बक्सर: बिहार के बक्सर जिले के चौसा प्रखंड का एक छोटा सा गांव नरबतपुर, जहां एक घर की छत तो डल चुकी है, लेकिन दीवारें आज भी अधूरी हैं। घर के बाहर बालू का ढेर पड़ा है, जो अब धूल फांक रहा है। यह सिर्फ निर्माण सामग्री नहीं, बल्कि एक बेटे के उन वादों की गवाही है जो वह अपनी आखिरी छुट्टी पर कर गया था। हवलदार सुनील कुमार सिंह ने कहा था कि अगली छुट्टी पर आकर घर का प्लास्टर करवाऊंगा, दरवाजे-खिड़कियां लगवाऊंगा। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। सुनील वापस तो आए, लेकिन तिरंगे में लिपटकर।
शहादत के करीब 13 महीने बीत चुके हैं, लेकिन परिवार के लिए वह जख्म आज भी ताजा है। हाल ही में दिल्ली के नेशनल वॉर मेमोरियल (राष्ट्रीय युद्ध स्मारक) की ग्रेनाइट शिलाओं पर सुनील का नाम अंकित किया गया है।
'त्याग चक्र' पर जब सुनील का नाम लिखा गया, तो पूरे गांव और जिले का सीना गर्व से चौड़ा हो गया, लेकिन मां की आंखों से बहते आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे।
सुनील की मां पांवढारो देवी जब अपने बेटे की बातें करती हैं, तो उनकी आवाज भारी हो जाती है। वह याद करती हैं कि उनका बेटा कितना सीधा और भोला था।
मां बताती हैं कि जब भी सुनील छुट्टी पर घर आता, तो रसोई में मां को काम करते देख तुरंत उन्हें हटा देता और कहता, "मां हटो, मैं बनाता हूं।" वह खुद खाना बनाकर मां को खिलाता था।
मां कहती हैं कि बेटे के जाने का सदमा इतना गहरा है कि अब जिंदगी बस रोते-रोते कट रही है।
ऑपरेशन सिंदूर और शहादत की कहानी
यह पूरा मामला मई 2025 का है, जब पहलगाम में हुए आतंकी हमले का जवाब देने के लिए भारत ने 'ऑपरेशन सिंदूर' चलाया था। इस साहसी ऑपरेशन में देश के 6 जांबाज जवान शहीद हुए थे।
सुरक्षा कारणों से सरकार ने करीब 13 महीने तक इन जवानों के नाम सार्वजनिक नहीं किए थे। अब जब उनके नाम नेशनल वॉर मेमोरियल पर लिखे गए हैं, तब जाकर परिवार को एक तरह का सुकून मिला है कि राष्ट्र ने उनके बेटे के बलिदान को आधिकारिक सम्मान दिया है।
अधूरा घर और पिता की उम्मीदें
सुनील के पिता जनार्दन सिंह जब घर के बाहर पड़े उस बालू के ढेर की तरफ इशारा करते हैं, तो उनकी आंखों में एक अजीब सी खामोशी छा जाती है। उन्होंने बताया कि होली की छुट्टी पर सुनील घर आया था और उसने घर के काम के लिए बालू मंगवाया था।
सुनील का सपना था कि वह अपने माता-पिता के लिए एक पक्का और सुंदर घर तैयार करे। उसने अपने भाई चंदन से भी कहा था कि हम दोनों मिलकर घर बनवाएंगे।
पिता कहते हैं कि जिस घर का प्लास्टर सुनील करवाना चाहता था, वह 13 महीने बाद भी वैसा ही खड़ा है। घर की दीवारें आज भी उस वादे की याद दिलाती हैं जो एक बेटा अपने पिता से कर गया था।
परिवार के लिए यह गौरव की बात तो है कि उनका बेटा देश के लिए शहीद हुआ, लेकिन घर की वह अधूरी दीवारें उनके अकेलेपन और दर्द को बयां करती हैं।
सरकार से मुआवजे और वादों की उम्मीद
शहादत के बाद सरकार की ओर से कई घोषणाएं की गई थीं, लेकिन परिवार का कहना है कि समय बीतता जा रहा है और वादे अब तक पूरे नहीं हुए हैं। मां पांवढारो देवी ने रुआंसे स्वर में कहा कि बेटे का नाम युद्ध स्मारक पर लिखा जाना बहुत बड़ी बात है, लेकिन सरकार से गुजारिश है कि जो घोषणाएं की गई थीं, उन्हें जल्द पूरा किया जाए।
मां बताती हैं कि सुनील अब उनके सपनों में आता है। कभी वह नए कुर्ते में खाट पर सोया नजर आता है, तो कभी बस चुपचाप खड़ा रहता है।
वह कुछ कहता नहीं, और मां भी कुछ बोल नहीं पातीं। बस एक खामोश संवाद होता है, जिसमें दर्द है, यादें हैं और एक ऐसा शून्य है जिसे दुनिया की कोई भी उपलब्धि नहीं भर सकती।


