहर पहुंची, तो नजारा चौंकाने वाला था।
मुख्य गेट पर ताला लगा हुआ था और बाहर से देखने पर लग रहा था कि अस्पताल पूरी तरह बंद है। शायद ये एक सोची-समझी चाल थी, ताकि किसी को शक न हो।
लेकिन अधिकारियों को पता था कि कुछ तो गड़बड़ है। उन्होंने ताला खुलवाया और जैसे ही अंदर कदम रखा, सच्चाई सामने आने लगी।
अंदर का नजारा बाहर के बिलकुल उलट था। अस्पताल के ज़्यादातर हिस्सों में लाइटें भले ही बंद थीं, लेकिन भीतर मरीज भर्ती थे।
उनके तीमारदार भी वहां मौजूद थे और अस्पताल का स्टाफ भी काम कर रहा था। ये सब देखकर साफ हो गया कि अस्पताल को सिर्फ दिखाने के लिए बंद किया गया था, जबकि हकीकत में यहां नियमों को ताक पर रखकर मरीजों का इलाज जारी था।
बाहर ताला, अंदर ऑपरेशन: छापेमारी से हुए हैरान करने वाले खुलासे
संयुक्त टीम ने अस्पताल के सभी कमरों की बारीकी से तलाशी ली। इस तलाशी के दौरान जो खुलासे हुए, वे और भी हैरान करने वाले थे।
टीम को दो ऐसे मरीज मिले, जिनका कुछ ही घंटे पहले ऑपरेशन किया गया था। मरीजों के परिजनों ने भी अधिकारियों को बताया कि उनके घरवालों का ऑपरेशन उसी दिन कराया गया था।
बंद पड़े अस्पताल में ऑपरेशन जैसी गंभीर गतिविधियां चलना, सीधे-सीधे कानून का उल्लंघन और मरीजों की जान से खिलवाड़ का मामला था।
मामले की गंभीरता को देखते हुए, टीम ने तुरंत कार्रवाई की। दोनों मरीजों को तत्काल एंबुलेंस से माधव प्रसाद त्रिपाठी मेडिकल कॉलेज एवं संबद्ध चिकित्सालय भेजा गया, ताकि उन्हें विशेषज्ञ डॉक्टरों की निगरानी में सही इलाज मिल सके और उनकी जान खतरे से बाहर लाई जा सके।
स्वास्थ्य विभाग का साफ मानना है कि जब अस्पताल को बंद रखने का स्पष्ट आदेश था, तब भी ऑपरेशन जैसी गतिविधियां करना एक गंभीर अनियमितता है और सरकारी आदेशों की सीधी अवहेलना है। छापेमारी टीम में इटवा तहसीलदार, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र इटवा के अधीक्षक, प्रभारी निरीक्षक संजय मिश्रा और स्वास्थ्य विभाग के नैदानिक स्थापना के नोडल अधिकारी डॉ.
मानवेन्द्र पाल जैसे वरिष्ठ अधिकारी शामिल थे, जो इस पूरे मामले के चश्मदीद हैं।
बेड के नीचे छिपा मिला 'डॉक्टर' प्रवीण कुमार यादव
लेकिन इस छापेमारी का सबसे बड़ा और चौंकाने वाला खुलासा अभी बाकी था। जब टीम अस्पताल के एक-एक कमरे की सघन तलाशी ले रही थी, तो एक कमरे में उन्हें प्रवीण कुमार यादव नाम का शख्स बेड के नीचे छिपा मिला।
टीम ने उसे बाहर निकाला और उससे पूछताछ की। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के अनुसार, मौके पर कोई भी पंजीकृत चिकित्सक (रजिस्टर्ड डॉक्टर) मौजूद नहीं था, जो इतनी बड़ी मेडिकल फैसिलिटी चला सके या ऑपरेशन कर सके।
प्रवीण कुमार यादव का बेड के नीचे छिपा मिलना और मौके पर किसी योग्य व पंजीकृत डॉक्टर का न होना, इस पूरे मामले को और भी संगीन बना देता है। यहीं से ये शक गहराता है कि क्या प्रवीण कुमार यादव ही वो शख्स था, जो कथित तौर पर अयोग्य होने के बावजूद मरीजों का इलाज और ऑपरेशन कर रहा था? शुरुआती जांच और मौके पर मिले सबूत सीधे तौर पर इसी तरफ इशारा कर रहे हैं।
अगर ऐसा है, तो यह मरीजों की जान से बड़ा खिलवाड़ है, जहां गैर-पंजीकृत व्यक्ति बिना लाइसेंस और योग्यता के सर्जरी जैसा गंभीर काम कर रहा था।
FIR में नाम जोड़ने और धाराएं बढ़ाने की सिफारिश
अब इस पूरे प्रकरण में स्वास्थ्य विभाग ने इटवा पुलिस स्टेशन को एक नई तहरीर भेजी है। इस तहरीर में साफ तौर पर यह सिफारिश की गई है कि प्रवीण कुमार यादव का नाम FIR में शामिल किया जाए।
साथ ही, विभाग ने मामले की गंभीरता को देखते हुए इसमें और भी गंभीर धाराएं बढ़ाने की संस्तुति की है। स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि संयुक्त छापेमारी के दौरान उन्हें जो पुख्ता सबूत मिले हैं, अस्पताल की जो परिस्थितियां सामने आई हैं, और मौके पर जो तथ्य मिले हैं, वो इस कार्रवाई के लिए पर्याप्त आधार हैं।
विभाग इस मामले में कोई ढिलाई नहीं बरतना चाहता, क्योंकि यह सीधा-सीधा जन स्वास्थ्य और सुरक्षा से जुड़ा मामला है।
इस नई तहरीर और प्रवीण कुमार यादव का नाम एफआईआर में जुड़ने से जनता सेवा हॉस्पिटल प्रकरण में अब जांच का दायरा और बढ़ जाएगा। पहले यह मामला नवजात शिशु की मौत और कथित अयोग्य व्यक्ति द्वारा ऑपरेशन के आरोपों तक सीमित था।
अब बेड के नीचे छिपा मिला 'डॉक्टर' और उस पर गंभीर धाराएं जुड़ने की बात इस पूरे केस को एक नए मोड़ पर ले आई है। देखना यह होगा कि पुलिस इस नई तहरीर के आधार पर आगे क्या कार्रवाई करती है और जनता सेवा हॉस्पिटल के इस 'बाहर ताला, अंदर इलाज' वाले गोरखधंधे के पीछे और कौन-कौन से राज खुलते हैं।
यह घटना हमें एक बार फिर याद दिलाती है कि स्वास्थ्य सेवाओं में पारदर्शिता और नियमों का पालन कितना जरूरी है, क्योंकि यहां बात सिर्फ कागजी कार्रवाई की नहीं, बल्कि सीधे-सीधे लोगों की जिंदगी और मौत की होती है।


