मुंबई: आपमें से जो भी शेयर बाजार में निवेश करते हैं, वो Nifty 50 के नाम से जरूर वाकिफ होंगे। ये हमारे शेयर मार्केट का एक तरह से चेहरा है, जिसमें देश की 50 सबसे बड़ी कंपनियां शामिल होती हैं। लेकिन, क्या आप जानते हैं कि इन्हीं 50 कंपनियों में निवेश का एक और तरीका भी है, जो आपके पोर्टफोलियो को एक अलग तरह का बैलेंस दे सकता है? जी हां, हम बात कर रहे हैं Nifty50 Equal Weight Index की, जहां Nifty 50 वाली ही 50 कंपनियां होती हैं, लेकिन यहां सबको बराबर का दर्जा मिलता है। न कोई बड़ा, न कोई छोटा। हर कंपनी को एक जैसा वेटेज।
अब सवाल ये उठता है कि जब Nifty 50 है ही, तो इस ‘इक्वल वेट’ इंडेक्स की क्या जरूरत आ पड़ी? क्या इससे निवेश का जोखिम यानी कंसंट्रेशन रिस्क कम हो पाता है? किन हालात में ये रणनीति ज्यादा फायदे का सौदा साबित होती है? और सबसे बढ़कर, क्या लंबे समय के निवेशकों के लिए ये रेगुलर Nifty 50 Index Fund से बेहतर ऑप्शन बन सकता है? इन्हीं सब सवालों के जवाब ढूंढने के लिए हमने बात की एक्सिस एएमसी (Axis AMC) में हेड प्रोडक्ट्स दिव्या मेनन से। उन्होंने हमें इस पूरे खेल का गणित समझाया।
इंडेक्स फंड क्यों जरूरी होते हैं?
दिव्या मेनन का कहना है कि इंडेक्स फंड किसी भी इक्विटी पोर्टफोलियो की मजबूत नींव बन सकते हैं। इनका सबसे बड़ा फायदा ये है कि आपको अलग-अलग शेयर चुनने का सिरदर्द नहीं पालना पड़ता।
आप सीधे पूरे बाजार में निवेश कर सकते हैं। ये निवेश में एक अनुशासन लाते हैं और अक्सर हम जो भावनात्मक फैसले (बिहैवियरल बायस) ले लेते हैं, उन्हें कम करने में मदद करते हैं।
कुल मिलाकर, इंडेक्स फंड लंबी अवधि में दौलत बनाने का एक सरल और असरदार तरीका माने जाते हैं। यहां टेंशन कम और रिटर्न की संभावना ज्यादा होती है।
Nifty50 Equal Weight, आखिर Nifty 50 से कैसे अलग है?
चलिए, अब सीधे मुद्दे पर आते हैं कि ये दोनों इंडेक्स एक दूसरे से जुदा कैसे हैं। दिव्या मेनन के मुताबिक, NIFTY50 इक्वल वेट इंडेक्स में वही 50 कंपनियां शामिल होती हैं, जो Nifty 50 का हिस्सा हैं।
कंपनियों के नाम में कोई फर्क नहीं। फर्क सिर्फ इस बात में है कि उन्हें वेटेज यानी कितना महत्व दिया जाता है।
रेगुलर Nifty 50 में कंपनियों को उनके फ्री-फ्लोट मार्केट कैप (Free-Float Market Cap) के हिसाब से वेटेज मिलता है। इसका सीधा मतलब ये है कि जिस कंपनी का मार्केट कैप जितना ज्यादा होगा, उसका इंडेक्स में वेटेज भी उतना ही ज्यादा होगा।
मतलब, बड़ी कंपनियां ज्यादा पावरफुल होती हैं।
लेकिन, NIFTY50 इक्वल वेट इंडेक्स में कहानी एकदम अलग है। यहां सभी 50 कंपनियों को लगभग बराबर वेटेज दिया जाता है, यानी हर कंपनी का इंडेक्स में योगदान करीब 2% होता है।
इसमें समय-समय पर रीबैलेंसिंग करके इस बैलेंस को बनाए रखा जाता है। मतलब, अगर किसी कंपनी का शेयर बहुत बढ़ गया और उसका वेटेज 2% से ज्यादा हो गया, तो उसे बेचकर वापस 2% पर लाया जाएगा।
और अगर कोई शेयर बहुत गिर गया, तो उसे खरीदकर 2% पर लाया जाएगा। इसमें टीम वही रहती है, बस वेटेज तय करने की रणनीति बदल जाती है।
आजकल Nifty50 Equal Weight इंडेक्स इतनी चर्चा में क्यों है?
