पटना: राजधानी पटना में इन दिनों सरकारी दफ्तरों के गलियारों में सन्नाटा कम और सरगर्मी ज़्यादा दिख रही है। वजह? निगरानी विभाग यानी विजिलेंस का ताबड़तोड़ एक्शन। बुधवार का दिन भी कुछ ऐसा ही रहा, जब एक सरकारी बाबू को रंगे हाथ रिश्वत लेते धर दबोचा गया। ये बाबू कोई छोटे-मोटे नहीं थे, बल्कि वेतन आयोग जैसी अहम संस्था के अवर सचिव थे। नाम है आमोद मिश्रा। महोदय को पटना के ऑफिसर फ्लैट में बीस हजार रुपए की घूस लेते पकड़ा गया। कहानी इतनी सीधी नहीं है, इसमें एक रिटायर कर्मचारी के 17 लाख रुपए के एरियर का पेंच है, जिसकी वसूली के लिए ये साहब अपनी जेब गर्म कर रहे थे।
आप भी सोच रहे होंगे कि आखिर ये माजरा क्या है? दरअसल, बिहार के सरकारी महकमे में लंबे समय से भ्रष्टाचार को जड़ से खत्म करने की मुहिम चल रही है। इसी कड़ी में निगरानी विभाग लगातार सक्रिय है।
बुधवार सुबह विभाग की टीम ने एक गुप्त सूचना पर कार्रवाई करते हुए आमोद मिश्रा नाम के इस अवर सचिव को गिरफ्तार कर लिया। ये जनाब इस्कॉन मंदिर के पास स्थित वेतन आयोग कार्यालय से जुड़े थे, और इनकी तैनाती मगध विश्वविद्यालय, बोधगया के वेतन कोषांग शाखा में थी।
सोचिए, जिस अधिकारी का काम लोगों के सही हक का पैसा दिलाना हो, वही अपनी जेब भरने के लिए रिश्वत मांगे, तो कैसा लगेगा?
मामला जुड़ा है एक सेवानिवृत्त कर्मचारी से। एसबीएम कॉलेज, बिहारशरीफ में कभी 'प्रयोग प्रदर्शक' के तौर पर काम करने वाले उमाशंकर उमरेबी के पिता रिटायर हो चुके थे।
रिटायरमेंट के बाद उनका करीब 17 लाख रुपये का एरियर रुका हुआ था। यह ऐसी रकम होती है, जो कर्मचारियों की मेहनत की कमाई होती है और अक्सर रिटायरमेंट के बाद बड़े सहारे का काम करती है।
लेकिन, आमोद मिश्रा जैसे अधिकारियों के रहते, इस हक के पैसे को भी पाने के लिए 'दक्षिणा' देनी पड़ती है। आरोप है कि आमोद मिश्रा ने इस 17 लाख रुपए के एरियर के भुगतान के लिए पूरे 30 हजार रुपए की घूस मांगी थी।
शिकायतकर्ता की आपबीती और 'Deal' की तैयारी
पीड़ित उमाशंकर उमरेबी, जो अपने पिता के हक की लड़ाई लड़ रहे थे, अधिकारियों के चक्कर काटते-काटते थक चुके थे। जब उन्हें पता चला कि बिना रिश्वत दिए काम नहीं होगा, तो उन्होंने हिम्मत जुटाई और एक बड़ा कदम उठाया।
बीते 30 जून को उन्होंने सीधे निगरानी थाने में शिकायत दर्ज कराई। शिकायत के साथ उन्होंने आमोद मिश्रा के साथ हुई बातचीत के सभी साक्ष्य भी विभाग को सौंप दिए।
इन साक्ष्यों से साफ हो गया कि रिश्वत की बात कोई हवा-हवाई नहीं, बल्कि पुख्ता सच्चाई थी।
उमाशंकर ने निगरानी विभाग को बताया कि आमोद मिश्रा पहले ही उनसे 10 हजार रुपए की पहली किस्त ले चुके थे। अब बाकी के 20 हजार रुपए देने थे।
रिश्वतखोर अधिकारी ने बुधवार शाम को उमाशंकर को पटना के गर्दनीबाग स्थित ऑफिसर्स फ्लैट पर बुलाया था, ताकि बची हुई रकम ली जा सके। यहीं पर निगरानी विभाग ने अपनी रणनीति बनाई और जाल बिछाने की तैयारी की।
निगरानी विभाग का जाल और रंगे हाथ गिरफ्तारी
शिकायत के सत्यापन के बाद निगरानी विभाग की टीम बिना देरी किए एक्शन में आ गई। एक पुख्ता योजना बनाई गई।
टीम ने पूरी तरह अलर्ट होकर बुधवार शाम को अपनी कार्रवाई शुरू की। तय योजना के तहत, जैसे ही उमाशंकर उमरेबी ने आमोद मिश्रा को 20 हजार रुपए दिए, और मिश्रा जी ने उन्हें अपनी मुट्ठी में कैद किया, तभी निगरानी की टीम ने उन्हें चारों ओर से घेर लिया।
ऑफिसर फ्लैट में उस वक्त का माहौल देखने लायक रहा होगा। रंगे हाथ पकड़े जाने पर अधिकारी के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं।
निगरानी विभाग के अधिकारियों ने मौके पर ही मिश्रा जी को गिरफ्तार कर लिया। अब उनसे पूछताछ जारी है और इस मामले में आगे की कानूनी कार्रवाई की जा रही है।
इस गिरफ्तारी से सरकारी महकमे में एक बार फिर हड़कंप मच गया है। भ्रष्टाचार के खिलाफ जारी इस जंग में यह एक और अहम पड़ाव माना जा रहा है।
भ्रष्टाचार पर नकेल कसने की मुहिम
बिहार में निगरानी विभाग की ये कार्रवाईयां अब आम बात हो चली हैं। अक्सर ऐसी खबरें आती रहती हैं, जहां सरकारी बाबुओं को रिश्वत लेते पकड़ा जाता है।
इससे एक बात तो साफ है कि विभाग पूरी मुस्तैदी से अपना काम कर रहा है। आमोद मिश्रा जैसे अधिकारियों का वेतन आयोग में होना और फिर रिश्वत मांगना, जनता के भरोसे को ठेस पहुंचाता है।
वेतन आयोग का काम ही कर्मचारियों के वित्तीय हितों की रक्षा करना होता है, लेकिन जब इसका 'रक्षक' ही 'भक्षक' बन जाए, तो सवाल उठने लाज़मी हैं।
यह घटना सिर्फ एक अधिकारी की गिरफ्तारी नहीं है, बल्कि उन सभी भ्रष्ट अधिकारियों के लिए एक कड़ा संदेश है जो सोचते हैं कि वे कानून की पहुंच से बाहर हैं। उमाशंकर उमरेबी जैसे आम नागरिक की हिम्मत की दाद देनी होगी, जिन्होंने अपने पिता के हक के लिए लड़ाई लड़ी और भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाई।
इस तरह की शिकायतें ही निगरानी विभाग को भ्रष्टाचारियों पर नकेल कसने का मौका देती हैं। अब देखना होगा कि आमोद मिश्रा के खिलाफ कानूनी प्रक्रिया कितनी तेजी से आगे बढ़ती है और उन्हें उनके किए की क्या सजा मिलती है।
लेकिन एक बात तो तय है, इस मामले ने एक बार फिर सरकारी गलियारों में ईमानदारी का पाठ पढ़ाने की जरूरत को रेखांकित किया है।


