दिल्ली: बीते कुछ सालों से जब भी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई की बात होती है, तो एक डर का माहौल बन जाता है। कहीं हमारी नौकरी न चली जाए? कहीं रोबोट्स ही सब काम न करने लगें? एआई को लेकर खबरें ऐसी आती हैं, मानो यह सिर्फ तबाही लाने वाला है। कई कंपनियां तो एआई के नाम पर अपने कर्मचारियों को बाहर का रास्ता भी दिखा रही हैं। इस पूरे डर वाले माहौल में, एक शख्स ऐसे भी हैं जो पिछले तीन सालों से लगातार इस ‘एआई डर इकोनॉमी’ और ‘एआई डूमोनॉमिक्स’ (AI Doomonomics) के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। उनका नाम है स्टुअर्ट मैकक्योर।
स्टुअर्ट मैकक्योर WethosAI के फाउंडर और सीईओ हैं। वो सिर्फ बोलते ही नहीं, बल्कि उन्होंने अपनी बात को साबित करने के लिए खूब मेहनत भी की है।
उन्होंने अपने पॉडकास्ट, इंटरव्यू और की-नोट्स में, साथ ही अपनी "AI Exposed" सीरीज में एआई की सीमाओं को उजागर करने में अनगिनत घंटे बिताए हैं। वो कहते हैं कि उन्हें सच सामने लाने का "ऑफ" बटन नहीं मिलता।
उनका मानना है कि एआई का मतलब नौकरियों का अंत नहीं, बल्कि इंसानों और एआई का मिलकर काम करना है। यह एक 'ह्यूमन+एआई सुपरपावर' की कहानी है, जो भविष्य को बदल देगी।
मैकक्योर उन लोगों को जगाने की कोशिश कर रहे हैं जो 'ऑब्सीलीट होने के डर' (FOBO - Fear of Becoming Obsolete) में जी रहे हैं। उनका कहना है कि बहुत से विशेषज्ञ अब उनके तीन साल पुराने तर्क से सहमत होने लगे हैं।
उनका मूल विचार यह है कि एआई सिर्फ एक टूल है, और अगर इसे सही तरीके से इंसानों के साथ मिलकर इस्तेमाल किया जाए, तो यह हमारी क्षमताओं को कई गुना बढ़ा सकता है। यह 'कार्यबल के विलुप्तीकरण' (Workforce Extinction) के बजाय 'ह्यूमन+एआई सशक्तिकरण' (Human+AI Empowerment) का मार्ग है।
क्या AI सच में हमारी नौकरियां छीन लेगा, जैसा बताया जा रहा है?
जो लोग रोज एआई का इस्तेमाल करते हैं, वे जनरेटिव एलएलएम (Generative LLM) के मूलभूत दोषों को अच्छी तरह जानते हैं। वे एआई की गलतियों, भूलने की बीमारी, भ्रम (hallucinations), चाटुकारिता (sycophancy), हाल की जानकारी पर अत्यधिक निर्भरता (recency bias), बुनियादी गणित में फेल होने, औसत दर्जे पर वापस आने, 'वेटर प्रॉब्लम' जैसी कई कमियों को देखते हैं।
मैकक्योर इस बात पर जोर देते हैं कि एआई में न तो असली याददाश्त है, न ही वास्तविक दुनिया का अनुभव। यह नियतवाद (determinism), सोच, संज्ञान (cognition), समय की समझ, या वास्तविक संदर्भ (पर्यावरण, संज्ञानात्मक पूर्वाग्रह, प्राकृतिक व्यवहार, जागरूकता आदि) को नहीं समझता।
इसमें कोई विशिष्टता नहीं, कोई अंतर्निहित नैतिकता नहीं, कोई एजेंसी नहीं, कोई वास्तविक बुद्धिमत्ता नहीं और कोई जवाबदेही नहीं है।
उनकी बात को सरल शब्दों में समझें तो, एआई के पास एक स्ट्रॉबेरी का अनुभव नहीं है। यह नहीं जानता कि स्ट्रॉबेरी को छूने पर कैसा महसूस होता है, उसका स्वाद कैसा होता है, या उसकी गंध कैसी होती है।
ये सिर्फ डेटा के आधार पर शब्दों को जोड़ता है। मैकक्योर कहते हैं कि एआई को उन कामों के लिए बनाया ही नहीं गया था जो आज उससे करवाए जा रहे हैं।
मौजूदा एलएलएम (लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स) बस 'शब्दों का अनुमान' लगाने वाले हैं। आप इसे एक खरब डॉलर के 'ऑटो-कंप्लीट ऑन एसिड' के बराबर मान सकते हैं।
इससे ज्यादा कुछ नहीं।
तो फिर AI का असली काम क्या है और ये कैसे मदद करेगा?
एक आम गलतफहमी है कि एआई इंसानों को पूरी तरह से बदल देगा। लेकिन इतिहास हमें कुछ और ही सिखाता है।
याद है जब एटीएम आए थे? क्या उन्होंने बैंक के सभी कर्मचारियों को हटा दिया? नहीं, बिल्कुल नहीं। बैंक के कर्मचारियों की भूमिका बदल गई, लेकिन वे आज भी मौजूद हैं और ग्राहकों की जरूरतें पूरी करते हैं, खास तौर पर उन कामों में जहां मानवीय स्पर्श और निर्णय की जरूरत होती है।
इसी तरह, करीब 10 साल पहले जब अमेजन ने होल फूड्स को खरीदा था, तो क्या कोने की किराना दुकानें खत्म हो गईं? नहीं, वे भी आज तक अपनी जगह पर हैं।
यह दिखाता है कि नई टेक्नोलॉजी अक्सर मौजूदा भूमिकाओं को खत्म नहीं करती, बल्कि उन्हें नया आकार देती है या नई भूमिकाएं पैदा करती है। एआई के साथ भी यही उम्मीद है।
मैकक्योर कहते हैं कि मौजूदा एआई सिर्फ एक 'सुपरबबल' है, जो जल्द ही फटेगा। लेकिन उसके बाद जो सामने आएगा, वह 'ह्यूमन+एआई सशक्तिकरण' का दौर होगा।
इसमें इंसानों की रचनात्मकता, आलोचनात्मक सोच और भावनात्मक बुद्धिमत्ता एआई की प्रोसेसिंग पावर और डेटा विश्लेषण क्षमताओं के साथ मिलकर काम करेगी।
यह ऐसा होगा जैसे इंसानों को एक सुपरपावर मिल गई हो। एआई जटिल डेटा को जल्दी प्रोसेस कर सकता है, पैटर्न ढूंढ सकता है और प्रारंभिक ड्राफ्ट तैयार कर सकता है।
लेकिन अंतिम निर्णय, नैतिक विचार, रचनात्मक मोड़ और मानवीय समझ – ये सब इंसानों के हाथ में ही रहेंगे। इससे हम ज्यादा कुशल, ज्यादा इनोवेटिव और ज्यादा उत्पादक बन पाएंगे।
यह कार्यबल के अंत की नहीं, बल्कि उसके विकास की कहानी है। हां, इस मौजूदा एआई 'डिस्टोपिया सुपरबबल' से गुजरने में थोड़ा और समय लग सकता है, लेकिन अंततः हमारा भविष्य ह्यूमन+एआई सहयोग में ही निहित है।




































