दिल्ली: आज की दुनिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI का नाम तो आपने सुना ही होगा। हर तरफ इसकी धूम है, चाहे चैटबॉट हो या फिर सेल्फ-ड्राइविंग कारें। AI हमारी जिंदगी को जितना आसान और स्मार्ट बना रहा है, उतनी ही तेजी से इसकी एक और ‘भूख’ बढ़ती जा रही है – और वो है बिजली की भूख। ये भूख इतनी बड़ी है कि अगले कुछ सालों में हालात कुछ ऐसे हो सकते हैं, जिसकी हमने शायद कल्पना भी नहीं की होगी।
एक नई रिपोर्ट ने जो खुलासा किया है, वो वाकई चौंकाने वाला है। ग्लोबल टेक रिसर्च कंपनी गार्टनर (Gartner) ने अपनी हालिया फॉरकास्ट में बताया है कि AI को चलाने वाले सर्वर इतनी ज्यादा बिजली कंज्यूम करेंगे कि 2027 तक वो दुनिया के सभी ट्रेडिशनल डेटा सेंटर्स की कुल बिजली खपत को भी पार कर जाएंगे।
जी हां, सिर्फ चार साल में AI की पावर डिमांड इतनी बढ़ जाएगी कि बाकी सब पीछे छूट जाएंगे।
ज़रा इन आंकड़ों पर गौर कीजिए। गार्टनर की रिपोर्ट के मुताबिक, 2026 में AI-ऑप्टिमाइज्ड डेटा सेंटर्स की बिजली खपत 175 टेरावाट-घंटे (TWh) रहने वाली है।
ये संख्या 2027 तक बढ़कर 258 टेरावाट-घंटे तक पहुंच जाएगी। और यहीं पर वो टर्निंग पॉइंट आएगा, जब AI से चलने वाले डेटा सेंटर्स, नॉर्मल डेटा सेंटर्स की कुल बिजली खपत को पीछे छोड़ देंगे।
आखिर ये AI इतना पावर-हंग्री क्यों है?
सवाल उठता है कि AI इतना ज्यादा बिजली क्यों खाता है? दरअसल, AI के लिए बहुत ज़्यादा प्रोसेसिंग पावर की जरूरत होती है। AI मॉडल्स को ट्रेन करने, डेटा को एनालाइज करने और कॉम्प्लेक्स एल्गोरिदम चलाने के लिए बहुत सारे कंप्यूटेशनल रिसोर्सेज लगते हैं।
ये सब सर्वर पर होता है, और सर्वर को चलाने के लिए बिजली चाहिए। जितनी ज़्यादा कैपेसिटी, उतनी ज़्यादा बिजली।
आप जानकर हैरान होंगे कि 2025 के मुकाबले, AI डेटा सेंटर्स की बिजली खपत में करीब 84% का जबरदस्त उछाल आया है। ये दिखाता है कि AI कितनी तेज़ी से हमारे पावर ग्रिड पर दबाव बना रहा है।
गार्टनर ने तो यहां तक कहा है कि 2026 में डेटा सेंटर्स की कुल बिजली खपत का 31% हिस्सा सिर्फ AI-ऑप्टिमाइज्ड सर्वर का होगा।
अब बात सिर्फ AI की नहीं है, बल्कि कुल डेटा सेंटर खपत की भी है। 2026 में ग्लोबल डेटा सेंटर्स की कुल बिजली खपत 565 टेरावाट-घंटे होने का अनुमान है, जो कि पिछले साल के मुकाबले 26% ज़्यादा है।
यानी, ओवरऑल डेटा सेंटर्स की डिमांड भी बढ़ती जा रही है, और AI इसमें आग में घी डालने का काम कर रहा है।
अमेरिका का इसमें क्या रोल है?
