मुंबई: 'धमाल' नाम सुनते ही दिमाग में क्या आता है? बेतुकी, बेतरतीब, बिना सिर-पैर की लेकिन गजब की हंसाने वाली मस्ती, है ना? सालों बाद एक बार फिर वो ही पुरानी टोली लौट आई है, बड़े पर्दे पर अपनी नई कहानी लेकर, नाम है 'धमाल 4'। सिनेमाघरों में दस्तक दे चुकी इस फिल्म से उम्मीदें तो बहुत थीं कि क्या ये वो पुरानी यादें ताज़ा कर पाएगी या सिर्फ नाम ही 'धमाल' का है। तो बता दें, इंतज़ार खत्म हुआ, हंसी के पटाखे फूटने वाले हैं!
निर्देशक इंद्र कुमार की इस फ्रेंचाइज़ ने हमेशा ही दर्शकों को सिर्फ और सिर्फ एंटरटेनमेंट का डोज दिया है। इस बार भी कहानी में कोई बड़ा बदलाव नहीं है, बल्कि उसी पुराने और आजमाए हुए फॉर्मूले को नए किरदारों और नई सिचुएशन्स के साथ पेश किया गया है।
अच्छी बात ये है कि फिल्म खुद को जरूरत से ज्यादा सीरियस नहीं लेती और शुरू से आखिर तक सिर्फ और सिर्फ दर्शकों को हंसाने पर ही फोकस रखती है।
फिल्म की कहानी एक बार फिर से किसी छिपे हुए खजाने की खोज के इर्द-गिर्द घूमती है। इस बार खजाने का सुराग एक विशाल 'M' से जुड़ा है और बस फिर क्या था, इस 'M' तक पहुंचने की होड़ में कई टीमें निकल पड़ती हैं।
हर टोली का अपना ही स्वैग है, अपनी चालबाजियां हैं और अपनी अजीबोगरीब मुश्किलें हैं, जिनकी वजह से लगातार कॉमेडी के हालात बनते रहते हैं। कहानी में भले ही कोई चौंकाने वाला ट्विस्ट न हो, लेकिन इसका प्रेजेंटेशन और किरदारों के बीच की नोकझोंक ही इसकी असली जान है।
आखिर ये 'M' का चक्कर क्या है और कौन पाएगा खजाना?
इस 'M' तक पहुंचने के लिए जो अफरातफरी मचती है, जो जोड़-तोड़ चलती है, वो ही फिल्म की जान है। हर टीम अपनी अलग रणनीति से आगे बढ़ने की कोशिश करती है, लेकिन हर बार कुछ न कुछ ऐसा हो जाता है कि हंसी रोकना मुश्किल हो जाता है।
कुल मिलाकर, फिल्म ने अपनी सबसे बड़ी ताकत, यानी बिना लॉजिक वाली कॉमेडी, को बरकरार रखा है। क्लाइमैक्स में एक ऐसा ट्विस्ट आता है, जो 'धमाल 5' की तरफ भी इशारा कर देता है, यानी ये मस्ती अभी और जारी रहेगी!
अब बात करते हैं एक्टर्स की, जो इस फिल्म की जान हैं। अजय देवगन तो हैं ही, अपने शांत लेकिन असरदार अंदाज में।
वो भले ही कम बोलते दिखते हैं, लेकिन जब भी आते हैं, महफिल लूट लेते हैं। वहीं, रितेश देशमुख, अरशद वारसी और जावेद जाफरी की तिकड़ी ने तो कमाल ही कर दिया है।
इनकी कॉमिक टाइमिंग इतनी लाजवाब है कि आप चाहकर भी अपनी हंसी रोक नहीं पाएंगे। इन तीनों की केमिस्ट्री, इनकी जुगलबंदी.
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उफ्फ! यही तो 'धमाल' की पहचान रही है।
रवि किशन और संजय मिश्रा ने क्या रंग जमाया?
इस बार रवि किशन भी एक समुद्री लुटेरे के किरदार में अलग ही रंग भरते दिख रहे हैं। उनका 'अधूरा' होने वाला ट्रैक कई जगह पर खूब हंसाता है और उनकी एक्टिंग एक फ्रेशनेस लेकर आती है।
संजय मिश्रा, उपेंद्र लिमये, विजय पाटकर, अंजलि आनंद, संजीदा शेख, ईशा गुप्ता और बृजेंद्र काला जैसे कलाकार भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराने में सफल रहे हैं। हर किसी ने अपने हिस्से की कॉमेडी में चार चांद लगाए हैं।
तकनीकी पक्ष की बात करें तो फिल्म का विजुअल स्केल काफी बड़ा है, लेकिन कुछ जगहों पर वीएफएक्स थोड़े बेहतर हो सकते थे। फिर भी, यह आपको कहानी से जोड़े रखता है।
फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर कहानी के साथ एकदम तालमेल बिठाता है और बीच-बीच में सुनाई देने वाली 'बेला चाओ' धुन दर्शकों का ध्यान खींचने में कामयाब रहती है। यह धुन फिल्म के मिजाज को बखूबी पकड़ती है और आपको मस्ती के मूड में ले जाती है।
क्या फिल्म में कुछ पुराना भी देखने को मिलेगा?
और हां, फिल्म में आपको कई दिलचस्प सिनेमाई रेफरेंस भी देखने को मिलेंगे। कभी 'पाइरेट्स ऑफ द कैरेबियन' की झलक, तो कभी 'एवेंजर्स' का फ्लेवर, 'धूम' और 'वेलकम' जैसी फिल्मों के सीन भी कई जगहों पर इतने मजेदार लगते हैं कि आप मुस्कुराए बिना रह नहीं पाएंगे।
निर्देशक इंद्र कुमार का अपना 'इंद्रधनुष' वाला रेफरेंस भी छोटा सा, लेकिन मजेदार है। ये सारी चीज़ें मिलकर फिल्म को और भी मनोरंजक बना देती हैं और आपको लगता है कि आप एक बड़ी फिल्मी दुनिया का हिस्सा बन गए हैं।
तो कुल मिलाकर, 'धमाल 4' भले ही कोई नई और इनोवेटिव कहानी न सुनाती हो, लेकिन यह आपको हंसी के भरपूर मौके जरूर देती है। अगर आप पूरे परिवार के साथ एक हल्की-फुल्की, मसाला एंटरटेनर फिल्म देखने की प्लानिंग कर रहे हैं, तो यह फिल्म आपको निराश नहीं करेगी।
3/5 रेटिंग के साथ यह एक ऐसी फिल्म है, जो आपको अपनी सारी टेंशन भुलाकर सिर्फ हंसने का मौका देगी।






