दिव्या मेनन बताती हैं कि हाल के सालों में निवेशकों का ध्यान कंसंट्रेशन रिस्क (Concentration Risk) को समझने और उसे कम करने पर बढ़ा है। कई मार्केट-कैप इंडेक्स में होता ये है कि कुछ चुनिंदा, बहुत बड़ी कंपनियां ही इंडेक्स का एक बड़ा हिस्सा होती हैं।
उदाहरण के तौर पर, Nifty 50 में टॉप 5 या 10 कंपनियां मिलकर इंडेक्स का 30-40% या इससे भी ज्यादा हिस्सा बना सकती हैं। ऐसे में अगर इन गिनी-चुनी बड़ी कंपनियों में कुछ गड़बड़ होती है, तो पूरे इंडेक्स पर उसका बुरा असर पड़ सकता है।
ठीक यहीं पर इक्वल वेट रणनीति अपना जलवा दिखाती है। ये सभी 50 कंपनियों को एक जैसी अहमियत देती है, जिससे किसी एक या कुछ बड़ी कंपनियों पर इंडेक्स की निर्भरता कम हो जाती है।
पिछले कुछ सालों में, जब कुछ सेक्टर या गिनी-चुनी बड़ी कंपनियों में तेजी देखने को मिली और बाकियों ने उतना अच्छा परफॉर्म नहीं किया, तब इस कैटेगरी में निवेशकों की रुचि तेजी से बढ़ी है। लोग अब अपने पोर्टफोलियो को और ज्यादा डायवर्सिफाई (Diversify) करना चाहते हैं।
Nifty 50 और Nifty50 Equal Weight इंडेक्स में कितना अंतर आता है पोर्टफोलियो में?
दोनों इंडेक्स में शामिल शेयरों की लिस्ट तो एक जैसी ही होती है, जैसा कि हमने पहले ही बताया। असली अंतर वेटेज तय करने के तरीके में आता है।
Nifty 50 में, सबसे बड़ी कंपनी का वेटेज 10% से भी ज्यादा हो सकता है। यानी, अगर रिलायंस जैसी कोई कंपनी बहुत बड़ी है, तो उसका इंडेक्स पर बड़ा दबदबा होगा।
वहीं, Nifty 50 में सबसे छोटी कंपनियों का वेटेज 1% से भी कम हो सकता है। मतलब, उनका असर न के बराबर होता है।
इसके उलट, Equal Weight Index में हर कंपनी को लगभग 2% का वेटेज मिलता है। इसका मतलब है कि कोई भी कंपनी इंडेक्स में बहुत ज्यादा हावी नहीं हो पाती।
ये ठीक वैसा ही है जैसे एक क्रिकेट टीम में हर खिलाड़ी को बराबर मौका मिले, न कि सिर्फ कप्तान ही सबसे ज्यादा गेंदें खेले। इस तरह से आपका निवेश एक जगह केंद्रित होने के बजाय 50 अलग-अलग कंपनियों में बंटा रहता है।
Nifty50 Equal Weight इंडेक्स कंसंट्रेशन रिस्क कैसे कम करता है?
कंसंट्रेशन रिस्क को कम करना NIFTY50 इक्वल वेट इंडेक्स की सबसे बड़ी खासियत है और यही इसकी सबसे बड़ी ताकत भी। जब आप किसी मार्केट-कैप वेटेड इंडेक्स जैसे Nifty 50 में निवेश करते हैं, तो आपका पैसा ऑटोमैटिकली उन कंपनियों में ज्यादा लग जाता है, जिनका मार्केट कैप सबसे बड़ा है।
अगर ये गिनी-चुनी बड़ी कंपनियां खराब प्रदर्शन करने लगें या किसी वजह से उनकी वैल्यू गिर जाए, तो आपके पूरे निवेश पर सीधा असर पड़ सकता है। इसे ही कंसंट्रेशन रिस्क कहते हैं, यानी सारा ध्यान कुछ ही जगहों पर केंद्रित होना।
NIFTY50 इक्वल वेट इंडेक्स इस समस्या को जड़ से खत्म करता है। चूंकि इसमें हर कंपनी को बराबर वेटेज दिया जाता है, तो आपका पैसा 50 कंपनियों में लगभग बराबर-बराबर बंट जाता है।
इसका मतलब है कि अगर कोई एक बड़ी कंपनी खराब परफॉर्म करती है या उसके शेयर गिर जाते हैं, तो भी पूरे पोर्टफोलियो पर उसका असर उतना बड़ा नहीं होता, जितना Nifty 50 में हो सकता था। ये आपके निवेश को ज्यादा सुरक्षित और स्थिर बनाता है, खासकर जब बाजार में अनिश्चितता हो।
इस रणनीति से आपका पोर्टफोलियो ज्यादा मजबूत और बाहरी झटकों से निपटने में सक्षम बनता है।





