जब ग्लोबल खपत की बात आती है, तो इसमें अमेरिका का रोल काफी बड़ा है। दुनियाभर की कुल बिजली डिमांड का 36% हिस्सा, यानी करीब 204 टेरावाट-घंटे सिर्फ अमेरिका से आता है।
और मजेदार बात ये है कि इस अमेरिकी डिमांड के एक तिहाई हिस्से में AI डेटा सेंटर्स का हाथ है। 2026 में अमेरिका में AI डेटा सेंटर्स की खपत करीब 68 टेरावाट-घंटे रहने की उम्मीद है।
गार्टनर की डायरेक्ट एनालिस्ट लिंगलन वांग (Linglan Wang) ने इस स्थिति पर अपनी राय रखी है। उन्होंने कहा, "कम्प्यूट-इंटेंसिव AI वर्कलोड्स की बढ़ती डिमांड डेटा सेंटर पावर ग्रोथ को अभूतपूर्व स्तर पर ले जा रही है।
अब AI कैपेसिटी, बिजली की उपलब्धता से सीमित हो गई है। ऐसे में डेटा सेंटर पावर सिक्योरिटी ग्लोबल AI रेस में स्केल करने और मार्जिन बचाने के लिए एक नया बैटलग्राउंड बन गई है।
"
सरल शब्दों में कहें तो, AI को चलाने के लिए जिस तरह की कंप्यूटिंग पावर चाहिए, उसकी डिमांड इतनी ज़्यादा हो गई है कि अब बिजली की कमी AI के आगे बढ़ने की राह में सबसे बड़ी रुकावट बन रही है। कंपनियां AI में आगे निकलना चाहती हैं, लेकिन बिजली की कमी उनके लिए सबसे बड़ा चैलेंज है।
2030 तक क्या होने वाला है?
गार्टनर की भविष्यवाणी इससे भी आगे जाती है। उनका अनुमान है कि 2030 तक बिजली की सप्लाई, डिमांड को पूरा नहीं कर पाएगी।
तब तक कुल खपत 1,200 टेरावाट-घंटे के आंकड़े को पार कर जाएगी, और यहीं पर सिस्टम जवाब दे सकता है। यानी, अगर हमने अभी से कुछ नहीं किया, तो आने वाले सालों में बिजली की भारी किल्लत देखने को मिल सकती है, जिसका सीधा असर AI के विकास पर पड़ेगा।
तो इस बढ़ती हुई टेंशन से निपटने का क्या रास्ता है? लिंगलन वांग ने कुछ सुझाव दिए हैं। उनका कहना है कि बिजनेस लीडर्स और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोवाइडर्स को बिजली ग्रिड की एफिशिएंसी बढ़ाने और उन हार्डवेयर को अपग्रेड करने पर फोकस करना चाहिए जो सबसे ज़्यादा बिजली खाते हैं, जैसे कूलिंग सिस्टम।
सोचिए, डेटा सेंटर्स को ठंडा रखने के लिए भी कितनी बिजली लगती है! अगर हम इन कूलिंग सिस्टम को और एफिशिएंट बना पाएं, तो काफी बिजली बचाई जा सकती है। कुल मिलाकर, AI का भविष्य काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि हम कितनी स्मार्टली और सस्टेनेबली उसकी बिजली की भूख को शांत कर पाते हैं।
वरना ये तेजी से बढ़ती तकनीक, खुद ही अपनी राह में रोड़ा अटका सकती है।
यहां तक कि कुछ रिपोर्ट्स तो ये भी दावा कर रही हैं कि बिजली की मांग के चलते AI डेटा सेंटर्स के एडवांसमेंट रुक सकते हैं। अमेरिका में 11 प्रस्तावित AI डेटा सेंटर्स से होने वाले उत्सर्जन (emissions) को लेकर भी चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं, जो पर्यावरण के लिए भी एक नई चिंता बढ़ा रहे हैं।
इसलिए, अब सिर्फ AI को डेवलप करना ही काफी नहीं, बल्कि इसे चलाने के लिए ज़रूरी एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर को भी मजबूत और बेहतर बनाना होगा। यह एक ऐसी चुनौती है, जिसका सामना हम सबको मिलकर करना होगा, ताकि AI का पूरा पोटेंशियल अनलॉक हो सके और वो हमारी जिंदगी को सचमुच बदल सके।




































